Blockquote

Followers

31 October, 2014

भारत के लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल

आज भारत के लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्मदिन है !! आइये आज उनके जीवन के आरंभ से ले कर अंत तक जुड़ी कुछ रोचक जानकारियों को सिलसिलेवार क्रम से देखें -

१. सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म ३१अक्टूबर १८७५, नाडियाड गुजरात के लेवा पट्टीदार जाति के एक समृद्ध ज़मींदार परिवार में हुआ था !! सरदार पटेल भारतीय बैरिस्टर और राजनेता थे !! भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं में से एक थे !! पारम्परिक हिन्दू माहौल में पले-बढ़े पटेल ने करमसद में प्राथमिक विद्यालय और पेटलाद स्थित उच्च विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उन्होंने अधिकांश ज्ञान स्वाध्याय से अर्जित किया !!

२. १९१७ में पटेल गांधी के सत्याग्रह (अंहिसा की नीति) के साथ जुड़े लेकिन उन्होंने कभी भी खुद को गांधी के नैतिक विश्वासों व आदर्शों के साथ नहीं जोड़ा और उनका मानना था कि गांधी की संपूर्ण अहिंसा नीति, भारत के तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है !! उन्हें व्यावहारिक, निर्णायक और यहाँ तक की कठोर भी माना जाता था तथा अंग्रेज़ उन्हें एक ख़तरनाक शत्रु मानते थे !!

३. १९४५-१९४६ में जब हिंदुस्तान के आज़ाद होने की बारी आई तो नेहरू और जिन्ना दोनो भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टकटकी लगाये बैठे थे, गाँधी ने नेहरू और जिन्ना दोनो को समझने की कोशिश की पर दोनो अपने स्वार्थ मे इतने मग्न थे की कुर्सी के खारित देश के दो टुकड़े कर दिये !! उसी दौरान कांग्रेस के अधिवेशन मे सरदार पटेल को नेहरू की तुलना मे बहुमत से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुना !! इस पर नेहरू ने कॉंग्रेस के विभाजन की धमकी दे डाली तथा गांधी को सरदार पटेल से बात करने को कहा !! नेहरू के प्रेमांध में अंधे गांधी ने पटेल से बात की और पटेल गांधी की बात टाल ना सकें और उन्होने देश के लिये प्रधानमंत्री का पद न लेने का फैसला किया !!

४. यहाँ मेरा मानना है कि यदि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते तो भारत कश्मीर, आतंकवाद, और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों/ समस्याएं खड़ी ही नहीं होती !! मगर देश का दुर्भाग्य उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन आशिक़ मिज़ाज नेहरू भारत का प्रधानमंत्री बना था तथा जब ब्र्हम्चार्य का प्रयोग के नाम पर कुकर्म करने वाले गांधी ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिये पटेल से बात की थी और पटेल गांधी की इज्जत करते हुये इसके लिये राजी हो गये थे !!

५. नेहरू की मक्कारियाँ दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही थी !! यहाँ एक प्रसंग कहना उचित रहेगा !! अब बारी आयी राष्ट्रपति पद की !! नेहरू चाहता था कि इस पद पर राज गोपालचारी बैठें मगर सरदार पटेल के नेतत्व वाले गुट ने डा. राजेंद्र प्रसाद के नाम को आगे बढ़ा दिया !! मक्कार नेहरू ने एक दिन राजेंद्र प्रसाद के पास जाकर उनसे यह लिखवा लिया कि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ही नहीं हैं !! जब इस बात का पता सरदार पटेल को चला तो वे नाराज हो गये और उन्होंने राजेंद बाबू से पूछा कि आपने ऐसा लिख कर क्यों दे दिया ?? इस पर उन्होने कि यदि कोई मुझसे पूछता है कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं तो यह बात मैं अपने मुंह से कैसे कह सकता हूं कि मैं उम्मीदवार हूं ?? नेहरू ने मुझसे जब ऐसा ही सवाल पूछा तो मैंने वैसा कह दिया !! उनके मांगने पर मैंने यही बात लिख कर भी दे दी !! जब पटेल ने राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति पद पर बिठाने की जरूरत बताई तो तब नेहरू ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के सामने यह धमकी दे डाली कि यदि राज गोपालाचारी राष्ट्रपति नहीं बनेंगे तो मैं नेता पद से इस्तीफा दे दूंगा !! इस पर कांग्रेस के मुखर नेता डा.महावीर त्यागी ने साफ साफ यह कह दिया कि आप इस्तीफा दे दीजिए, हम नया नेता चुन लेंगे !! फिर तो इस जवाहर लाल जी के मुख के सारे शब्द स्वतः बंद हो गये और फिर कभी इसने राजेंद्र प्रसाद के नाम का विरोध नहीं किया !!

६. पटेल ने उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा सूचना मंत्री रहते हुये भी देश की इतनी सेवा की जितना कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद पर रह ऐयाशी करते हुये किया !! भारत के लगभग सभी ६०० राजवाड़ों को शान्तिपूर्ण तरीके से भारतीय संघ में शामिल कराना उनके महानतम कार्यों में से एक था !! भारत तो क्या विश्व के इतिहास में भी एक व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो !! उनके इसी महान कार्य के लिये उन्हें लौह पुरूष के नाम से जाना गया !!

७. पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत से जोड़ना चाहते थे पर नेहरू ने हस्तक्षेप कर कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया. नेहरू ने कश्मीर के मुद्दे को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है !! अगर कश्मीर का निर्णय नेहरू की बजाय पटेल के हाथ में होता तो कश्मीर आज भारत के लिए समस्या नहीं बल्कि गौरव का विषय होता !!

८. १९६२ के युद्ध में चीन ने भारत को नहीं हराया बल्कि नेहरू के बेवकूफी भरे कदमों के कारण भारत ने अपना एक हाथ खुद बांधकर लड़ाई लड़ी, जिससे वह हार गया !! यदि पटेल की बात को मानकर नेहरू ने हवाई ताकत का इस्तेमाल करवाया होता तो युद्ध के नतीजे कुछ और होते !! युद्ध के दौरान यदि नेहरू पटेल की बात मान कर अपने लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करता तो चीनी थलसैनिक भारत में असम तक घुस ही नहीं पाते !! इतना होने के बावजूद जब इस नेहरू ने पूर्णतः हार का सामना करने के बाद जो जनता के समक्ष भाषण दिया वो शर्मसार करने योग्य थी !! नेहरू ने कहा - हमें छोटे-मोटे धक्कों के लिए तैयार रहना चाहिए !! हम चीन से मिली सैनिक हार को स्वीकार करते हैं !! मैने आज तक किसी भी प्रधानमंत्री(मौन-मोहन को छोड़ कर) का इससे ज्यादा शर्मसार करने योग्य भाषण नहीं सुना !!

९. अगर नेहरू और पटेल की तुलना करें तो हम पायेंगे कि एक ने जहाँ अपनी आशिकमिजाजी से भारत को पाताल में पहुँचाने में कोई कसर ना छोड़ी वहीं दूसरे नें भारत को ऐकिकरण का सूत्र देते हुये संपूर्ण भारत को एक कर दिया !! दोनों ने इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी की डिग्री प्राप्त की थी परंतु सरदार पटेल वकालत में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्मार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था !! नेहरू जिसे सोच भी नहीं पाता था, सरदार पटेल उसे कर डालते थे !! नेहरू ने विदेशों में शिक्षा पाकर अपने आप को परम ज्ञानी मान लिया था जबकि पटेल ने भी ऊंची शिक्षा पाई थी परंतु उनमें किंचित भी अहंकार नहीं था !! वे स्वयं कहा करते थे, "मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं !! मेरा विकास कच्ची झोपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है !!"  नेहरू को गांव की गंदगी, तथा जीवन से चिढ़ थी !! नेहरू अंतरराष्ट्रीय ख्याति का इच्छुक था जबकि पटेल भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाना चाहते थे !!

१०. सरदार पटेल का निधन १५ दिसंबर, 1950 को मुंबई में हुआ था !! आशिक़ मिज़ाज नेहरू की चाटुकारी नीति आज भी देश को खा रही है !! मित्रों सच में आज देश को लौहपुरुष की बहुत जरूरत है !! काश सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो देश का हाल कुछ और ही होता !!

28 October, 2014

इस ज़माने में जब ढूढने निकला - योगेश पाण्डेय

माना की थोड़ी देर से आया हूँ
नाराज होने का गम भी मैं पाया हूँ
आज उसके शहर में अजनबियों की तरह
पता पूछने की भीड़ में शामिल हूँ
सही पता सही लोग
इस ज़माने में जब ढूढने निकला
पता चला की गलत लेके पता मैं भी निकला
उसके बनने सवरने के याद में मैं आया हूँ
पर उसके नाराज़ होने का गम भी मैं पाया हूँ
उसकी निगाहे जब भी मुझे देखती है
दुविधा की लाइन में सबसे पहले आया हूँ
उसके जुल्फों की तारीफ में
कविता की लाइन उड़ जाया करती है
उसको समेटने की भीड़ में मैं खुद को पाया हूँ
उसके साथ जब घुमने निकला
उसके आगे ही खुद को पाया हूँ
उसकी झील सी आँखों में
खुद को तैरता हुवा पाया हूँ
जब प्यार से योगेश मैं देखता हूँ
कविता की हर एक लाइन उसमें पाया हूँ
फुर्सत में लिखुगा उसके बारे
अभी छुट्टिया मनाने अपने गाँव आया हूँ
शहर की कोई याद नहीं यहाँ
हर जगह सुकून ही यहाँ पाया हूँ
गाँव की गोरी कहु या शहर की तितली
उसकी आँखों में प्यार ही पाया हूँ

योगेश पाण्डेय
(योगेश की युग से साभार)

01 October, 2014

'मेक इन इण्डिया'..... अच्छा है।

मेक इन इण्डिया का नारा अच्छा है। 
काम भी होगा यह विश्वास अच्छा है।
जैसे ही घोषणा हुई दिल्ली के विज्ञान भवन में
मिलेगी नौकरी बेराजगारो को, यह विचार अच्छा है
विश्व स्तर पर निवेश पटल का नया चेहरा 
अर्थव्यवस्था का दिल धडकना अच्छा है
आयेगे अब गौर इस भारत में,
किस्तमत के कारखानों का चरमराना अच्छा है
माना कि हम थोडी देर से आये
किन्तु बिना भरोसे का चाइनीज नही
मंगल मिशन की कामयाबी का ताजा उदाहरण अच्छा है
दुनिया को शून्य हमने दिया है।
अन्तर्राष्ट्र्ीय स्तर पर यह पहचान अच्छा है। 
पहली बार देश को प्रधानमंत्री ऐसा मिला है।
जिस पर लोगों का विश्वाश अच्छा है।
दिमाग में उठती है जब इन बातों की गुफ्तगु
तो 'निल्को' ने कहा कि इनको कागज पर मूर्तरूप देना ही अच्छा है
                                                       
एम. के. पाण्डेय निल्को



Loading...