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23 June, 2013

प्रकृति का सफाई अभियान



गाँव शहर और सड़क तक भर गया पानी
और याद आ गई सबको अपनी नानी
तो निल्को ने कहा –
परेशान मत हो मेरे बाबू
क्योकि यंहा प्रकृति का सफाई अभियान है चालू
नदियो का पानी आपे से बाहर हो रहा
लोगो का जीवन इससे दुसवार हो रहा
जिसे लोग बाढ़ कह कर परेशान है
वह तो प्रकृति का सफाई अभियान है
प्रकृति अपनी सफाई अलग तरीके से करती है
यही बात तो लोगो को अखरती है
प्रकृति के इस बर्ताव से
मानवता घायल हो जाती है
और इस बरसात के मौसम मे
नदिया पागल हो जाती है
प्रकृति जब नि:शुल्क सब देती है
तो ब्याज सहित वसूलती है
प्रकृति कभी भी जेल बना देती है
और आगे विज्ञान भी फेल हो जाती है
जब – जब प्रकृति से छेड़-छाड़ हुई
नुकसान मनुष्य का होता है
यह अटल सत्य है
जिस पर विश्वास सभी का होता है
गर प्रकृति को किया परेशान
तो खुद परेशान हो जाओगे
नहीं बचेगा नामो-निशान
और आदिवासी कहलाओगे
कर रहा मधुलेश निवेदन
मत काटो हरियाली को
गर फिरा इसका दिमाग तो
नहीं दिखेगा यह बागवानी तो
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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

18 June, 2013

इस बरसात के मौसम मे .....



इस बरसात के मौसम मे .....

आज लगा हवा
मौसम से रूठ गई
काले घने बादल
शहर मे ही रह गई
तन तो भीगा ही भीगा
मन भी बह गई
और बहकी – बहकी बाते
मुह मे ही रह गई
इस बरसात के मौसम मे
नजारे हरे भरे है
लेकिन ज़िंदगी के इस सफर मे
इस किनारे हम खड़े है
आज इस दौर मे
है सब कुछ मेरे पास
पर मन मानो कर रहा
बस कविताई ही रह गई
आज का दिन तो ऐसे निकला
की बात कहानी हो गई
मौसम ने भी साथ दिया
और शाम सुहानी हो गई
बारिश की बूदे
जब – जब तन पर गिरि
तब – तब कविता की
एक लाइन पूरी हो गई
कविता का शौक “निल्को” को नहीं
पर इस मौसम ने यह काम भी कर गई ।

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मधुलेश पाण्डेय “निल्को”

12 June, 2013

‘काबिल बनो कामयाबी तो झक मार कर पीछे आएगी।’

YOGESH PANDEY


काबिल बनो कामयाबी तो झक मार कर पीछे आएगी।
कभी कभी लोग अपने रिश्तों को भूलकर अपने सपनों के पीछे ही भागते रहते हैं और उन्हें कुछ समय बाद एहसास होता है कि वो अपनों से कितने दूर चले आए हैं इस विचार  के साथ कि जिन्दगी इतनी उलझी हुई नहीं है जितना हम उलझा देते हैं समाज में बदलाव की शुरुआत स्वयं करनी पड़ती है  थ्री इडियट्स फिल्म को समाज के  हर वर्ग ने बहुत पसंद किया क्योंकि उसमें कॉलेज की मस्ती के साथ-साथ उनसे जुडी समस्या ओर उनके समाधान भी फिल्म को हीरो रंचो बहुत ही आसानी से सुलझा लेता है यह तो एक मजेदार भूल भूलैया है थोड़ी सी समझदारी से सुलझायंगे तो आसानी से सुलझ जायगी।  फिल्म का एक डायलॉग जो वास्तव में प्रभावशाली है वह है काबिल बनो कामयाबी तो झक मार कर पीछे आएगी। कई बार लिखने के बाद  खुद को बदला बदला सा पाता हूँ इसी देश में मैंने अच्छे दोस्त बनाए, और इसी देश में मुझे कई लोग ऐसे भी मिले जो मुझे कतई पसंद नहीं आए लेकिन कुछ देर भी गंभीरता से सोचता हूं तो एहसास होता है कि किसी का हमें पसंद या नापसंद आना सिर्फ उसके अच्छे या  बुरे होने पर नहीं, हमारी सोच पर निर्भर करता है आखिर जिन्हें मैं बुरा समझता हूं  उनके भी कुछ दोस्त तो हैं ही उनके परिवार के लोग तो उन्हें प्यार करते ही हैं सो कहीं न कहीं उनमें कुछ गुण या अच्छाइयां होंगी ही उन्हें भुलाना मुश्किल है हम जानते है कि कहीं-कही किसी परिस्थिति में हम कुछ नहीं कर सकते हैं फिर भी परेशान हो जाते हैं। गलती करने के बाद  भी सजा और गुस्से की जगह जब प्यार और स्नेह मिलता है तो वो एहसास कुछ अलग की होता है ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से सामना होने के बाद कुछ  व्यक्ति खुद को करियर के ठहराव और अति  यह एहसास होता है  कि वास्तविक संसार उसके उसकी कल्पना के संसार से दुष्कर ज्यादा प्रतिस्पर्धी और कम क्षमाशील है जिस समय  समाज में खिंचाव तनाव व विषयों के भोग का आकर्षण जीव को अपनी महिमा से गिराते हैं  लेकिन कुछ  ही समय बाद  धीरे-धीरे वे बातें दिमाग से खारिज होने लगती हैं और हमारा व्यवहार पहले की तरह ही हो जाता है एक आम धारणा है, अगर इंसान कामयाब है तो वो काबिल होगा ही! हालांकि व्यक्तिगत कामयाबी पर यह सोचना शायद गलत होगा। इंसान को व्यक्तिगत कामयाबी उसे विरासत में मिल सकती है या उसके तिकड़म और चापलूसी से मिल सकती है ।

 

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