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19 April, 2016

सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?

प्रकृति और प्राणी दोनों ही एक दूसरे के सहचर हैं। दोनों मे से किसी एक के भी द्वारा पैदा किए गए असन्तुलन से दोनों को ही अस्वाभाविक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। प्राणियों में खासकर मानव के द्वारा लिप्सा बस प्रकृति के साथ निरन्तर की जा रही नाजायज छेड़-छाड़ भीषण प्राकृतिक असंतुलन का सामना धरती के विभिन्न भागों को करना पड़ता है। ऐसे प्राकृतिक असंतुलन कभी अवर्षण (सूखा) तो कभी अतिवर्षण (बाढ़) तो कभी भूकम्प के रूप में तबाही मचाते रहे हैं।

  • जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। 

देश भर में पानी को लेकर हाहाकार है। विशेषज्ञों का कहना है कि सागर और बूंदें अलग हो जाएं तो न सागर बचा रहेगा और न बूंद बचेगी और देश में भीषण सूखे की यह एक बड़ी वजह है। हमारे देश में लाखों की तादाद में तालाब थे, कुएं थे लेकिन हमने उन्हें रहने नहीं दिया, परिणाम हमारे सामने है। इस समय भारत में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप ले लिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जिनके कुछ हिस्से इस समय सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं। सूखे की बात आते ही हर कोई भगवान को दोष देने लगता है और इसे एक प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। लेकिन क्या सूखे के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इसके लिए और भी कोई दोषी है?सूखे और जल संकट पर शीर्ष अदालत ने बड़े ही तल्ख लहजे में कहा है कि देश के नौ राज्य सूखाग्रस्त हैं और सरकार इस पर आंखें बंद नहीं कर सकती। यह बुनियादी जरूरतों में से एक है और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रभावित लोगों को इस समस्या से निजात दिलाए। भारत में सूखा पड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या इसके लिए पहले से तैयार नहीं रहा जा सकता है? अगर बात करें सूखा पड़ने के कारण की, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है सरकार की पॉलिसी। भारत में हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखा जरूर पड़ता है और कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां साल दर साल कमोबेश सूखे की स्थिति पैदा हो ही जाती है। बावजूद इसके सराकार की तरफ से कोई कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।
इस ओर न तो राज्य सरकार ध्यान देती है, न ही केन्द्र सरकार उस सूखी जमीन को हरा भरा करने की सोचती है। आलम ये है कि सूखे से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहा है और नौजवान गांव छोड़कर शहरों की ओर रोजी रोटी की तलाश में निकल जा रहे हैं। गांव में बच रही हैं तो सिर्फ महिलाएं और लड़कियां।कई गांवों का तो ये हाल है कि लड़कियों की शादी भी नहीं हो रही है। सरकार पानी जमा करने का कोई इंतजाम नहीं करती है, बल्कि जब कहीं सूखा पड़ता है तो मदद के नाम पर चंद टैंकर पानी की भीख पहुंचा दी जाती है, जो उस गांव के प्यासे लोगों के बीच कुछ ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बरसों से तपती जमीन पर पानी की बूंद पड़ते ही हवा हो जाती है।पूर्ववर्ती योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। वह भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में फैक्टरियां ही अधिकाधिक पानी पी रही हैं। कई बार फैक्टरियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींचता। जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। इसमें कहा गया है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी यह समस्या गंभीर है। परंपरागत कुएं और ट्यूबवेल में भूजल का स्तर काफी नीचे खिसक रहा है। तालाब बर्बाद हो रहे हैं और इन्हें अवैध रूप से खत्म किया जा रहा है।

  •  हमारे पास रिजर्व पुलिस है, रिजर्व आर्मी है, लेकिन रिजर्व पानी नहीं है। 

भारी वर्षा से आई भयंकर बाढ़ के लिए नुकसान का पैगाम बनकर आती है। लेकिन अनावृष्टि से उत्पन्न सूखा और उसका प्रभाव अधिक दुःखदाई होता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल ऐसी दिक्कत होने के बावजूद हम बारिश के पानी पर ही निर्भर क्यों हैं? आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था हो सके।जिन क्षेत्रों में सूखे की सबसे अधिक परेशानी साल दर साल आ रही है, उन क्षेत्रों में बारिश के पानी को संरक्षित करने के तरीके बताए जाने चाहिए। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में सरकार की तरफ से जल संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि सूखे जैसी स्थिति पैदा होने से पहले ही लोगों को पानी मुहैया कराया जा सके। ऐसा करने से न केवल सूखे से निपटा जा सकता है, बल्कि उन सैकड़ों किसानों की जान बचाई जा सकती है, जो सूखे की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।
अकाल में पैदो ले चार ही वंश
सासी, कुत्ता, गिद्ध और सरपंच।

बुंदेलखंड में कही जाने वाली ये लोकोक्ति कभी सूखे की त्रासदी को बयां करने के लिए कही गई होंगी। उस सूखे के लिए जिसके कारण आधे से ज्यादा भारत की आबादी पिछले तीन सालों से जूझ रही है। इस साल भी मानसून आने से पहले ही आधे भारत में सूखे के हालात बन रहे हैं। महाराष्ट्र के लातूर में पानी को बचाने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है तो मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर के पानी की रखवाली के लिए दस से ज्यादा बंदूकधारी 24 घंटे तैनात रहते हैं। मध्यप्रदेश के ही छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई कई किलोमीटर का सफर करने के बाद एक पहाड़ से बहने वाले झरने से बूंद बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। हमेशा पानी से लबालब रहने वाला नासिक का पवित्र रामकुंड 130 सालों में पहली बार पूरी तरह सूख गया है।उत्तर प्रदेश का गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र जहां दस साल पहले तक 30-40 फुट गहराई पर ही पर्याप्त पानी मिल जाता था वहां अब 100 फुट से ज्यादा खुदाई करने पर भी पानी नजर नहीं आता।
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एम के पाण्डेय ‘निल्को’
(युवा ब्लॉगर)



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