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29 November, 2014

फ्रिज में रखे आटे के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी।

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है।
ऋषि- मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है। ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है। शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है। गूंथे हुए आटे को उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं। जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं। आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती।
पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही।

आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सके । 

अखिल भारत शिक्षा संघर्ष यात्रा - 2014


महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के जन्म दिवस के मौके पर मध्य प्रदेश के अनेक जन-पक्षीय संगठनों ने अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच और देश के 20 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में इससे जुड़े तकरीबन 45 सदस्य-संगठनों व 100 से ज्यादा बिरादराना संगठनों द्वारा आयोजित की जा रही अखिल भारत शिक्षा संघर्ष यात्रा-2014 में सक्रिय भागीदारी की घोषणा की।
इस यात्रा का मकसद है शिक्षा में बाजारीकरण और सांप्रदायीकरण व हर तरह के भेदभाव के विरुद्ध जनता के व्यापक हिस्सों को संगठित करना ताकि केजी से पीजी तक पूरी तरह मुफ्त और राज्य द्वारा वित्त-पोषित समान शिक्षा प्रणाली की स्थापना की जा सके जो समतामूलक, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, प्रबुद्ध और मानवीय भारत का निर्माण करने में सक्षम हो जिसका ख्वाब शहीद भगत सिंह व उनके क्रांतिकारी साथियों ने देखा था।


आयोजन समिति के सदस्य लोकेश मालती प्रकाश ने कहा कि अखिल भारत शिक्षा संघर्ष यात्रा में:-

 (क) हम समानता के मूलभूत संवैधानिक उसूल का उल्लंघन करने वाली मौजूदा भेदभावपूर्ण बहुपरती शिक्षा प्रणाली का विरोध करेंगे और पूरी तरह से राज्य द्वारा वित्त-पोषित व बराबरी पर आधारित, 12वीं कक्षा तक समान पड़ोसी स्कूल व्यवस्था समेत, केजी से पीजी तक की समान शिक्षा प्रणाली के लिए संघर्ष करेंगे जिसमें बच्चों व युवाओं को उनकी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, आंचलिक, जातीय, भाषाई या लैंगिक पृष्ठभूमि और शारीरिक या मानसिक विकलांगता के आधार पर भेदभाव किये बगैर पूरी तरह से मुफ़्त और समान शिक्षा की गारंटी हो।

 (ख) हम सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़.डी.आइ.) समेत शिक्षा के किसी भी प्रकार के बाज़ारीकरण का विरोध करेंगे और हाशिए पर धकेले गए समूहों, यथा दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, विकलांगों और धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों खासतौर से इन समुदायों की महिलाओं के लिए व अन्य उत्पीड़ित समुदायों एवं समूहों जैसे खानाबदोश कबीलों, डी-नोटिफाइड जनजातियों, बंधुआ मजदूरों, विस्थापितों, सुदूर द्वीपों के निवासियों और रेगिस्तान, जंगलों व गांवों के निवासियों और ट्रांसजेंडरों के सामाजिक न्याय व समानता के अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे।
(ग) हम शिक्षा के नव-उदारवादी एजेंडे का विरोध करेंगे जो वैश्विक पूंजी की जरूरत के मुताबिक शिक्षा के उद्देश्य को विकृत कर उसे गुलाम मानसिकता के कुशल कामगारों के उत्पादन तक सीमित कर देता है और इसकी जगह पर हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करेंगे जिसका उद्देश्य समाज के मानवीय विकास के लिए हरेक व्यक्ति को प्रबुद्ध व सचेत बनाना होगा।
 (घ) हम भारत सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विश्व व्यापार संगठन-गैट्स को दिए गए प्रस्तावों और हमारी उच्च शिक्षा को वैश्विक पूंजी का पिछलग्गू बनाने की कानूनी चालों का विरोध करेंगे और शिक्षा व सभी स्तरों पर ज्ञान के निर्माण व उस संबंध में नीति-निर्माण के लिए देश की संप्रभुता को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करेंगे।
 (ङ) हम शिक्षा के सांप्रदायीकरण एवं दक्षिणपंथी संगठनों, खासतौर से संघ परिवार व उससे जुड़े संगठनों द्वारा शिक्षा में दकियानूसी, संकीर्ण और विभाजनकारी दुष्प्रचार का विरोध करेंगे और पाठ्यचर्या को वैज्ञानिक, धर्मनिरपेक्ष, आलोचनात्मक और लोकतांत्रिक नज़रिए से लैस करने के लिए व देश की बहुलता के सम्मान और धार्मिक, भाषाई व सांस्कृतिक समूहों के लोकतांत्रीकरण के लिए संघर्ष करेंगे ताकि वर्ग, जाति, जेंडर, भाषा, अंचल, और शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता पर आधारित गैर-बराबरी का खात्मा किया जा सके।
 (च) हम स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहे हमलों का विरोध करेंगे और शिक्षा संस्थानों व कैम्पसों में किसी भी तरह के अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की आज़ादी, आलोचनात्मक विचार, असहमति की अभिव्यक्ति व बहस की आज़ादी, और शांतिपूर्ण विरोध (सत्याग्रह) के अधिकार के पक्ष में संघर्ष करेंगे।
 (छ) बहुभाषीयता के संदर्भ में मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने के शिक्षाशास्त्रीय महत्व पर बल देते हुए, हम सभी सरकारी व निजी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंगरेजी के वर्चस्व का विरोध करेंगे और एक बहु-भाषाई परिवेश में मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के तौर पर स्थापित करने के लिए संघर्ष करेंगे। साथ ही विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में, ज्ञान-उत्पादन में, विज्ञान के प्रसार और कामकाज में, सामाजिक विज्ञानों व मानविकी में, लेन-देन और व्यापार में भारतीय भाषाओं की मुख्य भूमिका के लिए संघर्ष करेंगे; और देश की भाषाओं में भारत और विश्व भर के सारे विषयों के बहु-आयामी अनुवाद के लिए प्रचार करेंगे।

All India Shiksha Sangharsh Yatra – 2014

‘All India Shiksha Sangharsh Yatra – 2014’ organised by AIFRTE
 is a call to resist commercialisation and communalisation of education in India.


प्रस्तुति द्वारा  एम के पाण्डेय 'निल्को'
जयपुर, राजस्थान 

27 November, 2014

क्रंदन ............Tripurendra Ojha NISHAAN


आ कर देख ले मुझपे सितम करने वाले ,
तेरे बिना दिन भी कट गया रात भी गुजर गई
इस खुशफहमी में कि तू मिलेगा मुझे
इन्तेजार करते करते एक  मुद्दत गुजर गई ,
अरे बेमुरव्वत जब तुझे कोई और मिला ,
तुझे लगा तेरी जिन्दगी संवर गई ?
मत रहना इस गफलत में अरे बेगैरत,
क्यों कि करेगा जब रुसवा तुझे
फिर न कहना मेरी जिन्दगी बिखर गई ,
किसी के अरमां कुचल के सपनो का ताजमहल बनाने वाले ,
तुझे न पता एक टूटे दिल कि आह से दुनिया सिहर गई ,
तुझमे औ मुझमे बड़ी समानता थी न ?
सो मेरी तरह तू भी खायेगा धोखा उसी से
जिस पर तू दिल ओ जान से मर गई .....:(
                                                               

***********

Tripurendra Ojha NISHAAN

झुकना – नज़र निल्को की

वो शख्स जो
तुमसे झुक का
मिला हो
शायद
वह तुमसे
कई गुना बड़ा हो ..!
उसकी आँखों में
तुम्हे लिए
जो खास बात है
वह एक
किसी के लिए
मिशाल है ...!
मत हस
उसके इस
चाल चलन पर
वह गई गुना
समझदार है तुमसे ...!
तुमने हस दिया
उसकी बुद्दिमता पर
लेकिन वह
सफल हो गया
अपनी इरादों पर.....!
तुमसे हस कर
जो कह दिया
ठीक है
उसने सचमुच में ही
ठीक कर दिया .....!
एक अनोखे तरीके से
अपना और तुम्हारा
काम कर गया ....!



एम के पाण्डेय ‘निल्को’

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25 November, 2014

जिजीविषा 2......डायरी के पीले पन्ने (ii) -Tripurendra Ojha 'nIshaan'

गतांक से आगे,,,,
                    

सुबह के नौ बजे मै उठा सर दर्द सा महसूस हो रहा था , सीधे छत पर पहुंचा | घना कुहरा गिरा था , बमुश्किल मै उसके छत पे देख सका था , वो वहां न थी | वो वहां रोज ही कपडे डालने के बहाने आया करती थी जो आज कल कम हो गया था | मै दस मिनट रेलिंग के पास खड़ा रहा , सूर्य कांतिहीन, धूमिल सिर्फ एक चमकते आईने के समान दिख रहा था , गली के आते जाते आदमी भूत जैसे दिखते थे | मौसम सर्द था , मै शिथिल खड़ा रहा कुछ देर और ये आशा लिए कि वो आ जाय पर ....
अचानक नीचे कुछ लोगों का कोलाहल सुनाई पड़ा जो कि उसके घर के तरफ से आ रही थी , मै भाग के सीढ़ियों की तरफ लपका और लगभग दौड़ते हुए उसके घर के सामने जा के खडा हो गया |
दरवाजे पर कुछ लोग घबराए हुए खड़े थे दरव्वाजा अन्दर से बंद था और अन्दर से उसके तेज तेज चीखने की आवाज आ रही थी | मुझसे बर्दाश्त न हुआ और मै किसी कि परवाह किये बिना भाग कर दरवाजे से चिपक गया | घबराहट और क्रोध का मिश्रण लिए भाव मै गेट खुलने का इन्तेजार कर रहा था |
बाहर खड़े लोग मुझे देख रहे थे और मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका लिए जोर जोर धड़क रहा था |
उस सर्द मौसम में मेरे माथे पर पसीने छलछला आये थे | अचानक दरवाजा भड़ाक से खुला और मेरे करीब से एक आग का गोला गुजरा , मै सन्न रह गया वो आग कि लपटों में घिरी हुई थी औ बुरी तरह चिल्ला रही थी कि अचानक उसने मेरी तरफ देखा और और इस आस में कि मै उसे बचा लूँगा मेरी तरफ भागी |
मेरे पास आने के ठीक दो गज पहले वो गिर गयी और तड़पने लगी | मै किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये देखता रहा , ये सब मेरे आँखों के सामने हो रहा था और मै अपनी एक ऊँगली हिला पाने में असमर्थ था , मै स्तब्ध था वो तड़प तड़प के मेरे सामने मर गयी और मेरा शरीर सिर्फ एक बुत बन के रह गया | कुछ लोग मुझे खींच रहे थे फिर कुछ याद नही ............................
                           आँख खुली तो मै अपने घर में था कुछ लोग मुझे घेरे खड़े थे , वो मुझे रोकते मै बाहर निकल आया और ठीक उसी जगह मै जा खड़ा हुआ जहाँ अभी तक उसके जले मांस के टुकड़े जमीन में चिपके थे , बहुत ज्यादा भीड़ जमा थी और सबकी आँखे मुझे प्रश्नवाचक नगाहों से देख रही थी |
मै जमीन पर बैठ गया, तब तक एक वर्दीधारी पुलिस वाला आया और मुझे लगभग घसीटते हुए जीप में डाल दिया |
मै थाने पहुंचा जहाँ उसके बाप और भाई पहले से मौजूद थे , बाप बता रहा था ‘साब रात को मेरी बेटी देर से आई तो मैंने गुस्से में मार दिया ..उसका भाई भी पता नही क्या गिडगिडाने लगा था , रुक रुक के वो मेरी तरफ देख कर भी कुछ कहते थे | मेरी पलक भी बंद नही हो रही थी पता नही थानेदार मुझसे कुछ पूछने का असफल प्रयत्न कर रहा था | अब मेरे पास न तो कोई उत्तर था और न कोई सवाल , कुछ थप्पड़ भी बरसाए उसने और अंत में मुझे थक कर छोड़ दिया |
                         मै पैदल चला जा रहा था कहाँ ,पता नही ..पर हाँ मेरे पैर बिल्कुल ठीक पड़ रहे थे |मेरा गाँव छह किलोमीटर दूर पड़ता था , पुल से होकर गुजरा तो किसी मोटर साईकल ने ठोकर मार दिया , मै गिर गया ..और पड़ा रहा | बाइक वाला जा चुका था , कुछ लोगों ने उठने  में मेरी मदद की और मै फिर चल दिया | बहुत जोर कि ठण्ड लग रही थी पर माथे से पसीना आ रहा था , गर्म था , हाथ लगा क्र देखा तो खून था शायद मेरे सर में चोट लगी थी | मैंने चेहरा पोंछना जरुरी न समझा और चलता रहा जब तक कि मुझे थकान महसूस न होने लगी |
मै अपने गाँव का रास्ता छोड़ चुका था कि अचानक देखता क्या हूँ कि वो दूर धवल वस्त्रों में नजर आ रही है |
मैंने अपनी चाल तेज कर दी ,मै जल्द से जल्द उस से मिलना चाहता था |
शाम हो गयी थी वो मुझे अपने पीछे बुला रही थी और मै पागलों कि भांति दौड़ता जा रहा था | वो नदी के तरफ जा रही थी मैंने चिल्ला के बोलना चाह पर मेरे कंठ से स्वर नही फूटे |
वो मेरे करीब आती जा रही थी , हम दोनों नदी के किनारे पर थे केवल दो गज दूर थी वो | वो मुस्करायी ,   सफ़ेद कपड़ों में वो आज बला की खूबसूरत लग रही थी | वो धीरे से नदी में उतर गयी और मुझे मुस्कुरा के बुलाया और मै बढ़ता चला गया |
                             मै उसके बेहद करीब था , मै देख सकता था उसके चेहरे पर चोट का कोई निशान न था , मैंने बढ़ के उसके हाथों को थाम लिया ,उसके उँगलियों के चोट भी गायब थे |
मैंने उसके माथे को चूमा , मेरे दोनों पैरों ने जमीन छोड़ दिया | उसने अपने बाहें फैला दी , मेरी आँखे मुंदने लगी थी ...........उसके ठन्डे हाथ मेरे सिर पर थे , उसने मुझे अपने आगोश में ले लिया था और मै एक दम निश्चिन्त था ..................................................................................
                      
TRIPURENDRA OJHA 'NISHAN'

24 November, 2014

जिजीविषा.....डायरी के पीले पन्ने (ii)


                              उस रात वो आई थी मेरे पास,संध्या के तुरंत बाद का का समय था | हवा चल रही,हम दोनों नदी के किनारे पर बैठे हुए थे | झुरमुटो से गुजर कर आने वाली हवा हमे अकेले होने का अहसास दिला रही थी |
छोटे छोटे पौधे बैठे हुए मानव आकृति का अहसास दिला रही थी जो रह रह के हिल रही थी |
झींगुरो की आवाज रुक रुक के निनाद करती थे , कुछ दूर से मछुवारों के जाल डालने की आवाज आ रही थी जो अक्सर देर शाम तक नदी किनारे रहा करते थे | वो मुझसे बता रही थी कि किस तरह से उसके उसे बाप ने बुरी तरह मारा था |  उसकी उंगलियाँ चोटिल हो गई थी इस बात का पता हमे तब चला जब उसके हाथों को मैंने थामा था , दर्द से कराह उठी थी वह | उसके सर के बाल बेरहमी से उखाड़े गये थे जिसके निशान साफ़ साफ़ अँधेरे में भी नजर आते थे , मेरी उठी नजर अचानक रुक गयी जब मैंने उसके माथे को चूमना चाहा था |
मुझे ग्लानि की अनुभूति हो रही थी पता न क्यूँ इन सबकी वजह मै खुद को  मान रहा था , पूरी दुनिया से मुझे नफ़रत सी होने लगी थी , ऐसा लग रहा था मानो कही से मुझे शक्ति मिल जाय और मै पूरी दुनिया को जला के ख़ाक कर दूं | उसने दो दिन से कुछ खाया नही था बोली मार खा खा के खाने का मन नही करता |
मै सिहर सा गया मानो मेरी समझ में कुछ भी न आ रहा था मै चलने को उद्यत हुआ वो भी उठ गयी , किनारे पर बैठे मेंढक पानी में कूद पड़े |
‘कुछ देर और रुकते है ‘ मैंने कहा था कुहरा गिरने लगा था |
‘पापा जान गये तो जान ले लेंगे मेरी’ उसने मुझसे कहा | मौसम खामोश था , हवा अब कुछ ज्यादा तेज चलने लगी थी जिसने स्तब्धता तोड़ने की भरपूर कोशिश की |
मैंने उसका चेहरा अपनी हाथो में लिया तो मेरी हथेलियाँ गीली हो गई , उसका चेहरा आंसुओ से सराबोर था |
तुम रो रही हो ? मैंने पूछा तो सिसक के बोली इसके सिवा कुछ और वश में नही ना ?
मै अपने आप से घृणा करने लगा क्यूँकि मैं खुद को अपराधबोध से ग्रस्त महसूस कर रहा था ,हम साथ चल रहे थे गाँव की ओर |
साढ़े आठ बज चुके थे , गाँव में से कुत्तों के भौकने की आवाज आ रही थी जो कुछ देर चुप रहते और फिर शुरू हो जाते थे |
मुझे वो दिन याद आ रहे थे जब हम दोनों फटे हुए कुर्ते में साथ में गाँव में पढने जाते थे तब तो किसी को कोई ऐतराज न था फिर आज क्यों.....?
हाँ हम बड़े हो गये थे और समाज इसकी आज्ञा नहीं देता कि दो युगल आपस में ज्यादा बात करे , एक दुसरे का ख़याल रखे , एक दुसरे के ज्यादा करीब जाए जब उनमे कोई सामाजिक रिश्ता ना हो !
‘क्या सोच रहे हो ?’ ....उसने पूछा |
हाँ ...कुछ नही बस ..बचपन के दिन याद कर रहा था ....
“चलो इस दुनिया से बहुत दूर चलते है जहाँ केवल हम हो और हमसे नफ़रत करने वाला कोई नही ..
मुझे अपने साथ ले चलो “ उसने रोते हुए कहा |
हमने कहा ‘हाँ समय दो कुछ ‘ ..मैंने सांस छोड़ते हुए कहा |
‘मुझे बहुत डर लग रहा है ‘ उसने फिर कहा |
मैंने कहा “सब ठीक हो जायगा “और उसे गले लगा लिया पर दिल की धडकनें उसे बता रही थी कि ये सच नही है कुछ ठीक नही होने वाला |
साढ़े नौ हो चुके थे हवा और उग्र रूप धारण कर हमे आगाह रही थी , ताड़ का पेड़ शोर मचा मचा के हमे किसी अनहोनी की मानो सूचना दे रहा था  हम समय से बेखबर थे |
अब मुझे जाना चाहिए कहते हुए वो अलग होकर जाने लगी , ‘कब मिलोगी ?’ मैंने पूछा |
‘पता नही‘  कहते हुए धीरे धीरे अँधेरे में गायब हो गयी |
वो आखिरी मुलाकात थी हमारी ..नही एक और मुलाक़ात बाकी थी |

.
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क्रमशः

                                      Tripurendra Ojha 'Nishaan'

18 November, 2014

डायरी के पीले पन्ने (i).......tripurendra ojha 'nishaan'

त्रिपुरेन्द्र ओझा 'निशान'


.....

......

आज २३ जून की रात को ८.५० हुए हैं ,आज साल का सबसे चमकीला चाँद निकला है ...

खिड़की से देखता हूँ तो धुंधला नजर आता है ...मेरा कवि मन उद्वेलित हो उठा , मै बैठ गया लिखने..

.

.

ढँक गया इस धुंधलके में मेरा चाँद भी

खूबसूरती का गुमां इसे आज था जो

वक्त इतना बेमुरव्वत होगा आज

न था इसका अंदेशा आज मेरे चाँद को

देखो कैसे ढँक रहा बेगैरत बादल की बाहों में

ये जान कर भी कि एक झोंका

ले जायगा दूर उसके बेवफा आशिक को

छोड़ जाएगा वो मेरे चाँद को आधी शब में

वो रौशन है किसके सहारे ऐ निशान,

रात भी बेखबर है इस बात से और मेरा चाँद भी ...........................

त्रिपुरेन्द्र ओझा 'निशान'
  

12 November, 2014

किस ऑफ लव - Kiss of Love

प्यार फैलाने का अनोखा तरीका ’किस आफ लव’ का आगाज हो चुका है। कोच्ची, कलकत्ता, नई दिल्ली के बाद देश  के अन्य शहरो मे फैल रहा प्यार के इजहार करने का अनोखा तरीका। ’किस आफ लव’ प्यार का इजहार है या विरोध का तरीका कुछ स्पष्ट नही हो रहा। पुलिस और आयोजक रोज एक दूसरे से भीड रहे। आयोजको का कहना है कि पुलिस इनको आए दिन परेषान करते है इसलिए वे अपना विरोध इस माध्यम से कर रहे है। कुछ लोग/समुदाय इसका घोर विरोध कर रहे है। सभ्यता और संस्कृति का हवाला दे रहे है। एक बात तो सही है कि -
प्यार को शालीनता से जताए
क्योकि हमारा प्यार सडको का मोहताज नही

प्यार को अश्लीलता में मत बदलो। रोड पर जब इस तरह के आयोजन होते है तो कई तरह के लोग/देश  आपको देखते है। आजादी का यह मतलब नही होता कि आप हमारी धरोहर, संस्कृति का मजाक बनाए। प्यार अगर रोड पर ही करना है तो उस गरीब को गले लगाओ जो सुबह से शाम तक रोड के किनारे अपना समान बेचता है। उस प्यार की अनुभूति शायद सबसे अच्छी होगी।

भारतीय संस्कृति में कामसूत्र है लेकिन इसका यह मतलब नही की आप सडक पर अश्लील हरकते करे। क्या कोई आपने माता-पिता के सामने एक दूसरे को चूमेगा। हम किसी के प्यार के खिलाफ नही लेकिन सडक पर यह किस आफ लव किस हद तक जायज है ?  जिसको जो करना है वह अपने घर के अन्दर बन्द कमरे मे करे।
 

जब इस पर हम लोगों ने बात करने की कोशिश की तो-
 
हिन्दु युवा वाहिनी, राजस्थान के सक्रिय सदस्य श्री सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत कहते है कि - मैं संस्कृति के रक्षा के नाम पर या सहज मानवीय भावनाओं पर पांबदी के सख्त खिलाफ हु ’किस आफ लव’ तो एक विरोध करने का तरीका था जो आई.आई.टी बाम्बे आदि के नामी छात्रो द्वारा उग्र संगठनो और पुलिस के गुंडा़गर्दी के खिलाफ अपना गुस्सा प्रकट करने के लिये किया गया था। चिन्ता न करे भारतीय संस्कृति अमर है, कोई पश्चमी संस्कृति हमारा बाल भी बाका नही कर सकती।
सभी संगठनो को आर.एस.एस से सिख लेनी चाहिए अनुशासन का पालन करना चाहिए। आखिर कब तक लोग खुद को समाज व देश और धर्म का ठेकेदार बताकर आम जन को गुमराह करते रहेगे। हमे उन ठेकेदारो की जरूरत नहीं। यह व्यक्तिगत स्वंत्रता का हनन है कृप्या इसे स्वंछदता की संज्ञा न दे।

Blackstone Ventures  के पार्टनर श्री मनीष शर्मा का कहना है की यह तरीका पूरी तरह से गलत है अगर आप को अपनी बात रखनी है तो आपको इस तरीके को बदलना पड़ेगा। आप स्वतंत्र हो सकते है लेकिन स्वछंद नहीं । आप युवा पीढ़ी है देश को आप से उम्मीद रहती है लेकिन कुछ इस तरफ की नहीं । जैसा देश वैसा भेष अपनाना चाहिए । भारत मे पश्चिमी सभ्यता का प्रचार करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया । 

 VMW Group  के डायेरेक्टर श्री योगेश पाण्डेय का कहना है कि - भारत देश की संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ खिलवाड़ बर्दाष्त के बाहर है, आजादी के नाम पर इस तरह के अभियान के खिलाफ हुॅ माना की जमाना बदल रहा है किन्तु यह हमारी संस्कृति नही है। अगर चुमना ही है तो उसको चुमो जिनको पैदा होते है कि फैक दिया जाता है। अगर ये हालात देश के पढे लिखो का है तो देश की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर चिंतन का  समय है  । शर्म नारी की इज्ज़त होती है इसे खत्म मत करो नहीं तो सोचो आने वाली पीढ़ी क्या करेगी .......?

गाजियाबाद के श्री शैलेन्द्र भारद्वाज कहते है कि ये तो बहुत ही भद्दा काम है और बेशरमी की हद है, ये संस्कृति के नाम पर भद्दा मजाक है।
 
वैशाली नगर जयपुर के यश गुप्ता कहते है कि - किसी भी देश के प्रगति मे युवाओ का विशेष योगदान होता है माना कि चुमा - चाटी सड़क पर नही करनी चाहिए। विदेश में ये सब कोई भारी मुद्दा नहीं है, यह समाजिक स्तर पर होता है तथा इससे सभी जागरूक है और अपना भला बुरा सब लोग जानते है। कुछ समय बाद वे लोग अपने भविष्य के निर्माण में लग जाते है किन्तु हमारे यहा आज का नौजवान अपने समय का सही उपयोग सही समय पर नहीं कर पाता है शायद इसलिये वे हमसे आगे है।
 
भाजपा पार्टी के सक्रिय सदस्य, शान्ति नगर सोडाला निवासी सुधीर दुबे का कहना है कि -  
गुलाब मुहब्बत का पैगाम नही होता,
चाद चांदनी का प्यार सरे आम नही होता,
प्यार होता है मन की निर्मल भावनाओं से,
वर्ना यू ही राधा-कृष्ण का नाम नहीं होता 

हम कहते है कि आप लोगों का प्रदर्शन अच्छी बात के लिये है लेकिन आप लोगो के प्रदर्शन का तरीका सरासर गलत है। क्योकि  

माना एक लड़का - लड़की का साथ बैठना प्यार नहीं होता
मगर हर मर्ज का इलाज तकरार नहीं होता।

आखिर हम किस दिशा में भाग रहे है? चुम्बन में कोई खराबी नही लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि हमारी सोच की जमीनी हकीकत और भविष्य क्या है? इंसान को हमेषा आने वाली पीढ़ी को अच्छा सीख देनी चाहिए। अपने ज्ञान, बुद्धिमता, कार्यकुषलता से प्यार को शालीनता से जताए क्योकि हमारा प्यार सड़को का मोहताज नही जो सड़क पर ’किस’ करके जताया जाए या फिर ऐसी अश्लील हरकत करके।

मधुलेश पाण्डेय निल्को 

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