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13 May, 2013

गाँव ! प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!

नहीं समझ में आ रहा है बात शुरू कहाँ से करूँ? शीर्षक देने का भी मन नहीं हो रहा। मेरे गाँव का विडियो आप के लिए त्रिपुरेन्द्र के कैमरे से 



गाँव !
प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!
जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है 

मेरे गाँव में  एक  घर है आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती है   घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक श्री फल  का पेड़ है  जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “निमिअव ” "तनकिहावा "मल्दाहावा " और “मिठउआ.”.......... जहा मधुलेश, त्रिपुरेन्द्र, गजेन्द्र, योगेश , अनु , अभिषेक खूब खेला है वो भी ऐसे- २ खेल जिसका नाम सुनने पर हसी आती है  जैसे हाड़ी मुवावान , गाय पकड़ आदि ..........कभी फिर से एक नए अंदाज में अपना बचपन लिखुगा  तब तक के लिए .......... प्रणाम !


हमारे गाँव के सारे बुज़ुर्ग कहते हैं
बड़े शहरों में बहुत छोटे लोग रहते हैं।
गाँव से शहर में आए तो ये मालूम हुआ
घर नहीं दिल भी यहाँ पत्थरों के होते हैं।
कोशिश तो की बहुत मगर दिल तक नहीं पहुँचे
वो शहर के थे हाथ मिलाकर चले गए।
किसके दिल में है क्या अंदाज़ा नहीं मिलता है
शहर-ए-दीवार का दरवाज़ा नहीं मिलता है।
मर के वो अपने खून से तहरीर लिख गया
इक अजनबी को शहर में पानी नहीं मिला।
फूलों की न उम्मीद करो आके शहर में
घर में यहाँ तुलसी की जगह नागफनी है।
होटल का ताज़ा खाना भी स्वाद नहीं दे पाता है
माँ के हाथ की बासी रोटी मक्खन जैसी लगती है।
होठों पर मुस्कान समेटे दिल में पैनी आरी है
बाहर से भोले-भाले हैं भीतर से होशियारी है।
भूखे प्यासे पूछ रहे हैं रो-रो कर राजधानी से
कब तक हम लाचार रहेंगे आख़िर रोटी पानी से।
जब तक पैसा था बस्ती के सबके सब घर अपने
थे
जब हाथों को फैलाया सबके दरवाज़े बंद मिले।
मशरूफ़ हैं सब, दौरे-तरक्की के नाम पर
कोई भी मेरे शहर में खाली नहीं मिलता।


सौजन्य- मधुलेश पाण्डेय "निल्को" 

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