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28 January, 2015

सोच रहा हूँ लिखू रानीखेत एक्सप्रेस की कहानी

दोस्तों अभी ट्रेन में सफ़र कर रहूँ और मन बेचैन हो रहा है । मुक्तक लिखने की सोचा तो विषय से भटक गया और मुक्तक की जगह लिख दिया पुक्तक । जैसे जैसे ट्रेन आगे बढ़ रही है ठण्ड उसका साथ बखूबी निभा रही है । सोच रहा हूँ लिखू रानीखेत एक्सप्रेस की कहानी निल्को की जुबानी , किन्तु भारतीय रेल इसमें बाधा उत्पन्न कर रही है । न तो कोई चार्जिंग की जगह और ना की कोई माहौल।
अभी तो इन पुक्तक से ही काम चलाये अगली बार कुछ नया जरूर लेकर आउगा । सादर - एम के पाण्डेय निल्को

की मेरे जाने या आने में
निल्को याद आता है ।
जहाँ भी मैं तो जाता हूँ
पास उसको ही पाता हूँ ।।

क्या गज़ब वो सफ़र था
क्या अजब वो पहर था ।
गांव की उसअजीबोगरीब
गलियो में एक शहर था ।।

तुम्हारी याद आती है
नज़ारे जो भो सोचता हूँ।
कोई जब रूप धरता हूँ
तो तुम रास आती हो।।

ठण्ड के इस मौसम में
बर्फ जब भी जमती है।
तुम्हारी सोच की गरमाहट
पसीने से तर बतर करती है।।

एम के पाण्डेय निल्को

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