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23 May, 2017

लड़का BY : TRIPURENDRA OJHA

लड़का:
हमारे इस पुरुषप्रधान समाज में लड़का पैदा होना अच्छा माना जाता है लेकिन उस लड़के को ये बात साबित करने में जो दुश्वारियां , जो त्याग , जो संघर्ष करना पड़ता है ये समाज को नहीं दिखता।
एक लड़का लाड़,प्यार,दुलार,फटकार,लात,जूतों ,मार आदि का झंझवात झेल कर जैसे तैसे बड़ा होता है..माँ बाप शुरू से ही अपनी उम्मीदों का बड़ा सा बोझ डाल देते है, डॉक्टर ,इंजीनियर साइंटिस्ट पता न क्या क्या..
+2 तक जाते जाते लड़का indication दे देता है कि मां बाप का investment कैसा return देने वाला है.
+2 के बाद क्या करना है ये guide करने वाले कम पूछने वाले ज्यादा होते हैं, कुछ प्रतिभाएं यहाँ से ITI और POLYTECHNIC कर के certified मजदूर बन जातीं हैं,तो कुछ IIT,PMT की PREPARATION की अग्निपरीक्षा को खड़ीं होतीं हैं। तो किसी का शुरू होता है वो दौर जब graduation pursuing कॉलेज से आकर बिना खाये पिए किसी बुकस्टाल पर vacancy देख रहा होता है, फॉर्म खरीदना ,भरना और पढाई के साथ साथ तैयारी नौकरी की...कहीं भी जाओ सबसे ज्यादा दिमाग झंड करने वाला सवाल लोग पूछते हैं क्या कर रहे हो आज कल?
कुछ नहीं graduation चल रहा है..(मन में चल क्या रहा घिसट रहा है.)..
जवाब दे दे कर 'लड़का' झंड हो रहा होता है कि %कितना है का दूसरा गोला धम्म।
Graduation के तीन साल में लड़के से लगभग 1095×10 बार हित-रिश्तेदार पूछ ही लेते कि बेटा क्या कर रहे हो?
कुछ लोग तो कसम से इतने खडूस होते हैं कि खुद की जिंदगी में भले कुछ न कर पाएं हो लेकिन मिलते ही अपने बड़े होने का अहसास दिलाते रहते हैं..
लड़के का सबसे मुश्किल दौर जब graduation complete हो जाता है और अब उसे किसी के सहारे की जरूरत है ..मार्गदर्शन की। बजाय उसके उसपे लोग और हमलावर हो जाते हैं। अब आगे की कहानी उसकी है जो ये झेल कर आगे बढ़ रहे हैं अधिकतर तो यहीं give up कर जातें है और एक विशेष ठप्पे के साथ जिंदगी काटने लगते हैं ।
लड़का असुरक्षा की भावना के साथ,समाज से अलग..रिश्तों से अलग तमाम परीक्षाओं की तैयारी करता हैं अब उसके माँ बाप भी उसका सपोर्ट छोड़ने लगते हैं ..थोड़े थोड़े पैसे के लिए कीच कीच..बात बात पर खुद का खर्च निकालने की नसीहत ..यहाँ लड़का कुछ भी करने को ठानता है ..कुछ भी।
छोटे लेवल की नौकरी, प्राइवेट नौकरी, अपने सारे सपनों को दरकिनार कर...अपने अरमानों को कुचल कर ,अपनी प्रतिभाओं के साथ समझौता करने को तैयार..
'माँ 10हजार की नौकरी है'
'तो क्या बेटा 5000 भी खर्च करोगे तो 5000 बचेंगे ही न'
साथ साथ तैयारी भी करते रहना अच्छी नौकरी का तब तक ये करो..
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अब तक आपने पढ़ा कि एक लड़का अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कैसा कैसा अनुभव लेता है रोजगार पाने के पहले..अब आगे
इस बेरोजगारी से जूझती दुनिया में जब एक लड़का घर की माली हालत को परख, अपने अरमानों की बलि चढ़ा के परिस्थितियों से समझौता कर बैठता है और घर छोड़ देता है चंद रुपयों के लिए, जिससे वो खुद भी संतुष्ट नहीं ये जानकर भी कि मेरी योग्यता कहीं इससे ज्यादा है ,मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ लेकिन इतना परिस्थितियां इतना मोहलत कहाँ देती हैं ,आख़िरकार लड़के को नौकरी मिल जाती है।बैंक क्लर्क,शिक्षक,रेलवे,सेना,प्राइवेट नौकरियां तमाम तरह की सुरसायें गरीब विलक्षण प्रतिभाओं को निगल जाती है ...इस बात की अनुभूति तब होती है जब वो लड़का खुद से कमजोर लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत सहपाठी को तरह तरह के ऊंचाइयों को छूते देखता है ..ये नौकरियां पैसे और बेहतर जिंदगी तो देती हैं लेकिन जब बेमन की नौकरी हो तो वो सुकून नही दे पातीं खैर बंदा ये सोच के सन्तोष कर लेता है कि कुछ को तो ये भी नसीब नहीं।
नौकरी पाने के बाद कुछ लोग पूछते हैं सैलरी बढ़ी? कुछ पूछते हैं शादी कब कर रहे हो? कुछ पूछते हैं प्रमोशन कब होगा? लेकिन कोई ये नही पूछता खुश हो कि नहीं?
घर छोड़ देता है लड़का , नौकरी लग गई है अब जा रहा है अपने कर्मभूमि के तरफ .आज पहले से कुछ ज्यादा अनुभवी लग रहा है,आज कहीं बचपना नहीं झलक रहा।
चेहरे पर अजीब सी गंभीरता लिए हुए,दिमाग में तरह तरह के मूक प्रश्न और प्रत्युत्तरों का दौर चल रहा है
बैग पैक हो गया है दैनिक जरूरतों का सामान भर दिया गया है साथ में घर वालों का प्यार भी..अब यह वो समय है जब वो छोड़ जायेगा,अपनी प्यारी साइकिल जिसे कोई और छूता तक न था, अपना क्रिकेट बैट,अपनी पुरानी जीन्स, कुछ बॉल्स जो बक्से में थीं, वो ज्योमेट्री बॉक्स जिसमें रखे थे कुछ दुर्लभ चीजें,अपनी किताबें,अपने नोट्स...अपना बचपना..अपनी जिंदगी..।
मां की आँखे भर आईं है जो चिल्लाती थी देर तक सोने पर,बहन को पीटने पर ..उसके पिता जी आये हैं स्टेशन तक छोड़ने ..ट्रैन ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा सीने में अजीब सा हो जाता है भींग जाती है बेडशीट की कुछ किनारियां जो ऊपरी बर्थ पर बिछा के लड़का सोने का अभिनय कर रहा है..सारी बातें याद आ रही है..तमाम विचारों के मकड़जाल में उलझा हुआ चला जाता है अपने घर से दूर अपने परिवार से दूर..
नौकरी में आने के बाद भी चुनौतियां कम नहीं हुई है..
तमाम असुविधाओं से लड़ना है जिसमे बाहर का खाना मुख्य है। खुद के सेहत पर कोई ध्यान कैसे दे ये तो आता ही नहीं ,कभी दिया ही नहीं..माँ रात को उठा के दूध जबरदस्ती पिलाती थी तो गुस्सा आता था लगता था ये तो बस खाना का एक हिस्सा है..वैसे ही लापरवाही होती है और लड़का बीमार हो जाता है..तब समझ में आता है खुद का खयाल कैसे रखना है...कैंटीन होटल का खाना खा खा के ऊबने के बाद..खुद बनाता है और खाता है ..घर में तरह तरह के नखरे दिखाने वाला ..आज बासी, आधी जली आधी कच्ची रोटियों को देख के हँसता हुआ लड़का भी जनाब बहुत संघर्ष करता है।

-त्रिपुरेंद्र ओझा 'निशान'


(ये मेरे अपने निजी विचार हैं ये लेख किसी बात को सही और किसी बात को गलत नहीं ठहराता है)
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