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26 September, 2015

होती है नर पर नारी भारी


अक्ल बाटने लगे विधाता, लंबी लगी कतारें
सभी आदमी खड़े हुए थे कहीं नहीं थी नारें ।
सभी नारियाँ कहाँ रह गई था ये अचरज भारी
पता चला ब्यूटी पार्लर में पहुँच गई थी सारी।
मेकअप की थी गहन प्रक्रिया एक एक पर भारी
बैठी थीं कुछ इंतजार में कब आएगी बारी
उधर विधाता ने पुरूसों में अक्ल बाँट दी सारी
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर जब पहुँची सब नारी
बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है नहीं अक्ल अब बाकी
रोने लगी सभी महिलाएं नींद खुली ब्रह्भा की
पूछा कैसा शोर हो रहा है ब्रह्मलोक के द्वारे
पता चला कि स्टॉक अक्ल का पुरुष ले गए सारे
ब्रह्मा जी ने कहा देवियों बहुत देर कर दी है
जितनी भी थी अक्ल वो मैंने पुरुषों में भर दी है
लगी चीखने महिलाये सब कैसा न्याय तुम्हारा
कुछ भी करो हमें तो चाहिए आधा भाग हमारा
पुरुषो में शारीरिक बल है हम ठहरी अबलाएं
अक्ल हमारे लिए जरुरी निज रक्षा कर पाएं
सोच सोच कर दाढ़ी सहलाकर तब बोलर ब्रह्मा जी
एक वरदान तुम्हे देता हूँ अब हो जाओ राजी
थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी रहे पुरुष पर भारी
कितना भी वह अक्लमंद हो अक्ल जायेगी मारी
एक औरत ने तर्क दिया मुश्किल बहुत होती है
हंसने से ज्यादा महिलाये जीवन भर रोती है
ब्रह्मा बोले यही कार्य तब रोना भी कर देगा
औरत का रोना भी नर की अक्ल हर लेगा
एक अधेड़ बोली बाबा हंसना रोना नहीं आता
झगड़े में है सिद्धहस्त हम खूब झगड़ना भाता
ब्रह्मा बोले चलो मान ली यह भी बात तुम्हारी
झगडे के आगे भी नर की अक्ल जायेगी मारी
तब बुढियां तुनक उठीं सुन यह तो न्याय नहीं है
हँसने रोने और झगड़ने की अब अपनी उम्र नहीं है
ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से अंतिम वचन हमारा
तीन शस्त्र अब तुम्हे दे दिए पूरा न्याय हमारा
इन अचूक शस्त्रों में भी जो मानव नहीं फंसेगा
निश्चित समझो, उस पागल का घर भी नहीं बसेगा
कहे प्रेम कविमित्र ध्यान से सुन लो बात हमारी
बिना अक्ल के भी होती है नर पर नारी भारी
प्रस्तुति
एम के पाण्डेय निल्को

24 September, 2015

मनन को मिलेगा नेशनल अवॉर्ड - अवंतिका स्वर्णिम भारत सम्मान

जयपुर के रहने वाले मास्टर मनन सूद को उनकी इंटेलिजेंस और स्मार्टनेस के लिए वर्ष 2015 के राष्ट्रीय स्तर पर अवंतिका स्वर्णिम भारत सम्मान के लिए चुना गया है। जयपुर के रूट्स पब्लिक स्कूल के प्रेप क्लास में पढ़ने वाले मनन को यह पुरस्कार उन्हें शॉर्प माइंड अच्छी याददाश्त के लिए नई दिल्ली में 10 अक्टूबर को दिया जा रहा है। मनन सूद यूं तो आम बच्चों सा दिखता है, लेकिन उसकी खासियत तब सामने आती है, जब कठिन से कठिन सवालों का जवाब वह बिना देरी किए देने लगता है। प्रेप क्लास में पढ़ रहे मनन को राजस्थान और देश के अलावा विश्व के मानचित्र में महारथ है। वह देश का स्थान और राजधानियां ऎसे बताता है, जैसे वर्णमाला सुना रहा हो। उसे केमिस्ट्री की आवर्त सारणी, सौर मंडल, देशों की मुद्राएं, आविष्कार और किताबों के रचनाकारों के नाम कंठस्थ हैं। इनसे जुड़ा कोई सवाल किसी भी वक्त उससे पूछ सकते हैं। महज चार वर्ष की आयु में जिले का नाम रोशन करने वाले मनन को सभी देशों की राजधानी, सभी आविष्कारों के बारे में जानकारी है किसी भी आविष्कार के वैज्ञानिक का नाम झट से बताता है, उसकी उम्र भले ही अभी छोटी है, मगर विश्व के देशों की भौगोलिक सीमाएं, क्षेत्रफल व अन्य तमाम जानकारियां उसे जुबानी याद हैं। आपने सवाल किया नहीं कि जवाब तुरंत हाजिर। इसी के फलस्वरूप मनन को सारे एटलस, सौरमंडल, देश, विदेश की राजधानी व राजनीति की बहुत जानकारी है।



05 September, 2015

Happy Teachers Day

आज पाँच सितम्बर है यानी शिक्षक दिवस। आज हम सभी उन अध्यापकों, गुरुओं, आचार्यों, शिक्षकों, मास्टरों, टीचरों को बधाइयाँ देते हैं, याद करते हैं, जिन्होंने हमारे जीवन-दर्शन को कहीं न कहीं से प्रभावित किया। गुरू को इश्वर से अधिक महत्व प्राप्त है। गुरू का नाम ज़रूर बदला है, लेकिन हरेक के जीवन में कहीं न कहीं गुरू रूपी तत्व का समावेश ज़रूर है। ज़रूरी नहीं कि गुरू किसी गुरू के चोंगे में ही हो। प्रत्येक का गुरू अलग है। किसी के लिए माँ गुरू है, किसी के लिए पिता तो किसी के लिए मित्र। आज #VMW_Group भी ऐसे ही सभी गुरुओ को प्रणाम करता है ।

सादर
एम के पाण्डेय निल्को

04 September, 2015

इस कविता को दिल से पढ़िये शब्द शब्द में गहराई है...

जब आंख खुली तो अम्‍मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था

उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था

हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया

मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी

उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था

मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी

मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग प्‍यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया

शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्‍तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया

हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी

हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्‍तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी

हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी

हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था

हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्‍धन तोड. आए
बंगले में कुत्‍ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए

उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए

हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए

मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्‍या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है

जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं

मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है

मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है

हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है

मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है

मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्‍य की काया है

मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्‍तों की गहराई है

मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्‍यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है

मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है

माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है

मां सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है

अम्‍मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है

सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं

हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं

(व्हाट्सएप्प से प्राप्त)

कविता क्या है ?

आखिर ये कविता है क्या ?

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