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06 February, 2015

लिखता हूँ बचपन की वो कहानी - एम के पाण्डेय ‘निल्को’

बचपन की वो दुनिया
पचपन की उम्र में भी नहीं भूलती
क्योंकि जो की थी शरारते
वो भी कुछ नहीं कहती ।।  

न तो लोग बुरा मानते
और न ही मुझे मनाते
रूठे और मनाने के खेल से
हम किसी को नहीं सताते ।।

शाम को जब हम छत पर जाते
खेलते कूदते नहीं घबराते
पर आज के इस परिवेश में
हम बचपन को ही खोते पाते ।।

त्योहारों पर करते थे जो मस्ती
देखती रहती थी पूरी बस्ती
पर अब कोई साथ नहीं है
अकेलापन ही है अब सस्ती ।।

वो पेड़ों पर चड़ना और लटकना
मिट्टी में एक दूसरे को पटकना
छुपन छुपाई हो या हो सरकना
इसके लिए है अब तरसना ।।


लिखता हूँ बचपन की वो कहानी
खुद ही यानि निल्को की जुबानी
पर यह कलम अब नहीं चलती सुहानी
क्योंकि यह कविता शायद है अभी बाकी .......।।
-

एम के पाण्डेय निल्को
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