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24 November, 2014

जिजीविषा.....डायरी के पीले पन्ने (ii)


                              उस रात वो आई थी मेरे पास,संध्या के तुरंत बाद का का समय था | हवा चल रही,हम दोनों नदी के किनारे पर बैठे हुए थे | झुरमुटो से गुजर कर आने वाली हवा हमे अकेले होने का अहसास दिला रही थी |
छोटे छोटे पौधे बैठे हुए मानव आकृति का अहसास दिला रही थी जो रह रह के हिल रही थी |
झींगुरो की आवाज रुक रुक के निनाद करती थे , कुछ दूर से मछुवारों के जाल डालने की आवाज आ रही थी जो अक्सर देर शाम तक नदी किनारे रहा करते थे | वो मुझसे बता रही थी कि किस तरह से उसके उसे बाप ने बुरी तरह मारा था |  उसकी उंगलियाँ चोटिल हो गई थी इस बात का पता हमे तब चला जब उसके हाथों को मैंने थामा था , दर्द से कराह उठी थी वह | उसके सर के बाल बेरहमी से उखाड़े गये थे जिसके निशान साफ़ साफ़ अँधेरे में भी नजर आते थे , मेरी उठी नजर अचानक रुक गयी जब मैंने उसके माथे को चूमना चाहा था |
मुझे ग्लानि की अनुभूति हो रही थी पता न क्यूँ इन सबकी वजह मै खुद को  मान रहा था , पूरी दुनिया से मुझे नफ़रत सी होने लगी थी , ऐसा लग रहा था मानो कही से मुझे शक्ति मिल जाय और मै पूरी दुनिया को जला के ख़ाक कर दूं | उसने दो दिन से कुछ खाया नही था बोली मार खा खा के खाने का मन नही करता |
मै सिहर सा गया मानो मेरी समझ में कुछ भी न आ रहा था मै चलने को उद्यत हुआ वो भी उठ गयी , किनारे पर बैठे मेंढक पानी में कूद पड़े |
‘कुछ देर और रुकते है ‘ मैंने कहा था कुहरा गिरने लगा था |
‘पापा जान गये तो जान ले लेंगे मेरी’ उसने मुझसे कहा | मौसम खामोश था , हवा अब कुछ ज्यादा तेज चलने लगी थी जिसने स्तब्धता तोड़ने की भरपूर कोशिश की |
मैंने उसका चेहरा अपनी हाथो में लिया तो मेरी हथेलियाँ गीली हो गई , उसका चेहरा आंसुओ से सराबोर था |
तुम रो रही हो ? मैंने पूछा तो सिसक के बोली इसके सिवा कुछ और वश में नही ना ?
मै अपने आप से घृणा करने लगा क्यूँकि मैं खुद को अपराधबोध से ग्रस्त महसूस कर रहा था ,हम साथ चल रहे थे गाँव की ओर |
साढ़े आठ बज चुके थे , गाँव में से कुत्तों के भौकने की आवाज आ रही थी जो कुछ देर चुप रहते और फिर शुरू हो जाते थे |
मुझे वो दिन याद आ रहे थे जब हम दोनों फटे हुए कुर्ते में साथ में गाँव में पढने जाते थे तब तो किसी को कोई ऐतराज न था फिर आज क्यों.....?
हाँ हम बड़े हो गये थे और समाज इसकी आज्ञा नहीं देता कि दो युगल आपस में ज्यादा बात करे , एक दुसरे का ख़याल रखे , एक दुसरे के ज्यादा करीब जाए जब उनमे कोई सामाजिक रिश्ता ना हो !
‘क्या सोच रहे हो ?’ ....उसने पूछा |
हाँ ...कुछ नही बस ..बचपन के दिन याद कर रहा था ....
“चलो इस दुनिया से बहुत दूर चलते है जहाँ केवल हम हो और हमसे नफ़रत करने वाला कोई नही ..
मुझे अपने साथ ले चलो “ उसने रोते हुए कहा |
हमने कहा ‘हाँ समय दो कुछ ‘ ..मैंने सांस छोड़ते हुए कहा |
‘मुझे बहुत डर लग रहा है ‘ उसने फिर कहा |
मैंने कहा “सब ठीक हो जायगा “और उसे गले लगा लिया पर दिल की धडकनें उसे बता रही थी कि ये सच नही है कुछ ठीक नही होने वाला |
साढ़े नौ हो चुके थे हवा और उग्र रूप धारण कर हमे आगाह रही थी , ताड़ का पेड़ शोर मचा मचा के हमे किसी अनहोनी की मानो सूचना दे रहा था  हम समय से बेखबर थे |
अब मुझे जाना चाहिए कहते हुए वो अलग होकर जाने लगी , ‘कब मिलोगी ?’ मैंने पूछा |
‘पता नही‘  कहते हुए धीरे धीरे अँधेरे में गायब हो गयी |
वो आखिरी मुलाकात थी हमारी ..नही एक और मुलाक़ात बाकी थी |

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क्रमशः

                                      Tripurendra Ojha 'Nishaan'
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