Blockquote

Followers

29 October, 2016

आप सभी को नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं।

चतुर्दश वार।
मिला सुतवार।।
बढे धन कीर्ति।
रहे यश शांति।।

                गजानन हाँथ।
                सदा उर साथ।।
                कटे सब कष्ट।
                रहे  प्रभु  दृष्ट।।

प्रदीप सुपर्व।
मिले अमरत्व।।
प्रकाश अपार।
प्रहर्ष हजार।।

                 जले जब प्रकाश।
                 सदा तम नाश।।
                 मिले तब प्रमोद।
                 रहे अनुमोद।।

करें सब विनोद।
सदैव प्रमोद।
बने क्षण अखर्व।
सदा बस अपूर्व।।
   
                 रहे प्रभु वास।
                 धनेश निवास।।
                 रहे बस हर्ष।
                 नही अपकर्ष।।
सौम्या मिश्रा

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग" की एक रचना

इन मीठे-मीठे पकवानों का किसको भोग लगाऊं मैं
मेरे प्रभुजी हैं सीमा पर फ़िर कैसे खुशी मनाऊँ मैं

दुश्मन की लंका जली नहीँ संहार अभी तक बाकी है
प्रत्यंचा के आघातों की टंकार अभी तक बाकी है

सीता सी भूमी गिलगित सिंध बलूचिस्तानी रोती है
अगणित लाशें अपने सीने पर निर्दोषों की ढोती है

जेहादी रावण करता अट्टाहास इधर विस्फोटों से
सेना अपनी घायल होती रहती है असुरी चोटों से

लगता है जैसे खंडित हों माता के धड़ से अंग-अंग
लंकेश कोशिशें करता माँ की पावनता हो भंग-भंग

लेकिन अंगद से वीर हमारे गिरि बनकर के अड़े रहे
बलिदान दिया है प्राणों का रक्षक बनकर के खड़े रहे

दुश्मन को धूल चटाने वाले वीर जितेंदर बलिदानी
वो नितिन चौबिया चम्बल वाला अल्हड़ सिंह स्वाभिमानी

गुरनाम वीर जैसे कितने ही जगमग होते बुझे दीप
सिंधू के रक्तिम जल में मोती वितरित करते रहे सीप

आओ हम सब मिलकर उनके नामों के दिये जलाएंगे
जिस घर में अंधियारा हो उसको जगमग करने जाएँगे

उन असहाय माताओं के दिल में उम्मीद जगाएगे
उन रोते बच्चों के मुख पर मुस्कानें वापस लाएंगे

जिस दिन पावन माटी दुश्मन से करके जंग छुड़ाएगे
हाँ उसी दिवस को दीवाली जैसा उल्लास मनाएंगे

लेकिन इतना भी याद रहे पन्ना फ़िर दर-दर ना भटके
जो किया उसी ने दीपदान वो उसके दिल में ना खटके

जिसके सुत प्राणों को न्यौछावर करने वाले सेवक हैं
उसको एहसास दिलायेंगे हम भी तो उसके दीपक हैं

ये देव कहे जिस-जिस घर से सरहद पर दीपक जाता है
उस घर में दिये जला देना उसमें भी भारत माता है

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह "आग"
9675426080

दीपक - मुक्तक


*****
मैं   अँधेरों   से  लड़ा  हूँ
आँधियों से  भी खड़ा हूँ
तुच्छ मत कहना मुझे तू
मोतियों  से  मैं  जड़ा हूं  !!!
******************
मुरारि पचलंगिया

लक्ष्मीजी कहाँ रहती हैं ?

एक बूढे सेठ थे । वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव । आज यहाँ तो कल वहाँ!!

सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।

उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं ? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?

वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ । कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ । मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया । संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी । तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये । अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ । जो चाहे मुझसे माँग लो ।

सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा । आप कृपया कल रात को पधारें ।

सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली ।

उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा ।

किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी ।

उसने कहा : ‘‘पिताजी ! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी । यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।

दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें ?

सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी ! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।

यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण पलोटती (दबाती)हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!

13 October, 2016

मुक्तक - नज़र निल्को की

अपने सर को बोलो की हद में रहे
चादर उनकी कद में रहे
बड़े होंगे पद में, तो क्या हुआ
बोलो अपने सरहद में रहे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

07 October, 2016

नज़र निल्को की.......

न दुपट्टा गिरा और न उसकी उम्मीदों के दुपट्टे गिरे,
पर कुछ लोग उसके दुपट्टे गिराने मे कई बार गिरे
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

06 October, 2016

आज फिर बेमौसम बरसात हुई

बिन मौसम के बरसात हुई
दिल की क्या हालात हुई
याद पे याद आ ही गए वो
और शाम तक मुलाकात हुई

जब आँखो से बात हुई
धीरे धीरे वो रात हुई
इतनी आसान लगती है वो
जैसे खाने में दाल भात हुई

चेहरा उसका खिल सा गया
जैसे उसे कोई मिल सा गया
अभी उसके लबो तक पंहुचा ही था
की होंठ उसके सील सा गया

आज फिर अधूरी रह गई वो
बिन बोले ही चली गई है वो
निल्को क्या लिखूं उसकी अदा पर
आज घर फिर अपने चली गई है वो
सादर
एम के पाण्डेय निल्को
6 अक्टूबर 2016 , 9:30 pm

Loading...