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21 July, 2014

....बंजारे को घर मिला


दोस्तो मेरे मित्र सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत कहते है की आज कल रचनाओ मे अलंकार का प्रयोग देखने को कम ही मिलता है , उनकी इस बात से कुछ हट तक सहमत मैं भी हूँ । बहुत कोशिश करने के बाद कुछ प्रयोग करने की कोशिश है, ज़रा आप लोग ही बताए की कोशिश कहा तक सफल रही । साथ मे पाठको की जानकारी के लिए अलंकार के बारे मे भी कुछ जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, 'आभूषण'। जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की। काव्य में भाषा को शब्दार्थ से सुसज्जित तथा सुन्दर बनाने वाले चमत्कारपूर्ण मनोरंजन ढंग को अलंकार कहते हैं। भारतीय साहित्य में अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि प्रमुख अलंकार हैं।
 


अब यह रचना आप के लिए .....



समय पर जब समय मिला
सागर मे भी गगन मिला
मुलाक़ात जब उनसे हुई
मानो बंजारे को घर मिला

खुशखबर जब यह सुना
उनके लिए ही गीत गुना
जिसको सर्च किया मैंने यहाँ वहाँ
वह तो मेरे ही करीब मिला

राजनीति पर जब यह कलम चली
काजनीति की लहर चली
गली मोहल्ले और चौराहे पर
मधुलेश की ही बात चली

कुछ सीखने की जब सीख मिली
नहीं किसी से भीख मिली
जब वह अकेले चले थे
तो नहीं यह भीड़ चली

बेशक कवियों की घनी आबादी है
पर लिखने की कहाँ पाबन्दी है
कभी-कभी तो चर्चा मंच पर भी
निल्को की भी लहर चली

****************
मधुलेश पाण्डेय निल्को

 



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