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31 July, 2015

बच्चा हूँ या हो गया अब बड़ा

बचपन पर चढ़ी धूल
बच्चे खेलना गए भूल
रोज पानी देने पर भी
बगीचे के मुरझा रहे फूल

करता हूँ बस तीन चार बाते
जिसमे नहीं कोई भी करमाते
हो गए हम बड़े फिर भी
बच्चो की तरह ही शरमाते

रंग बिरंगे कागज के वो कतरन
फटे पुराने कपड़े और टूटे हुये बरतन
कह रही थी वो एक कहानी
और भीग रहा था मेरा तनमन

बच्चा हूँ या हो गया अब बड़ा
सबके निगाहों मे मैं ही क्यू पड़ा
कहने और सुनने की आज़ादी है सबको
पर सब केवल ‘निल्को’ के आगे ही क्यो अड़ा

योगेश का युग आएगा कब
निशु अपना निशान दिखाएगा कब
ये जो दिखते है न भोले
असल मे है वो गजेंद्र के गोले

मत पुछो मोहक की मार
जैसे हो दोधारी तलवार
करता है वो ऐसे असर
जैसे है निल्को की नज़र

बात करे जब अभिव्यक्ति अभिषेक की
कम नहीं है अगड़ाई अनुज की
मिल जाते ये सब जब धुरंधर
कहते है सब कृपा है टीम की

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