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03 June, 2012

लोटा तो पीतल का है, जुलाहे का नहीं

कबीर गंगा के घाट पर थे। उन्होंने एक ब्रम्हांड को किनारे पर हाथ से अपने शरीर पर पानी डालकर स्नान करते देखा तो अपना लोटा देते हुए कहा, ‘लीजिए इस लोटे से आपको स्नान करने में सुविधा होगी।’
ब्रम्हांड ने आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए कहा, ‘रहने दे। ब्राण जुलाहे के लोटे से स्नान करने से भ्रष्ट हो जाएगा।’ संत कबीर हंसते हुए बोले, ‘लोटा तो पीतल का है, जुलाहे का नहीं, रही भ्रष्ट, अपवित्र होने की बात है, तो मिट्टी से साफ कर गंगा के पानी से इसे कई बार धोया गया है और यदि यह अभी भी अपवित्र है तो मेरे भाई दुर्भावनाओं, विकारों से भरा मनुष्य क्या गंगा में नहाने से पवित्र हो जाएगा?’ कबीर के इस पलटवार ने ब्रम्हांड को निरुर कर दिया।
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