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23 August, 2015

नज़र निल्को की - तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना

पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 


उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता 'निल्को' रोज जैसे होली है 

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एम के पाण्डेय निल्को 
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