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28 April, 2015

तेरी याद मुझे क्यों सताती है

तेरी याद मुझे क्यों सताती है
तन्हाई में क्यों रुलाती है
जब जब मिलते है हम
पता नहीं क्या आखो से वो पिलाती है
उसका नशा जैसे बोतल शराब की
लगती है वो हरदम बवाल सी
चाल है  उसकी जैसे मतवाली
कहती है बना लो घरवाली
जब बाज़ार में निकले वो शाम
लगती है भीड़ जैसे हो आम
दुपट्टे का कोना मुंह में दबाये
जैसे हो वो बनारसी पान
तेरा बनना और सवरना
जैसे समुन्द्र में हो तैरना
तेरी आखो में देखकर मुझे
मिलता सकूँ जैसे देख झरना
जब अपने मीठे होठो से
कहती है मेरे हो तुम ‘अनुज’
बस यह सुन कर मैं
भूल जाता की मैं हूँ मनु
झील सी नयन में उसके
तैरने का मन करता है
पर कही डूब न जाऊ
दिल इस बात से डरता है
लाख प्रसंशा उसकी लिखू पर
पानी फेर देती है वो
जब शाम को मिलने को
कहती है की बिजी है वो
मेरे बारे में चाहे वो कुछ सोचे
या तुम से कुछ भी न बोले
हर बार मैं यही समझाऊ की
तेरे आगे कोई न डोले
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अनुज शुक्ला



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