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25 November, 2014

जिजीविषा 2......डायरी के पीले पन्ने (ii) -Tripurendra Ojha 'nIshaan'

गतांक से आगे,,,,
                    

सुबह के नौ बजे मै उठा सर दर्द सा महसूस हो रहा था , सीधे छत पर पहुंचा | घना कुहरा गिरा था , बमुश्किल मै उसके छत पे देख सका था , वो वहां न थी | वो वहां रोज ही कपडे डालने के बहाने आया करती थी जो आज कल कम हो गया था | मै दस मिनट रेलिंग के पास खड़ा रहा , सूर्य कांतिहीन, धूमिल सिर्फ एक चमकते आईने के समान दिख रहा था , गली के आते जाते आदमी भूत जैसे दिखते थे | मौसम सर्द था , मै शिथिल खड़ा रहा कुछ देर और ये आशा लिए कि वो आ जाय पर ....
अचानक नीचे कुछ लोगों का कोलाहल सुनाई पड़ा जो कि उसके घर के तरफ से आ रही थी , मै भाग के सीढ़ियों की तरफ लपका और लगभग दौड़ते हुए उसके घर के सामने जा के खडा हो गया |
दरवाजे पर कुछ लोग घबराए हुए खड़े थे दरव्वाजा अन्दर से बंद था और अन्दर से उसके तेज तेज चीखने की आवाज आ रही थी | मुझसे बर्दाश्त न हुआ और मै किसी कि परवाह किये बिना भाग कर दरवाजे से चिपक गया | घबराहट और क्रोध का मिश्रण लिए भाव मै गेट खुलने का इन्तेजार कर रहा था |
बाहर खड़े लोग मुझे देख रहे थे और मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका लिए जोर जोर धड़क रहा था |
उस सर्द मौसम में मेरे माथे पर पसीने छलछला आये थे | अचानक दरवाजा भड़ाक से खुला और मेरे करीब से एक आग का गोला गुजरा , मै सन्न रह गया वो आग कि लपटों में घिरी हुई थी औ बुरी तरह चिल्ला रही थी कि अचानक उसने मेरी तरफ देखा और और इस आस में कि मै उसे बचा लूँगा मेरी तरफ भागी |
मेरे पास आने के ठीक दो गज पहले वो गिर गयी और तड़पने लगी | मै किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये देखता रहा , ये सब मेरे आँखों के सामने हो रहा था और मै अपनी एक ऊँगली हिला पाने में असमर्थ था , मै स्तब्ध था वो तड़प तड़प के मेरे सामने मर गयी और मेरा शरीर सिर्फ एक बुत बन के रह गया | कुछ लोग मुझे खींच रहे थे फिर कुछ याद नही ............................
                           आँख खुली तो मै अपने घर में था कुछ लोग मुझे घेरे खड़े थे , वो मुझे रोकते मै बाहर निकल आया और ठीक उसी जगह मै जा खड़ा हुआ जहाँ अभी तक उसके जले मांस के टुकड़े जमीन में चिपके थे , बहुत ज्यादा भीड़ जमा थी और सबकी आँखे मुझे प्रश्नवाचक नगाहों से देख रही थी |
मै जमीन पर बैठ गया, तब तक एक वर्दीधारी पुलिस वाला आया और मुझे लगभग घसीटते हुए जीप में डाल दिया |
मै थाने पहुंचा जहाँ उसके बाप और भाई पहले से मौजूद थे , बाप बता रहा था ‘साब रात को मेरी बेटी देर से आई तो मैंने गुस्से में मार दिया ..उसका भाई भी पता नही क्या गिडगिडाने लगा था , रुक रुक के वो मेरी तरफ देख कर भी कुछ कहते थे | मेरी पलक भी बंद नही हो रही थी पता नही थानेदार मुझसे कुछ पूछने का असफल प्रयत्न कर रहा था | अब मेरे पास न तो कोई उत्तर था और न कोई सवाल , कुछ थप्पड़ भी बरसाए उसने और अंत में मुझे थक कर छोड़ दिया |
                         मै पैदल चला जा रहा था कहाँ ,पता नही ..पर हाँ मेरे पैर बिल्कुल ठीक पड़ रहे थे |मेरा गाँव छह किलोमीटर दूर पड़ता था , पुल से होकर गुजरा तो किसी मोटर साईकल ने ठोकर मार दिया , मै गिर गया ..और पड़ा रहा | बाइक वाला जा चुका था , कुछ लोगों ने उठने  में मेरी मदद की और मै फिर चल दिया | बहुत जोर कि ठण्ड लग रही थी पर माथे से पसीना आ रहा था , गर्म था , हाथ लगा क्र देखा तो खून था शायद मेरे सर में चोट लगी थी | मैंने चेहरा पोंछना जरुरी न समझा और चलता रहा जब तक कि मुझे थकान महसूस न होने लगी |
मै अपने गाँव का रास्ता छोड़ चुका था कि अचानक देखता क्या हूँ कि वो दूर धवल वस्त्रों में नजर आ रही है |
मैंने अपनी चाल तेज कर दी ,मै जल्द से जल्द उस से मिलना चाहता था |
शाम हो गयी थी वो मुझे अपने पीछे बुला रही थी और मै पागलों कि भांति दौड़ता जा रहा था | वो नदी के तरफ जा रही थी मैंने चिल्ला के बोलना चाह पर मेरे कंठ से स्वर नही फूटे |
वो मेरे करीब आती जा रही थी , हम दोनों नदी के किनारे पर थे केवल दो गज दूर थी वो | वो मुस्करायी ,   सफ़ेद कपड़ों में वो आज बला की खूबसूरत लग रही थी | वो धीरे से नदी में उतर गयी और मुझे मुस्कुरा के बुलाया और मै बढ़ता चला गया |
                             मै उसके बेहद करीब था , मै देख सकता था उसके चेहरे पर चोट का कोई निशान न था , मैंने बढ़ के उसके हाथों को थाम लिया ,उसके उँगलियों के चोट भी गायब थे |
मैंने उसके माथे को चूमा , मेरे दोनों पैरों ने जमीन छोड़ दिया | उसने अपने बाहें फैला दी , मेरी आँखे मुंदने लगी थी ...........उसके ठन्डे हाथ मेरे सिर पर थे , उसने मुझे अपने आगोश में ले लिया था और मै एक दम निश्चिन्त था ..................................................................................
                      
TRIPURENDRA OJHA 'NISHAN'
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