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15 July, 2014

अच्छा लगता है बनाम अच्छा नहीं लगता - मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’

मधुलेश पाण्डेय निल्को
दोस्तो, आज पहली बार युग्म मे रचना प्रकाशित कर रहा हूँ , दोनों रचना एक ही सिक्के के दोनों पहलू है। आप अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे अवगत करा कर कृतार्थ करे , आप की इन प्रतिक्रियाओ से मुझे एक अलग प्रकार के आनंद की प्राप्ति होती है, यूं ही आपका स्नेह मिलता रहे, आप लोगो के इस हौसला अफजाई से एक नई रचना आप के सामने प्रस्तुत है 



(1)       अच्छा लगता है.....

वर्षा के मौसम में,
और घर के बालकनी में,
भीगना, अच्छा लगता है

शाम के समय में
और ‘निल्को’ के साथ में
कलम चलाना  अच्छा लगता है

रविवार के दिन मैं
और बाज़ार के भीड़ में
पहचान बनाना अच्छा लगता है

चांदनी रात में
और उनके साथ में
बातें करना अच्छा लगता है

सावन के महीने में,
और गर्मी के पसीने में
कूलर के आगे बैठना ही अच्छा लगता है


(२) अच्छा नहीं लगता.....

बाज़ार की भीड़ में
मैं भी खो जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता

अपने ही शहर में
घूम कर घर नहीं जाऊ
मुझे अच्छा नहीं लगता

काम-काज के क्षेत्र में
उनकी तरह चुगली करना
मुझे अच्छा नहीं लगता

रचना प्रकाशित होने के बाद
पाठको की प्रतिक्रिया न मिलना
मुझे अच्छा नहीं लगता

इस भीड़ तंत्र में
गुमनाम सा ‘निल्को’ को जीना
मुझे अच्छा नहीं लगता

-
             मधुलेश पाण्डेय ‘निल्को’ 

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