Blockquote

Followers

23 March, 2013

भारतीय राष्ट्र जीता जागता 'राष्ट्र पुरुष' है।


मधुलेश पाण्डेय "निल्को"
दोस्तो, हम पाते हैं कि भारतीय राष्ट्र जीता जागता 'राष्ट्र पुरुष' है।हमें भारत देश के साथ अपने आप पर भी गर्व करना चाहिए, क्योंकि हमने भारत में जन्म लिया है । भारत की संस्कृति में विभिन्न युगों में समय-काल-परिस्थिति तथा उन युगों के रीति-रिवाज, परंपरा, लोगों के विचारधाराओं एवं मान्यताओंको ध्यान में रखते हुए अनेक बार बदलाव हुआ है। यही कारण है कि आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह की संस्कृतियाँ, भाषायें, परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ बरकरार हैं ।राष्ट्रीय एकता प्रत्येक देश के लिए महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है सांस्कृतिक एकता और सांस्कृतिक एकता का सबसे प्रबल माध्यम साहित्य की परिधि के अन्तर्गत महाकाव्यों का विशेष महत्व है, लेकिन मुझे लगता है की आजकल भारतदेश वाकई कई समाजिक उथल पुथल से गुज़र रही है। बहुत प्रयास के बाद हम अंग्रेजों को भारत से निकलने में सफल हो गए थे। लेकिन अभी भी ये देश भाषाएँ , प्रदेशों , प्रान्तों ,उत्तर, दक्षिण ,मज़हब,धर्म , जाती आदि के तौर पर बंट कर ही रह गया है। इस देश में गरीबी , बेरोज़गारी आदि बहुत जटिल समस्याएँ है। मगर पड़े लिखे लोग भी इस मद्दे पर ध्यान देने से ज्यादा अपने जाती के लोगों को ही तरक्की करते हुए देखने में मज़ा लेते हैं। बहुत अफ़सोस की बात है। केवल अफ़सोस ही नहीं मुझे तो ऐसे लोगों से घ्रणा है। जो काले गोरे का भेद करते है
इस विशिष्टता के आधार पर एक कवि कहता है
बोली कोयल मैं हूँ काली
मुझसे रहे देश की लाली।
काले कृष्ण, राम भी काले
भारतवासी भी हैं काले।
काले होकर मीठा बोलो
वाणी में मिश्री-सी घोलो।
सच तो यह है कि जब-जब देश पर विपत्ति पड़ी, भारत के लोगों ने धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर अपनी हिन्दवी-एकता प्रदर्शित की है। जब चीनी आक्रमण हुआ तो घर-घर से महिला-पुरुषों ने अपने जेवरात् निकाल कर सरकार को सौंप दिये।
      
       अभी हाल में ही हमने अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का स्वरूप देखा है। इसमें भी धर्म-जाति के भेदभाव को भुलाकर कर हिन्दवी-एकता का साकार स्वरूप प्रकट हो चुका है। इसप्रकार भारतीय जनमानस का अन्तर्मन अपनी परम्परागत संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना के अनुरूप बारम्बार जाति-धर्म के भेदभाव को भुलाकर हिन्दवी-एकता को स्थापित करना चाहता है, लेकिन हमारी राजनीति इस जनचेतना को विश्रृंखलित करने का कुचक्र रच देती है।
भारतीय राजनीति में व्याप्त छलनात्मक चतुराई, स्वार्थ और पाखंड से सिंचित विषैली कूटनीति के बावजूद कुछ ऐसा भी है जो देश की सतत् रक्षा करता आ रहा है। इसमें तो पहली है हमारी आध्यात्मिक संस्कृति जो कभी राजनीतिज्ञों की पोषिता नहीं रही। दूसरी है राष्ट्रभाषा हिन्दी जिसका क्रेज निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वैश्वीकरण के इस युग में शेष विश्व की तरह भारतीय समाज पर भी अंग्रेजी तथा यूरोपीय प्रभाव पड़ रहा है। बाहरी लोगों की खूबियों को अपनाने की भारतीय परंपरा का नया दौर कई भारतीयों की दृष्टि में अनुचित है। एक खुले समाज के जीवन का यत्न कर रहे लोगों को मध्यमवर्गीय तथा वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कुछ लोग इसे भारतीय पारंपरिक मूल्यों का हनन मानते हैं। विज्ञान तथा साहित्य में अधिक प्रगति ना कर पाने की वजह से , भारतीय भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है । उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है।
कोई राष्ट्र जब अपनी सांस्कृतिक जड़ों से उन्मूलित होने लगता है, तो भले ही ऊपर से बहुत सशक्त और स्वस्थ दिखाई दे....भीतर से मुरझाने लगता है। स्वतन्त्रता के बाद भारत के सामने यह सबसे दुर्गम चुनौती थी.....पाँच हज़ार वर्ष पुरानी परम्परा से क्या ऐसे राष्ट्रका जन्म हो सकता है, जो अपने में एकभारतीय सभ्यता के इस आध्यात्मिक सिद्धान्त को अनदेखा करने का ही यह दुष्परिणाम था कि पश्चिमी इतिहासकारों...और उनके भारतीय सबाल्टर्नअनुयायियों की आँखों में भारत की अपनी कोई सांस्कृतिक इयत्ता नहीं, वह तो सिर्फ़ कबीली जातियों सम्प्रदायों का महज एक पुँज मात्र है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि यदि ऐसा होता, तो भारत की सत्ता और उसके अन्तर्गत रहनेवाले सांस्कृतिक समूहों की अस्मिता कब की नष्ट हो गई होतीहुआ भी उन अनेकस्रोतों से अपनी संजीवनी शक्ति खींच सके, जिसने भारतीय सभ्यता का रूप-गठन किया था ।

भारत की सभ्यता व संस्कृति का सानी नहीं कोई ,
विश्व के इतिहास में ऐसा स्वाभिमानी नहीं कोई !
वतन की सरज़मीं पर हुए शहीदों का बलिदान न व्यर्थ हो ,
उनकी कुर्बानी को याद कर युवाओं में देशभक्ति का संचार हो !
देश के नवयुवक जाग्रत हो देश का ऊँचा नाम कराएं ,
विश्व के मंच पर मिसाल बन भारत को महाशक्ति बनाएं !
मेरा सपना है कि भारत एक दिन विकसित देशों कि श्रेणी में आए ,
एक बार फिर से सोने कि चिडियां कहलाए !!!
     उस महान देश और उसके महान लोगों के बारे में देख, समझ और जानकर, किसी भी ईमानदार और होशमंद इंसान का सिर, उनके प्रति श्रध्दा और सम्मान से अपने आप झुक जाता है। चाहे वह इंसान किसी भी धर्म या देश का क्यों न हो। वह महान भारत और महान भारतीयों को नमस्कार करने से नहीं चूकता। भारत सचमुच महान है। उसके लोग सचमुच महान हैं। वे हर क्षेत्र में महान हैं। सिर से पाँव तक महान हैं मेरे ख़याल से एक राम, एक कृष्ण, एक गाँधी. सिर्फ इन नामों का सहारा लेकर हम आम तौर पर महानता का दावा नहीं कालजयी कवियों और साहित्यकारों के रूप में सूर्य और चंद्रमा पैदा करने की ताकत केवल हिन्दुस्तान की माटी में है, जिसने सूरदास जैसे साहित्य के सूर्य और तुलसीदास जैसे चंद्रमा को जन्म दिया। इस देश के साहित्य में वह ताकत है कि उसके बलबूते हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता हजारों वर्षों से कायम है और आगे भी हजारों वर्षों तक कायम रहेगी।! 

"जय हिंद, जय हिंदी, यह भारतीय एकता

* मधुलेश पाण्डेय “निल्को” *




आप मेरे ब्लाग पर पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, 
और ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें! 
धन्यवाद .........! 
VMW Team 
 The Team With Valuable Multipurpose Work 
vmwteam@live.com
 +91-9044412246;
+91-9044412223
 +91-9024589902;
+91-9261545777
Loading...