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23 August, 2014

मैं कवि नहीं हूँ


जब भी मैं कोई कविता पढ़ता हूँ

मेरे मन में ख्याल आता है

इतनी अच्छी रचना मेरे द्वारा क्यो नहीं ...?

‘निल्को ‘की नज़र के सामने

किताबों के पन्नो में

वो शब्दो का समूह

जिसमे कभी प्रेम

तो कभी आक्रोश

कभी बनता बिगड़ता वाक्य

बार – बार यही कहता है

मैं कवि नहीं हूँ

दरअसल कविता मन का भाव है

कवि के जीवन का सार है

रचना भले की

किसी रूप रंग की हो

उसकी नज़रिये का माध्यम

तो तुम ही हो

पर मन अनायास ही

कह उठता है

मैं कवि नहीं हूँ



एम के पाण्डेय ‘निल्को’


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06 August, 2014

बात बात पर अवरोध क्यों की हम स्वतंत्र है - एम के पाण्डेय 'निल्को'



बात-बात पर अवरोध,क्योकि हम स्वतंत्र हैं।
 एम.के.पाण्डेय “निल्को”

      नगर निगम ने कई दिनों से मोहल्लों का कचड़ा नहीं उठाया,लोगो ने रोड जाम कर दिया। गुस्सा बहुत था,इसलिए वाहनो पर पथराव किया गया । स्कूल मे मिड डे मील नहीं बना, छोटे बच्चों को लेकर अभिभावक सड़क पर आ गये । परिवहन विभाग के बसों के शीशे तोड़ दिये। शहर मे शोहदों ने किसी से छेड़खानी की। किसी शरीफ से नहीं देखा गया , वह मना करने लगा तो विवाद हो गया । विवाद बढ़ा तो बात चक्काजाम पर आ गई। सिटी मजिस्ट्रेट ने समझाबुझा कर जाम समाप्त कराया । महाविद्यालय मे एडमिशन नहीं तो जाम ....... । बात-बात पर अवरोध, क्योकि हम स्वतंत्र हैं। हालत यह है की –
कुछ घरों मे मुश्किल है
सुबह-शाम चूल्हे जलाना,
बड़ा आसान हो गया है
बात-बात पर बस्ती जलाना।
      सामान्‍य रूप में आजादी का अर्थ पूर्ण तौर पर स्‍वतंत्र होना है , जिसमें किसी का भी कोई हस्‍तक्षेप न हो। पर मनुष्‍य के जीवन में वैसी आजादी किसी काम की नहीं , क्‍यूंकि इसमें उसके समुचित विकास की कोई संभावना नहीं बनती।  लेकिन आज स्वतंत्रता का मतलब बदल गया है। हम स्वच्छंद होते जा रहे है। 15 अगस्त 1947 से आज तक की राष्ट्रीय यात्रा का विश्लेषण करे तो बहुत कुछ अपेक्षित नहीं दिखाई दे रहा है। यहा अंग्रेज़ नहीं है,न उनकी व्यवस्था है। सब कुछ हमारा है, लेकिन हम संतुष्ट नहीं है। सत्ता के स्तर पर सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारें ही स्वतंत्र नहीं हैं। आज सब गोलमाल हो गया है। राज्य सरकारे उन मामलों में भी केंद्र पर निर्भर हैं, जिनमें उन्हें स्वतंत्र होना चाहिए। शरीर से हम भारतीय, दिल और दिमाग से पश्चिमी धारा के गुलाम हो गए। यह सब आज हमारे खान-पान,रीति-रिवाज़,बोल-चाल तथा पहनावे में साफ दिख रहा है। हमारे स्वतंत्र व्यवहार के कारण चहुंओर क्या दीख रहा है? अपने घर से ही शुरुआत करें? पढ़ाई-लिखाई के कारण आत्मनिर्भरता आती है, आर्थिक उन्नति होती है। पर इस आत्मनिर्भरता ने व्यक्ति को स्वच्छंद बना दिया है। स्वच्छंदता स्वतंत्रता नहीं है।  स्वच्छंदता का आलम यह है कि देश की सामूहिक स्वतंत्रता को ध्वस्त करने के लिए न जाने कितने आतंकी, अलगाववादी और विध्वसंक संगठन खड़े हो गए। इन संगठनों के कारण समाज जितना तबाह हो रहा है, शायद साम्राच्यवाद के समय भी न हुआ हो।
      अंग्रेज़ो को केवल गालिया देकर स्वतंत्रा की जयकार करने से पहले यदि अपने आस-पास के पुलो,भवनो पर नज़र दौड़ाए, तो देखते है की इतने सालो पहले की बनी इमारत खड़ी होकर इठला रही है और जिस भवन, पुल को आज़ाद भारत के कमीशनबाज नेताओ,ठेकेदारो ने बनवाया है वह धराशायी हो गए । जबसे देश आजाद हुआ है हमने केवल अपने बारे में सोचा है. मेरा भारत महान कहने वाले कई लोग मिल जाते है पर उसमे उनका क्या योगदान है ये वो नहीं बता पाते. मानो उनके यहाँ पैदा होने से ही ये देश महान हुआ हो. इस देश के लिए जो लोग कुर्बान हो गए उनके सपनो के भारत को हमने कही खो दिया है।  स्वतंत्रा के मतलब इतना बदल गए हैं कि किसी कवि कि यह लाइन बहुत ही सटीक बैठ रही है –
देखता हूं चलन सियासत का,
हर कहीं बैर के बवंडर हैं।
फर्क ऊंचाइयों मे है लेकिन,
नीचता मे सभी बराबर हैं।
      बहुत दुःख का विषय है कि स्वराज्य-प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक और राजनैतिक हालत इतने अधिक चिंताजनक हैं। समाज में स्वार्थ लगातार बढ़ रहा है। अपराध की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेशी घुसपैठ इत्यादि खतरे देश को चारों ओर से घेर रहे हैं। देश के किसी न किसी भाग से प्रतिदिन किसी आतंकवादी घटना,नक्सली हमले या किसी बम विस्फोट का समाचार अवश्य मिलता है और ऐसे कठिन समय में सरे मत-भेद भुलाकर एक होने और इन हमलावरों को कुचलने कि बजाय हम भाषावाद, प्रांतवाद और मजहबी उन्माद से ग्रस्त होकर आपस में ही लड़ रहे हैं। या तो हमें सत्य दिखाई नहीं देता, या हम देखना ही नहीं चाहते। किसी को केवल अपनी जाति की चिंता है और कोई राष्ट्र की बजाय केवल किसी समुदाय-विशेष के हित को ही प्राथमिकता देता है।  जिस देश में युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ अधिकांश युवा इसके विपरीत धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की चपेट में हैं। उनके जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ने ले लिया है। अधिकांश युवाओं को क्रांतिकारियों की कम और क्रिकेट की जानकारी अधिक है। विदेशी वस्तुओं तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर, खादी को प्रतीक बनाकर स्वदेशी के प्रयोग का संदेश देने वाले महात्मा गाँधी के देश में आज कोने कोने तक विदेशी वस्तुओं के विक्रेता पुनः पहुँच गए हैं। जिस देश में कभी 'जय जवान-जय किसान' का मंत्र गूंजता था, वहाँ शासन की नीतियों से व्यथित होकर शहीद सैनिकों के परिजन सरकार को सभी पदक लौटा रहे हैं और किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। सोने की चिडिया कहलने वाला देश छोटे-छोटे कार्यों में आर्थिक सहायता के लिए कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की और देखता है। हमारी आर्थिक नीतियों से आज भी भारत की बजाय बाहरी देशों को ही अधिक लाभ हो रहा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं की हम स्वतंत्र हैं?
      आज यह आवश्यक है कि देश आत्मविश्लेषण करे। देश, राज्य और व्यक्ति को स्वतंत्र बनाया जाए स्वच्छंद नहीं। सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवंतु सुखिन: और तेन त्यक्तेन भुंजीथ: जैसे संबल हमारे पास हैं। अंत कि चार लाइनों को भी ध्यान से पढ़ कर आप अपने सुझाव या शिकायत VMW Team को लिखने के लिए स्वतंत्र है ।
हम तो स्वतंत्र होते हुए भी परतंत्र हैं
यहाँ ना खुशियाँ हैं, ना खिलखिलाहट
यहाँ तो चलता है बस आतंकवादी तंत्र
यह कैसा प्रजातंत्र है, यह कैसा लोकतंत्र
कोई हमें बतलाये तो
क्या यही स्वतंत्र है?

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 एम.के.पाण्डेय “निल्को”
+91-9024589902
 

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