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27 June, 2012

संसार में दो प्रकार के व्यक्ति हैं

संसार में दो प्रकार के व्यक्ति हैं-सापेक्ष जीवन जीने वाले और निरपेक्ष होकर जीने वाले। जो सापेक्ष होकर जीते हैं वे आलम्बन लेकर चलते हैं। सामान्यत: हर व्यक्ति को सहारे की अपेक्षा रहती है। बच्चा जब चलना शुरू करता है तो मां की अंगुली पकड़कर चलता है। व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश करने वाला अनुभवी व्यक्तियों का सहारा खोजता है। विद्यार्थी अध्यापक का आलम्बन चाहता है। पर्याप्त क्षमता अर्जित होने के बाद सहारे की जरूरत नहीं होती। अक्षमता की स्थिति में अवस्था प्राप्त व्यक्ति सहारे की अपेक्षा अनुभव करता है। ध्यान के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले साधक भी प्रारम्भ में निर्विकल्प ध्यान नहीं कर सकते। इसलिए ध्यान के लिए भी आलम्बन आवश्यक है। आलम्बन कौन नहीं लेता? जो व्यक्ति सक्षम होता है, संकल्प का धनी होता है, धृतिमान होता है। पुरुषार्थ में विास करता है और बचाव का उपाय नहीं खोजता, वह सहारे की प्रतीक्षा नहीं करता। थोड़ी सी साधन सामग्री से भी वह अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर देता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के बारे में कहा जाता हैिवजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधि: विपक्ष: पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्च कपय:। तथाप्येको राम: सकलमवधीत् राक्षसकुलम् क्रियासिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणो।। लंका पर विजय पाने और समुद्र को लांघने का कठिन कार्य। सामने रावण जैसा शक्तिशाली दुश्मन। इधर युद्ध में सहायता करने वाले बन्दर। इस स्थिति में भी श्रीराम का मन प्रकम्पित नहीं हुआ। उनके विचारों की धरती पर सन्देह का पौधा नहीं उगा। वे चले, लंका पहुंचे और सम्पूर्ण राक्षस कुल को जीतकर सफल हो गये। महान पुरुषों की सफलता उपकरण सामग्री में नहीं, उनके सत्त्व में रहती है, प्रबल मनोबल में रहती है। संसार में जितने भी महान व्यक्तित्त्व हुए हैं, वे कभी साधन सामग्री के मोहताज नहीं बने। जो साधन उपलब्ध हुए उन्हीं के बल पर उन्होंने लक्ष्य तक पहुंचने में सफलता पायी। ध्यान के आचायरे और योग-साधकों ने निरालम्बन एवं सालम्बन-दोनों प्रकार की योगसाधना को अपनी स्वीकृति दी है। जो लोग पहुंचे हुए होते हैं, परिपक्व होते हैं, वे निरालम्बन ध्यान का प्रयोग करते हैं। प्रारम्भ में आलम्बन बिना चित्त को ठहरने का स्थान नहीं मिलता। चित्त चंचल न हो, उसे पकड़ा जा सके, किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जा सके, इस दृष्टि से अनेक आलम्बन बताये गये हैं। रूपस्थ, पदस्थ आदि ध्यान की प्रक्रियाओं में आकृतियों और मंत्रों का आलम्बन लिया जाता है। - ‘जब जागे तभी सबेरा से’
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