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29 June, 2012

फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता |

ईश्वर ने हर एक को स्वतंत्रता प्रदान की है, अत: यदि कोई पुरुष भौतिक भोग करने का इच्छुक है और इसके लिए देवताओं से सुविधाएं चाहता है तो प्रत्येक हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित भगवान उसके मनोभावों को जानकर ऐसी सुविधाएं प्रदान करते हैं। कुछ लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि ईश्वर जीवों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करके उन्हें माया के पाश में गिरने ही क्यों देते हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि परमेश्वर उन्हें ऐसी सुविधाएं प्रदान न करें तो फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अत: वे सबों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं- चाहे कोई कुछ करे- किन्तु उनका अंतिम उपदेश हमें भगवद्गीता में प्राप्त होता है- मनुष्य को चाहिए कि अन्य सारे कायरे को त्यागकर उनकी शरण में आए। इससे मनुष्य सुखी रहेगा। जीवात्मा तथा देवता दोनों ही परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं। अत: जीवात्मा न तो स्वेच्छा से किसी देवता की पूजा कर सकता है, न ही देवता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई वर दे सकते हैं। सामान्यत: जो लोग इस संसार में पीड़ित हैं, वे देवताओं के पास जाते हैं, क्योंकि वेदों में ऐसा करने का उपदेश है कि अमुक-अमुक इच्छाओं वाले को अमुक-अमुक देवताओं की शरण में जाना चाहिए। चूंकि प्रत्येक जीव विशेष सुविधा चाहता है, अत: भगवान उसे विशेष देवता से उस वर को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा की प्रेरणा देते हैं और उसे वर प्राप्त हो जाता है। जीवों में वह प्रेरणा देवता नहीं दे सकते, किन्तु भगवान परमात्मा हैं जो समस्त जीवों के हृदयों में उपस्थित रहते हैं, अत: कृष्ण मनुष्य को किसी देवता के पूजन की प्रेरणा प्रदान करते हैं। सारे देवता परमेश्वर के विराट शरीर के विभिन्न अंगस्वरूप हैं, अत: वे स्वतंत्र नहीं होते। वैदिक साहित्य में कथन है, ‘परमात्मा रूप में भगवान देवता के हृदय में भी स्थित रहते हैं, अत: वे देवता के माध्यम से जीव की इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था करते हैं किन्तु जीव तथा देवता दोनों ही परमात्मा की इच्छा पर आश्रित हैं।
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