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06 October, 2016

आज फिर बेमौसम बरसात हुई

बिन मौसम के बरसात हुई
दिल की क्या हालात हुई
याद पे याद आ ही गए वो
और शाम तक मुलाकात हुई

जब आँखो से बात हुई
धीरे धीरे वो रात हुई
इतनी आसान लगती है वो
जैसे खाने में दाल भात हुई

चेहरा उसका खिल सा गया
जैसे उसे कोई मिल सा गया
अभी उसके लबो तक पंहुचा ही था
की होंठ उसके सील सा गया

आज फिर अधूरी रह गई वो
बिन बोले ही चली गई है वो
निल्को क्या लिखूं उसकी अदा पर
आज घर फिर अपने चली गई है वो
सादर
एम के पाण्डेय निल्को
6 अक्टूबर 2016 , 9:30 pm

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