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10 February, 2013

एक कविता जो

 

एक कविता जो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई ...!


एक कविता जो शुरू होने से पहले
 ही खत्म हो गई !
शाम ढलने से पहले
 ही सुबह हो गई
बैठा था किसी के आदेश के इंतजार में
और बैठा ही रह गया
उस आदेश की इंतजार मे जो
 कभी तो मिलेगी ,
 किसी काम को पूरा करने के लिए
लेकिन आदेश से पहले
ही वह पूरी हो गई ।
कभी - कभी तो लोग
 कुछ कहते है निल्को ,
और आप करते हुये भी
 न करते है उसको ॥
इन सब बातों से लगा की
एक बार फिर ज़िंदगी
 नई से पुरानी हो गई ।
लेकिन ये
एक बुरे सपने जैसा था
और मैं समझा की यही
अपनी कहानी हो गई ।
रात के बाद एक
 नई सुबह फिर आई
और
मुझे इन बेकार की बातों से
 अलग कर गई ।
इन सब बातों को
 कविता के माध्यम से लिखने की
कोशिश की तो
कविता शुरू हो ने से पहले ही
 खत्म हो गई ।

 मधुलेश कुमार पाण्डेय “निल्को”



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