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29 June, 2012

आईआईटी-सामंजस्यकारी और संतुलित

केंद्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले की साझा एकल परीक्षा और आईआईटी की स्वायत्तता का हल निकल आने से बड़ी दुविधा दूर हो गई है। इसके लिए आम राय से जो नया फामरूला बना है, उसमें संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) और शीर्ष संस्थानों की स्वायत्तता, दोनों का समावेश किया गया है। इसलिए यह सामंजस्यकारी और संतुलित लगता है। इसी से उम्मीद है कि इसके पक्षकारों में से एक एनआईटी भी चार जुलाई को होने वाली बैठक में अपनी मुहर लगा देगा। यह एक महीने से भी ज्यादा समय से चले आ रहे विवाद का लोकतांत्रिक तरीके से समापन होना माना जाएगा। इस विवाद के मूल में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की वह महत्त्वाकांक्षी नीतियां हैं, जो शिक्षा-परीक्षा के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव लाने के सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। 10 वीं तथा 12 वीं की पढ़ाई और परीक्षा पद्धति में अपेक्षित सुधार के बाद इंजीनियरिंग-मेडिकल की बहुस्तरीय परीक्षाओं को नियंत्रित करना था। लेकिन छात्रों को सिर्फ जरूरी परीक्षाओं में बैठाने और उनका स्वरूप एकदेशीय करने की मंशा में शीर्ष संस्थानों की स्वाभाविक स्तरीयता के निर्वाह का ख्याल नहीं रखा गया। कानपुर और नई दिल्ली के भारतीय प्रौद्योगिक संस्थानों को जेईई का सरकारी नजरिया पांच दशकों में अर्जित उनकी विशिष्टता तथा स्वायत्तता पर हस्तक्षेप लगा। आज अगर भारतीय मेधा की विदेशों में पूछ है तो आईआईटी में दाखिले की विशिष्ट परीक्षा पद्धति, उनके शिक्षक और स्वायत्त संचालन व्यवस्था का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। यह प्रतिष्ठा उन प्रक्रियाओं में समय के मुताबिक संशोधनों से बरकरार रह सकती है। इस पर अमल के बजाय आईआईटी को सर्वशिक्षा अभियान के डंडे से नहीं हांका जा सकता। शिक्षण क्षेत्र में भले इसे एक असमाजवादी दृष्टिकोण माना जाए लेकिन खास मेधा के साथ खास व्यवहार करना ही पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने आईआईटी और उनके पूर्व छात्रों की मांगों पर सहमति जताते हुए सरकारी हस्तक्षेप न होने देने का उचित ही आश्वासन दिया था। नये फामरूले में पहली बार विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं में छात्रों के हासिल अंकों को भी शामिल किया गया है। शीर्ष के 20 फीसद तक पर्सेटाइल वाले छात्रों को आईआईटी में दाखिले के काबिल माना जाएगा। इससे उनमें स्कूल स्तर पर भी बेहतर प्रदर्शन की जिजीविषा बनेगी। एआईईईई को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि सफल छात्रों का प्रदर्शन स्कूलों में कैसा रहा है? श्रेणीबद्धता की रक्षा पर अड़े और इसे पाने में सफल रहे आईआईटी जेईई एडवांस की परीक्षा में उन खांचों को कैसे तोड़ पाएंगे जो 20 वीं सदी के अपेक्षाकृत तंग मॉडल बने हुए हैं, यह भी देखना है। 21 वीं सदी में बहुआयामी ढांचा बनाने की जरूरत है। अक्सर देखा गया है कि इन संस्थानों में दाखिला लेने वाले बहुत से छात्रों में इंजीनियरिंग की स्वाभाविक चाह नहीं होती। वे किसी न किसी दबाव में यहां चले आते हैं। कक्षाओं में अपने को असहज महसूस करते हैं जबकि यहां भी दाखिला वही गणित, भौतिकी और रसायन विषयों के लब्धांक के आधार पर होता है। यह कोचिंग संस्थानों के फलने-फूलने का रास्ता खुला छोड़ता है, जिसे नारायण मूर्ति ‘रट्टामार प्रतिभाओं के उत्पादक’ बताते हुए इंजीनियरिंग की स्वाभाविक मेधा की शिनाख्त में अड़ंगा बताते हैं। लिहाजा, परीक्षा के परंपरागत विषय और तरीके अंतरराष्ट्रीय मानकों की मांग करते हैं।
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