Blockquote

Followers

28 August, 2015

मुझे आरक्षण नहीं चाहिए

मैं ब्राह्मण हूँ और मुझे आरक्षण नहीं चाहिए क्योंकि :

1. मै निकम्मा और कामचोर नहीं हूँ मुझे अपनी मेहनत और काबिलियत पर पूरा भरोसा है ।

2. मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है और मै इस बात में विश्वास रखता हूँ की प्रतिभा के बल पर ही आगे बढ़ना चाहिए ।

3. मै चाहता हूँ की योग्य व्यक्ति को ही आगे बढ़ने का हक है और उसे उसका हक मिलना चाहिए । किसी का हक मार कर उसकी रोटी छीनने में मेरा विश्वास नहीं है।

4. मै देश की तरक्की में योगदान देना चाहता हूँ इसलिए देशद्रोहियों की तरह तोड़ फोड़ आगजनी जनहानि करके अपनी नाजायज मांग मनवाने में विश्वास नहीं रखता ।

5. मै खुद की समझ से काम करने में विश्वास रखता हूँ । कोई भी ऐरा गैरा मुझे धर्म और जाति के नाम पर उकसा दे ऐसा मुर्ख नहीं हूँ मै।

6. आरक्षण को मै जबरदस्ती मांगी गई भीख से अधिक कुछ नहीं समझता हूँ। इस तरह की खैरात लेकर मै अपने आप को सारी जिंदगी के लिए नाकाबिल नहीं बना सकता।

क्या आप भी अपने समुदाय से ये आशा रखते है ? क्या आप चाहेंगे की आपके योग्य बच्चे frustration में आकर कोई गलत कदम उठाये? यदि हाँ तो क्या हम इस धारणा को आगे बढ़ाने में सहयोग करेंगे ?
सादर
एम के पाण्डेय निल्को
www.vmwteam.blogspot.in

उसे कहते हैं बिटिया


घर आने पर दौड़ कर जो पास आये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए,
उसे कहते हैं बिटिया ।

"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं बिटिया ।

सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

दूर जाने पर जो बहुत रुलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।

"अनमोल हीरा" जो कहलाये,
उसे कहते हैं बिटिया

अगर आप भी अपनी बेटी को प्यार करते हैं तो आप इसे अपने दोस्तों को अवश्य शेयर करें ।

सादर
VMW Team

(व्हाट्सएप्प से प्राप्त)

23 August, 2015

नज़र निल्को की - तेरी नज़दीक वाली दूरिया


तेरी नज़दीक वाली दूरिया
लगती है जैसे गोलिया
तेरी हर अदा कुछ ख़ास नहीं
पर सहती है हर एक बोलिया


उसका बनना और सवरना
जैसे हो पानी का ठहरना 
पर इतराती ऐसे वो
जैसे दौड़ में भी टहलना

पुकारते है कई नाम से उसे 
धूप मे भी बारिश हो जैसे 
पर सुनती नहीं वो एक बार भी 
चाहे करा लो अपनी जैसे तैसे  
झील सी आखे है उसकी 
पर पता नहीं है वो किसकी 
मिलने का बनाया था इरादा 
किन्तु नहीं दी पता वो घर की 


उसकी खामोसी जब जब बोली है 
असर करती जैसे दर्द -ए -दिल की गोली है 
सारे पर्व और त्योहार उसके चेहरे पर 
और खेलता 'निल्को' रोज जैसे होली है 

**************

एम के पाण्डेय निल्को 

22 August, 2015

उठो लाल अब आँखे खोलो

उठो लाल अब आँखे खोलो
मोबाईल ऑन कर नेट टटोलो..
चलो देख लो वाट्सएप पहले
ज्ञान जोक्स पर रोले हंस ले।
फेसबुक की है दूसरी बारी
जहाँ दिखेगी दुनिया सारी
देखो किसने क्या है डाला
किसने कितना किया घोटाला
कौन आज दुनिया में आया
किसने किससे केक कटाया
ट्विटर की तो बात निराली
चार शब्द् में गाथा गा ली।
उठो तुम भी कुछ लिख लिख बोलो
उठो लाल अब आँखे खोलो
मोबाईल ऑन कर नेट टटोलो..!!

17 August, 2015

Worlds 8 superb sentences

--------------<>-------------

Shakespeare :

Never  play  with the feelings

of  others  because  you may

win the  game but the  risk is

that  you  will surely  lose

the person  for a  life time.

--------------------------------

Napoleon.

The world  suffers  a  lot. Not

because  of  the  violence  of

bad people, But because   of

the silence of good people!

--------------------------------

Einstein :

I  am  thankful  to  all those

who  said  NO  to  me   It's

because  of  them  I  did  it

myself.

--------------------------------

Abraham Lincoln :

If friendship is your weakest

point  then  you  are  the

strongest  person  in the

world.

--------------------------------

Shakespeare :

Laughing  faces  do  not

mean that  there is  absence

of sorrow!  But it means that

they  have the ability to deal

with it.

----------------------

William  Arthur :

Opportunities   are  like

sunrises, if  you  wait too

long  you  can miss them.

------------------------------

Hitler :

When  you  are  in  the light,

Everything follows  you, But

when  you  enter  into   the

dark, Even your own shadow

doesn't  follow  you.

--------------------------------

Shakespeare :

Coin  always  makes  sound

but  the  currency  notes are

always  silent.  So  when

  your value  increases

keep quiet.

Thanks
M K Pandey Nilco
VMW Team

14 August, 2015

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई |

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
 एवं शुभकामनायें

आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के '0' को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
जय हिन्द! जय भारत!

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद .........!

स्वतंत्रता दिवस - आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है -

आजादी के नए संघर्ष का वक्त हमने आजादी जनता के लिए प्राप्त की थी और नारा दिया था कि हम ऐसी व्यवस्था अपनाएंगे जो जनता की जनता द्वारा और जनता के लिए होगी, लेकिन आजादी के 68 साल बीतने के बाद अनुभव यह हो रहा हे कि हमारी सत्ता अंग्रेजी सत्ता के समान ही कुछ निहित स्वार्थी लोगों के हित चिंतन में सिमटकर रह गई है। क्या आजादी का संघर्ष इसीलिए किया गया था? युवाओं ने इसीलिए बलिदान दिया था कि अंग्रेजों के स्थान पर कुछ 'स्वदेशी' लोग सत्ता का उपयोग करें। सत्ता का हस्तानांतरण हुआ है, लेकिन उसके आचरण में बदलाव नहीं आया है। जब भी 15 अगस्त नजदीक आता है मुझे ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं-आज हथकड़ी टूट गई है, नीच गुलामी छूट गई है, उठो देश कल्याण करो अब, नवयुग का निर्माण करो सब।
क्या सचमुच हथकड़ी टूट गई है और गुलामी से छुटकारा मिल गया है? हमारी शक्ति किसके कल्याण में लग रही है और कौन से नवयुग का हम निर्माण कर रहे हैं। यदि कुछ चमचमाती सड़कें, सड़कों पर पहले की अपेक्षा सौ गुना अधिक दौड़ रहे वाहन, शहरों का निरंतर विस्तार, तकनीकी उपकरणों की भरमार और कर्ज के सहारे निर्वाह को नवयुग का कल्याण माना जाए तो हम सचमुच 15 अगस्त 1947 के बाद बहुत आगे बढ़ गए हैं, लेकिन जिन जीवन मूल्यों के लिए हमने आजादी की जंग लड़ी, क्या उस दिशा में कोई प्रगति हुई है? देश में बढ़ते एकाधिकारवादी आचरण ने सत्ता को इतना भ्रष्ट और निरंकुश कर दिया है कि उसकी चपेट में आकर सारा अवाम कराह रहा है। महात्मा गांधी का मानना था कि गांवों का विकास ही उत्थान का प्रतीक होगा। गांवों में जीवन मूल्य के बारे में अभी भी संवेदनशीलता है। हमने पंचायती राज व्यवस्था को तो अपनाया है, लेकिन गांवों को उजड़ते जाने से नहीं रोक पा रहे हैं। कृषि प्रधान देश में खेती करना सबसे हीन समझा जाने लगा है। शिक्षा के लिए अनेक आधुनिक ज्ञान वाले संस्थान जरूर स्थापित हो गए हैं, लेकिन वहां से 'शिक्षित' होकर निकलने वालों की पहचान किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचा वेतन पाने के आधार पर हो रही है। स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन की भावना तिरोहित होती जा रही है। कर्ज जिसे आजकल 'एड' का नाम दे दिया गया है, एकमेव साधन बनकर रह गया है, जिसने हमें फिर गुलामी की तरफ धकेल दिया है। राजनीतिक आजादी तो मिली, लेकिन आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास न होने के कारण हम आर्थिक रूप से गुलाम होते जा रहे हैं, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में हुआ था। तब भी शासक तो स्वदेशी ही थे, लेकिन उनको चलना ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुसार पड़ता था। आज हम भी अपने आर्थिक क्षेत्र को विश्व बैंक या विश्व मुद्रा कोष के पास गिरवी रख चुके हैं। जिन वस्तुओं की हमें जरूरत भी नहीं है उनको आयात करने की विवशता से हम बंधते जा रहे हैं। हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं। 
हम यह जानते हैं कि किसके द्वारा और किस-किस प्रकार से असुरक्षा पैदा की जा रही है, लेकिन हम कार्रवाई नहीं कर सकते, क्योंकि उसके लिए किसी की रजामंदी जरूरी है। हमारा ध्यान केवल सत्ताधारी बने रहने तक सीमित हो गया है। उसे पाने के लिए समाज में संविधान के उपबंधों के अनुसार समान नागरिकता की भावना पैदा करने के बजाय हम वैसा ही उपाय करते जा रहे हैं जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। उससे भी उसमें बढ़कर हम जातियों, उपजातियों आदि की पहचान उभारने में लगे हुए हैं। लालबहादुर शास्त्री ने संकट से उबरने के लिए सोमवार को अन्न न खाने की जो अपील की उससे कोई बहुत बड़ी बचत नहीं होने वाली थी, लेकिन लोगों ने उनकी बात मानी थी। आज क्या यह संभव है?

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें


 एम के पाण्डेय निल्को

आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! धन्यवाद .........!

13 August, 2015

Must Read at Least Once..! -VMW Team


1. जब साइंस नाम भी नहीं था तब भारत में नवग्रहों की
पूजा होती थी..!
•••
2. जब पश्चिम के लोग कपडे पहनना नहीं जानते थे.
तब भारत रेशम के कपडों का व्यापार करता था...!
•••
3. जब कहीं भ्रमण करने का कोई साधन स्कूटर मोटर साईकल, जहाज वगैरह
नहीं थे.
तब भारत के पास बडे बडे वायु विमान हुआ करते थे। (इसका उदाहरण आज भी अफगानिस्तान में निकला महाभारत कालीन विमान है. जिसके पास जाते ही वहाँ के सैनिक गायब हो जाते हैं। जिसे देखकर आज का विज्ञान भी हैरान है)...!
•••
4. जब डाक्टर्स नहीं थे.
तब सहज में स्वस्थ होने की बहुत सी औषधियों
का ज्ञाता था,
भारत देश सौर ऊर्जा की शक्ति का ज्ञाता था भारत देश।
चरक और धनवंतरी जैसे महान आयुर्वेद के आचार्य थे भारत देश में...!
•••
5. जब लोगों के पास हथियार के नाम पर लकडी के टुकडे हुआ करते थे.
उस समय भारत देश ने आग्नेयास्त्र, प्राक्षेपास्त्र, वायव्यअस्त्र बडे बडे परमाणु हथियारों का ज्ञाता था भारत....!
•••
6. हमारे इतिहास पर रिसर्च करके ही अल्बर्ट आईंसटाईन ने अणु परमाणु पर खोज की है...!
•••
7. आज हमारे इतिहास पर रिसर्च करके नासा अंतरिक्ष में ग्रहों की खोज कर रहा है...!
•••
8. आज हमारे इतिहास पर रिसर्च करके रशिया और अमेरीका बडे बडे हथियार बना रहा है..!
•••
9. आज हमारे इतिहास पर रिसर्च करके रूस, ब्रिटेन, अमेरीका, थाईलैंड, इंडोनेशिया बडे बडे देश बचपन से ही बच्चों को संस्कृत सिखा रहे हैं स्कूलों मे...!
•••
10.आज हमारे इतिहास पर रिसर्च करके वहाँ के डाक्टर्स बिना इंजेक्शन, बिना अंग्रेजी दवाईयों के केवल ओमकार का जप करने से लोगों के हार्ट अटैक, बीपी, पेट, सिर, गले छाती की बडी बडी बिमारियाँ ठीक कर रहे हैं।
ओमकार थैरपी का नाम देकर इस नाम से बडे बडे हॉस्पिटल खोल रहे हैं..!
और हम किस दुनिया में जी रहे हैं?? अपने इतिहास पर गौरव करने की बजाय हम अपने इतिहास को भूलते जा रहे हैं।
हम अपनी महिमा को भूलते जा रहे हैं।
हम अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं..!!

मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा

किसी राजा के पास एक बकरा था ।
एक बार उसने एलान किया की जो कोई
इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।
किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं
इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।
इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।
वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन
उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई
और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है
अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,
बकरे के साथ वह राजा के पास गया,,
राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।
इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने
उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।
बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया
किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो
वह फिर से खाने लगता।
एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,
मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया।
जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,,
सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, अंत में बकरे ने सोचा की यदि
मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी।
शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा,,
बकरे को तो उसने बिलकुल घास नहीं खिलाई थी
फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है।
अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा,,
लो कर लीजिये परीक्षा....
राजा ने घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या
देखा और सूंघा तक नहीं....
बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर
घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी....अत: उसने घास नहीं खाई....

मित्रों " यह बकरा हमारा मन ही है "

बकरे को घास चराने ले जाने वाला ब्राह्मण " आत्मा" है।

राजा "परमात्मा" है।

मन को मारो नहीं,,, मन पर अंकुश रखो....
मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा।

अतः मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज पीटो..
कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है...
पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में 
एक जैसी ही होती है...!!

 बहुत सुन्दर सन्देश -::

अगर आप किसी को छोटा देख रहे हो, तो आप उसे;

या तो "दूर" से देख रहे हो,
या अपने "गुरुर" से देख रहे हो !...
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

02 August, 2015

ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया
वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।
अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।
जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।
सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया....
अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।
जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया।

ध्यान रखे
आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि ,
आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा
कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा
कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे...
ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

सकारात्मक रहे
सकारात्मक जिए...

01 August, 2015

Whatsapp हंगामा पार्ट 1

सुनो सुनो ए राष्ट्र कलंकों,सुनो दलालों भारत के,
सुनो सुनो गीदड़,सियार,ढोंगी घड़ियालों भारत के,

सुन लो वृद्ध अवस्था में बौराये जेठमलानी जी,
सुनो शत्रुघन सुनो आज़मी,नहीं चली शैतानी जी,

सबसे तेज खबर के पंडित पापी पूण्य प्रसून सुनो,
अभय दुबे-सागरिका जिनका सूख गया है खून सुनो

आतंकी पर रोने वाले सैफ और सलमान सुनो,
दिल्ली के अरविन्द,शाजिया,संजय सिंह,खेतान सुनो,

सुनो सानिया,सुनो तीस्ता,और अकबरुद्दीन सुनो,
डर्टी पिक्चर करने वाले शाह नसीरुद्दीन सुनो,

कलकत्ता की कोरी ममता,सचिन पायलट लाल सुनो,
अबू आज़मी-सिद्धरमैया,भूषण से बेहाल सुनो,

सुन आज़म,सुन ले शकील, कुंठित ईमाम बुखारी सुन,
ओ पागल ओवैसी,ड्रामा नही रहेगा जारी सुन,

ये नितीश लालू फांसी पर करते बड़ा कलेश रहे,
इनके साथ खड़े भी देखो यू पी के अखिलेश रहे,

सुनो द्रोहियों के हाथो में पल भर में बिकने वालों,
राष्ट्रपति को क्षमा दान की चिट्ठी तक लिखने वालों

चिठ्ठी लिखने वालों ने गंगा में कीचड घोल दिया,
चिठ्ठी ने भी चीख चीख इन सबका चिठ्ठा खोल दिया,

छाती पीटो आंसू डालो सबका चेहरा साफ़ हुआ,
सबसे बड़ी अदालत का सबसे धाँसू इन्साफ हुआ,

विस्फोटों में जो तड़पे थे उन सबका अरमान कहे,
गद्दारों पर रहम नही हो ये हिन्दू का हिन्दुस्तान  कहे,

राष्ट्रप्रेम की माटी  में मज़हब की उगती दूब नही,
रह पायेगा हरगिज़  ज़िंदा अब कोई याकूब नही.
          वंदेमातरम

असर आधुनिकता का

👗 कपड़े हो गए छोटे
🙈 लाज कहा से आए
🌾 अन्न हो गया हाइब्रिड
💪 ताकत कहा से आए
🌺 फूल हो गए प्लास्टिक के
😔 खुशबू कहा से आए
👩 चेहरा हो गया मेकअप का
👸 रूप कहाँ से आए
👨 शिक्षक हो गए टयुशन के
📚 विद्या कहाँ से आए
🍱 भोजन हो गए होटल के
✊ तंदरुस्ती कहाँ से आए
📺 प्रोग्राम हो गए केबल के
🙏 संस्कार कहाँ से आए
💵 आदमी हो गए पैसे के
🙉 दया कहाँ से आए
🏭 धंधे हो गए हायफाय
🎁 बरकत कहाँ से आए
👳 भक्ति करने वाले स्वार्थी हो गए
👤 भगवान कहाँ से आए
👫 मित्र हो गया व्हाट्सऐप के
💃🏃 मिलने कहाँ से आए
😂😂😪😥😰😂😂
सादर
एम के पाण्डेय निल्को

Loading...