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05 July, 2014

यह जरूरी तो नहीं...... – मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’
दोस्तो पिछली रचना (तुम्हें दुनिया में जन्नत नज़र आएगी)  को सम्माननीय डॉ. रूप चंद मयंक जी के द्वारा चर्चामंच पर चर्चा की गई । उम्मीद से ज्यादा लोगो द्वारा द्वारा पढ़ी गई इस के लिए सभी पाठको का दिल से शुक्रिया.... आप की प्रतिक्रियाओं से मुझे हमेशा ही उर्जा और चिंतन की दिशा मिलती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है, शब्दो को समेटने की कोशिश की है ज़रा आप ही बताए की कितनी सिमटी है या नहीं ?

 
उनके दर पर ही खड़ा हूँ
पर वह अन्दर बुलाये यह जरूरी तो नहीं
मैं अपनी बात कहने की कोशिश की
पर वह मेरी भी सुने यह जरूरी तो नहीं
माना की शब्दो को समेटने की कोशिश की
पर वह सिमट जाए यह जरूरी तो नहीं
जानता हूँ की लोग हसेंगे इस पर भी
पर मैं किसी को रुलाऊ यह जरूरी तो नहीं
चर्चा मंच पर होती है कई लोगो की चर्चा
मधुलेश की भी हो यह जरूरी तो नहीं
नीद तो बिस्तर पे भी आ सकती है
मगर सिर उनकी गोद मे हो ये जरूरी तो नहीं
निल्को की नज़र मे सभी अच्छे है
पर उनकी नज़र मे मैं अच्छा हूँ ये जरूरी तो नहीं
मेरी कलम मे स्याही चाहे हो जितना
हमेशा चलेगी यह जरूरी तो नहीं
रचने की कोशिश की है मैंने भी
पर दुनिया मुझको ही पढ़ेगी यह जरूरी तो नहीं
माना कि खिले हुए फूलों से महक उठता है गुलशन सारा
दिन और रात मे एक ही खुशबू हो  यह जरूरी तो नहीं
बीमार को मर्ज़ की दवा देनी ही चाहिए
पर वह दवा पिले यह जरूरी तो नहीं
बड़ी मुद्दत से रची है ये रचना
लेकिन ठीक से परोसी जाए यह जरूरी तो नहीं
नदी के किनारे चुप-चाप बैठा हूँ दोस्तो
प्यास मेरी भी मिटेगी यह जरूरी तो नहीं
विराम देने के लिए अंतिम पंक्ति की तलाश मे हूँ
पर वह आज ही मिलेगी यह जरूरी तो नहीं
ज़िंदगी के सफर मे थक जाते है लोग कई
पर मैं अभी थका सा महसूस करू यह जरूरी तो नहीं
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मधुलेश पाण्डेय निल्को





Madhulesh Pandey 'Nilco'


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