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03 February, 2015

जब बचपन था, तो जवानी एक ड्रीम था

आज एक मित्र ने भेजा अच्छा लगा इसलिए आप के समक्ष पेश किया । अद्भुत रचना और सटीक मनन स्थिति । रचनाकार को तो नहीं जानता किन्तु एक प्रशसनीय रचना के लिए बधाई और अनंत शुभकामनाये ।

जब  बचपन  था,  तो  जवानी  एक  ड्रीम  था...
जब  जवान  हुए,  तो  बचपन  एक  ज़माना  था...

जब  घर  में  रहते  थे,  आज़ादी  अच्छी  लगती  थी...आज  आज़ादी  है,  फिर  भी  घर  जाने  की   जल्दी  रहती  है...

कभी  होटल  में  जाना  पिज़्ज़ा,  बर्गर  खाना  पसंद  था... आज  घर  पर  आना  और  माँ  के  हाथ  का  खाना  पसंद  है...

स्कूल  में  जिनके  साथ  ज़गड़ते  थे,  आज  उनको  ही  इंटरनेट  पे  तलाशते  है...

ख़ुशी  किसमे  होतीं है,  ये  पता  अब  चला  है...
बचपन  क्या  था,  इसका  एहसास  अब  हुआ  है...

काश  बदल  सकते  हम  ज़िंदगी  के  कुछ  साल...काश  जी  सकते  हम,  ज़िंदगी  फिर  एक  बार...!!

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