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31 December, 2014

हैरान कर दिया – अनुज शुक्ला

एक बार फिर उसने हैरान कर दिया
बात कर के परेशान कर दिया
बार बार हाल पूछ कर
मुझे ही बीमार कर दिया |
पूछता हूँ की – क्यों दरवाजा बंद
तो मेरा हाल बेहाल कर दिया
क्यों कमरे के शीशे तोड़ कर
अपने ही घर में मेहमान कर दिया |
किसी की ख़ामोशी को समझने के लिए
खुद को ही खामोश कर दिया
यही तो था मेरा गाँव खुशियों का
बता तूने क्यों मुझे गुमनाम कर दिया |
बता कौन आया था मिलने तुमसे
जिसने जीना हराम कर दिया
तुम्हारी गलिया नहाती थी मेरी रचनाओ से
आज क्यों तुमने वीरान कर दिया |
पता तो था की तुम मेरी नहीं
इसलिए मैंने तुम्हे अस्वीकार कर दिया
कुछ इस तरह मैंने अपनी जिन्दगी को  
शायद आसान कर दिया |
रोती रहेगी अब हर आँख
और हर चीज को उसने तार तार कर दिया
और चारों ओर एक खिन्न दृष्टि से देख कर
तुमने असफल इतिहास को त्याग कर दिया |
मैं तो आज भी गम का ज़हर पिया करता हूँ
यह कह कर उसने भी ‘अनुज’ का नाम कर दिया
इन रिश्तों की उलझनों में मैंने ख़ुद को कही खो दिया.
और इस तरह मैंने ज़िंदगी  को आसान कर लिया |

अनुज शुक्ला

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