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30 May, 2012

राजनीतिक कार्टून द्वारा टी.के.ओझा













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तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की?

दानदाता ने एक रूपए का सिक्का फेंका तो वह बजाए भिखारी के डिब्बे में गिरने के सड़क पर जा गिरा। भिखारी ने दानदाता को दुआएं देते हुए सिक्का उठाकर डिब्बे में डाल लिया। तभी कहीं से हंसने की आवाज आई, खिलखिलाकर हंसने की! एक रूपए के सिक्के ने क्रोध से चौंककर आसपास देखा तो उसे पास की दुकान के शानदार शो-केस में रखा पांच सौ रूपए का नोट दिखा, खिलखिलाकर हंसता हुआ!  'गुस्से से क्या देख रहा है।' पांच सौ रूपए का नोट गर्वोक्ति से बोला 'तेरी औकात भी है मेरी तरफ देखने की? और जहां तक हंसने का सवाल है तो भिखारी को दी जाने वाली चीज सड़क पर गिर जाए तो हंसी आ ही जाती है।'
'कोई बात नहीं, हंस लो, खूब हंस लो' एक रूपए के सिक्के ने शांति से जवाब दिया 'पर जरा बाद में अपने बारे में भी सोच लेना। हमें पाकर भिखारी दाता को दुआएं ही देता है। हमें या दाता को शक की नजर से नहीं देखता, हमारी असलियत नहीं परखता।'

खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।

स्टैण्ड पर बस के आते ही सवारियों के साथ मैं भी उसमें चढ़ने की कोशिश करने लगा। बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिर बस में चढ़ पाने में कामयाब हो गया। मगर थोड़ी देर में भीष्ाण गर्मी के मारे भीड़ में दम घुटने लगा था। मेरे समीप ही एक ग्रामीण वृद्ध खड़ा था।  हाथ में गन्ने के 10-15 टुकड़ों का एक गटर लिए था।
उसका चेहरा उसकी दास्तां कह रहा था। वह रह रहकर बेचैनी-सी महसूस कर रहा था। सांसें भी कुछ लम्बी खींच रहा था। बस में खासी भीड़ थी क्योंकि बस काफी समय के बाद आई थी। खाली सीट पाने के लिए उसकी निगाहें थम गई। एक सीट को खाली देखते हुए उस पर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-बाबा इस सीट पर बैठ जाओ। 
इतने में दूसरी सवारी ने कहा यह हमारी सीट है, साथ वाले नीचे गए हैं। यह सुनकर वह वृद्ध बेबस, विवश, असहाय-सा होकर खड़ा रहा। अब बस रफ्तार तेज करते हुए उबड़ खाबड़ रास्ते पर दौड़ने लगी थी। मगर उस युवक की बगलवाली सीट अब भी खाली थी। यह देखकर वृद्ध ने पुन: बैठने की चेष्टा ही की थी कि उस युवक ने पीछे खड़ी एक नवयौवना को आकर बैठने का इशारा किया। यह देखकर धीरे से मुंह पिचकाकर ग्रामीण वृद्ध कुछ बुदबुदाने लगा और पुन: किसी खाली सीट को फिर से तलाशने लगी थीं उसकी बूढ़ी निगाहें।


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24 May, 2012

देश में पेट्रोल बम







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19 May, 2012

फेसबुक के आईपीओ पर निवेशकों की पैनी नजर है।

 फेसबुक के आईपीओ पर निवेशकों की पैनी नजर है। कंपनी इस आईपीओ के जरिए 5600 अरब रुपये की मालिक बनने जा रही है। आईपीओ प्लानिंग से लेकर इसे बाजार में लाने तक के लिए काफी मेहनत भी की गई है, लेकिन क्या आपको पता है कि फेसबुक आईपीओ का मास्टर माइंड कौन है? इसके पीछे दिमाग किसका है? आईपीओ की प्लानिंग किसने की? किसने फेसबुक को वित्तीय मजबूती दी? इन सबका जवाब अधिकतर लोग मार्क जुकरबर्ग ही देंगे। अगर आपका जवाब भी यही है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। जी हां, मार्क जुकरबर्ग से ज्यादा इस काम को अंजाम फेसबुक के मुख्य वित्त अधिकारी (सीएफओ) ने दिया है।
42 साल के डेविड इंबरसमैन ही फेसबुक आईपीओ के चीफ मास्टर माइंड हैं। स्वभाव से काफी शांत इंबरसमैन पर्दे के पीछे के खिलाड़ी है। फेसबुक से पहले इन्होंने 2009 में जेंटैक की पूरी हिस्सेदारी दिलाने में भी अपनी पुरानी कंपनी आरएचएचबीवाई में अहम रोल निभाया था। इंबरसमैन के एक सहयोगी कर्मचारी मार्क भी उन्हें वॉल स्ट्रीट का जानकार मानते हैं।
फेसबुक में आने के बाद से इंबरसमैन कंपनी को वित्तीय मजबूत करने में लगे हुए थे। कुछ लोगों की टीम के साथ मल्टीईयर बजट तैयार किया गया था। इसे फाइनेंस की टीम ने हैक कर लिया था। उसके बाद भी इंबरसमैन ने हार नहीं मानी। इसे अंतिम रूप देने के लिए कई महीने लगे। इंबरसमैन को कई स्तर पर इस बजट को बनाने में मुश्किल का सामना भी करना पड़ा था।
जानकारों का मानना है कि फेसबुक को पब्लिक मार्केट में लाना बिल्कुल आसान काम नहीं था। कंपनी के खर्चो में पिछले 1-2 साल में 70-75 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। वहीं रिस्क फैक्टर भी बढ़ा है। इन सबके बावजूद इंबरसमैन ने इसे मुमकिन कर दिखाया।
इंबरसमैन ने गुडविल पाने के लिए कंपनी की बाकी गतिविधियों में भी हिस्सा लेना चालू कर दिया था। उन्होंने फेसबुक की टॉप 40 इन हाउस ब्रांड फीडबॉम्ब को ज्वाइन कर लिया। इससे भी कंपनी के कर्मचारियों को जानने और वित्तीय जरूरतों को समझने में इंबरसमैन को काफी मदद मिली।
दिलचस्प है कि फेसबुक ने अपने आईपीओ का प्राइस बैंड 34-38 डॉलर तक रखा है। पहले कंपनी ने अपने आईपीओ के लिए 28-35 डॉलर का प्राइस बैंड निर्धारित किया था। प्राइस बैंड के अधिकतम स्तर यानी 38 डॉलर के हिसाब से अगर फेसबुक की कीमत आंकी जाए तो कीमत बैठती है करीब 104 बिलियन डॉलर यानी पांच लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा।
कंपनी अभी पूरे शेयर नहीं बेच रही है। अभी जितने शेयर बेच रही है उससे कंपनी को करीब 12 बिलियन डॉलर यानी 60 हजार करोड़ रुपये मिलेंगे। कंपनी 33 करोड़ शेयरों की जगह अब करीब 42 करोड़ शेयर बेचेगी। फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग तो कंपनी में अपनी हिस्सेदारी नहीं बेचेंगे लेकिन सिलिकॉन वैली के बड़े उद्योगपति पीटर थील 16 करोड़ शेयर बेचेंगे। गोल्डमैन सैश ने भी करीब 28 करोड़ शेयर बेचने का फैसला किया है। हेज फंड टाइगर ग्लोबल 23 करोड़ शेयर बेचेगा।

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लोगों की नौटंकी और बहकावे पर मत जाओ... और.... "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं"

Siddharth Singh

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। VMW Team के सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत की एक पेशकश .....
 इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।
आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।
एक अन्य श्लोक में कहा गया है
ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।
ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।
चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।
भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।

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 सिद्धार्थ सिंह श्रीनेत,राजस्थान 


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16 May, 2012

नेहरू युवा केन्द्र------------ग्रामीण युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं दम तोड़ रही हैं।

  ग्रामीण युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं दम तोड़ रही हैं। योजनाओं का क्रियान्वयन अधिकांश तौर पर फाइलों में ही हो रहा है, इसकी शिकायतें लगातार मिल रही हैं। इन्हीं योजनाओं का संचालन नेहरू युवा केन्द्र भी करता है। प्रदेश के सभी जिलों में केन्द्र खोले गए हैं। इनके कार्यो की पारदर्शिता जानने के लिए जन सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत सूचना मांगी गयी है।
नगर पालिका परिषद सिद्धार्थनगर के सिसहनिया निवासी राधेश्याम ने जन सूचना अधिकारी नेहरू युवा केन्द्र से जो सूचनाएं मांगी हैं, उसमें आठ बिन्दु शामिल हैं। आवेदक ने यह जानकारी चाही है कि सिद्धार्थनगर में नेहरू युवा केन्द्र द्वारा कौन-कौन से कार्यक्रम विगत पांच वर्षो से संचालित किये जा रहे हैं। कार्यक्रमों के संचालन हेतु कितना धन प्राप्त हुआ।
प्रत्येक कार्यक्रम पर किस प्रकार का धन खर्च किया गया। प्रत्येक संचालित कार्यक्रम में कौन-कौन से लोग सम्मिलित थे। केन्द्र पर कितने पंजीकृत एवं अपंजीकृत मण्डल दर्ज हैं और उनका कार्य क्षेत्र कहां है। इसमें कौन-कौन लोग जुड़े हैं। विगत दस वर्षो के दौरान कितने लोगों को कितना वेतन या मानदेय दिया गया, वर्षवार नाम व पदनाम सहित व्योरा। दस वर्षो में केन्द्र समन्वयक द्वारा कितना वेतन प्राप्त किया गया है।
सूचना में नेहरू युवा केन्द्र समन्वयक के चल-अचल संपत्ति का व्योरा भी मांगा गया है। सूचना में निर्धारित पोस्टल शुल्क की कापी लगाते हुए जरिए रजिस्ट्री विभाग को भेजा गया है।
सूचना मांगने वाले राधेश्याम का कहना है कि मेरे मोबाइल फोन नम्बर पर विभाग के एक व्यक्ति द्वारा सूचना के व्योरा का फोटो कापी देने के लिए दस रुपए प्रति पेज शुल्क मांगा जा रहा है, जबकि सूचना अधिकार अधिनियम में तीस दिन के भीतर सूचना देने पर दो रुपये प्रति पेज देय होता है। मैं निर्धारित शुल्क विभाग को देने के लिए तैयार हूं। निर्धारित समय तक सूचना न देने पर स्वयं के खर्च पर विभाग को सारी सूचनाओं की प्रति उपलब्ध कराने का अधिनियम में प्रावधान


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13 May, 2012

‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार.....ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है।
हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।
हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:
‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

वेदों में ‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना ‘माँ’ से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को ‘शिवा’ (कल्याणकारी), ‘वयस्था’ (अवस्था को बनाए रखने वाला) और ‘धात्री’ (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह ‘हरीतकी’ (हरड़) के गुणों की तुलना ‘माँ’ से कुछ इस प्रकार की है:
‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापांे को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा का कवच का काम करती है।’ इसके साथ ही श्रीमदभागवत में कहा गया है कि ‘माँ’ बच्चे की प्रथम गुरू होती है।‘
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से ‘माँ’ को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं कि:
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमेः।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:
‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)
तैतरीय उपनिषद में ‘माँ’ के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है:
‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)
संतो का भी स्पष्ट मानना है कि ‘माँ’ के चरणों में स्वर्ग होता है।’ आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रारंभिक चरण में ‘शतपथ ब्राहा्रण’ की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है:
‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्ष अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है कि:
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
‘चाणक्य-नीति’ के प्रथम अध्याय में भी ‘माँ’ की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथा:
‘रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरू की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)
‘चाणक्य नीति’ में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, ‘माता के समान कोई देवता नहीं है। ‘माँ’  परम देवी होती है।’
महर्षि मनु ने ‘माँ’ का यशोगान इस प्रकार किया है:
 ‘दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण ‘माँ’ होती है।’
विश्व के महान साहित्यकारों और दार्शनिकों ने ‘माँ’ की महिमा का गौरवपूर्ण बखान किया है। एच.डब्लू बीचर के अनुसार, ‘जननी का हृदय शिशु की पाठशाला है।’ कालरिज का मानना है, ‘जननी जननी है, जीवित वस्तुओं में वह सबसे अधिक पवित्र है।’ इसी सन्दर्भ में विद्या तिवारी ने लिखा है, ‘माता और पिता स्वर्ग से महान् हैं।’ विश्व प्रसिद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, ‘शिशु का भाग्य सदैव उसकी जननी द्वारा निर्मित होता है।’ महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में ‘माँ’ की महिम कुछ इस तरह बयां की:
‘स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी’।।

(अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
इसके अलावा श्री गुप्त ने ‘माँ’ की महिमा में लिखा है:
‘जननी तेरे जात सभी हम,
जननी तेरी जय है।’

इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना ‘मातृभूमि’ में कुछ इस प्रकार ‘माँ’ की महिमा का उल्लेख किया है:
‘है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।’

(जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही ‘माँ’ के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है-वही दिव्य जननी है।’सिनेमा में भी ‘माँ’ पर आधारित बहुत सारी फिल्में और गाने बनाए गए हैं। कई गीत तो इतने मार्मिक बन पड़े हैं, जिनको सुनकर व्यक्ति एकदम द्रवित हो उठता है। मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा फिल्म ‘दादी माँ’ (1966) के लिए लिखा गया यह गीत आज भी ल���गों के हृदय पटल पर अपनी अमिट छाप बनाए हुए है:
‘उसको नहीं देखा हमने कभी,
पर इसकी जरूरत क्या होगी!
ऐ माँ...ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी!!’

‘माँ’ के बारे में लिखी गई ये हृदयस्पर्शी पंक्तियां हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं:
‘कौन सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती।
सबकुछ मिल जाता है, लेकिन,
 हाँ...! ‘माँ’  नहीं मिलती।’

जो नारी ‘माँ’ नहीं बन पाती, वह जीवन भर स्वयं को अधूरा मानती है और जीवन भर तड़पती रहती है। समाज में ऐसी औरत को ‘बांझ’ कहा जाता है और उसकी कदम-कदम पर उपेक्षा की जाती है। नारी की इसी मनोदशा को हरियाणा के ‘सूर्यकवि’ पं. लखमीचन्द ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पूर्ण भगत’ में कुछ इस तरह चित्रित किया है:
‘बांझ दोष की बीर नै के बेरा,
सन्तान होण का किसा दर्द हो सै।’

(अर्थात, जो औरत ‘माँ’ न बनी हो यानी जो बांझ हो, भला उसे प्रसव-पीड़ा का क्या पता हो सकता है।)
नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग ‘शकुन्तला-दुष्यन्त’ में कुछ इस प्रकार समाहित किया है:
‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रहा्रा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रहा्रा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रहा्रा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रहा्रा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)
कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी ‘माँ’ की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में ‘माँ’ के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी ‘लक्ष्मी माँ’, ज्ञान की देवी ‘सरस्वती माँ’ और शक्ति की देवी ‘दुर्गा माँ’ मानीं गई हैं। नवरात्रों में ‘माँ’ को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘माँ’  के चरणों के नीचे स्वर्ग है।’ ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।’ ईसाई धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की ‘माँ’ मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहुदी लोग भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहुदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी ‘माँ’ का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, ‘माँ’ के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। ‘माँ’ को अंग्रेजी भाषा में ‘मदर’ ‘मम्मी’ या ‘मॉम’, हिन्दी में ‘माँ’, स��स्कृत में ‘माता’, फारसी में ‘मादर’ और चीनी में ‘माकून’ कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से ‘माँ’ के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन ‘ममत्व’ और ‘वात्सल्य’ की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। ‘मातृ दिवस’ संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में ‘मदरिंग सनडे’ के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को ‘मातृ-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में ‘माता तीर्थ उत्सव’ मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘मातृ-दिवस’ मनाने की परंपरा है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
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11 May, 2012

शिक्षा........EDUCATION .........के व्यवसायीकरण

भारत में शिक्षा के क्षेत्र का क्या महत्व है ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। हमारे देश के करोड़ों बच्चे हर सुबह अपना बस्ता लेकर स्कूल जाते हैं। हर माता-पिता की तमन्ना रहती है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर खूब बड़ा बने और दुनिया में खूब नाम रोशन करे। इन स्वप्नों को पूरा करने में स्कूल और हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन विडंबना है कि लोगों के जीवन को गढ़ने वाली यह पाठशाला आजकल एक ऐसे भयावह काले वातावरण से घिरती जा रही है जिससे निकलना फिलहाल तो काफी मुश्किल नजर रहा है। यह काला स्याह वातावरण व्यावसायिकता का है। वो व्यवसायिकता, जिसने अच्छी शिक्षा को सिर्फ रईस लोगों की बपौती बनाकर रख दिया है और साधारण तथा मध्यमवर्गीय परिवार अब बड़े स्कूलों को दूर से टकटकी लगाकर देखते हैं और सोचते हैं कि काश उनका बच्चा भी ऐसे स्कूलों में पढ़ पाता। अब आप लोगों के लिए एक जानकारी। कि भारत में स्टेट पीरियड यानी आजादी के पहले स्थापित हुए कुछ स्कूलों का आज भी बहुत नाम है। ये स्कूल अपनी उच्च स्तर की शिक्षा के लिए देश में ही नहीं पूरी दुनिया में अपना नाम बनाए हुए हैं। इन स्कूलों की लिस्ट में कुछ स्कूल आजादी के बाद भी जुड़े हैं। इन स्कूलों को शान से कॉलेज भी कहा जाता है। लेकिन आम बातचीत में इन्हें पब्लिक स्कूल कहा जाता है। इनकी संख्या देश में नौ है। ये पब्लिक स्कूल हैं ग्वालियर का सिंधिया स्कूल, कोलकाता का बिशप स्कूल, राजकोट का राजकुमार कॉलेज, अजमेर का मेयो कॉलेज, इंदौर का डेली कॉलेज, देहरादून का दून स्कूल, दिल्ली का दिल्ली पब्लिक स्कूल आदि। इन स्कूलों में प्रतिवर्ष फीस के रूप में प्रति छात्र एक लाख से दो लाख रुपए खर्चा आता है। तो साहब ये स्कूल पब्लिक स्कूल जरूर हैं लेकिन ये पब्लिक के लिए हैं नहीं, आम लोगों को इन शानदार स्कूलों से दूर ही रखा गया है, बस पब्लिक सिर्फ इनके नाम के साथ, और नाम के लिए ही जुड़ी हुई है। अब बात स्थानीय स्कूलों की करते हैं। इंदौर, जयपुर, पूना, हैदराबाद जैसे बी ग्रेड शहरों (बी ग्रेड यानी जो देश के चारों महानगरों में नहीं आते लेकिन महानगर बनने की ओर अग्रसर हैं) में तमाम ऐसे स्कूल हैं जो वाकई पब्लिक के लिए हैं लेकिन उन्होंने एक नई विडंबना पैदा कर दी है। इन स्कूलों में अपने बच्चों को - साल पहले जिन माता-पिता ने हजार रुपए सालाना फीस में भर्ती किया था, उन स्कूलों में इतने वर्षों में फीस बढ़कर २५-३५ हजार रुपए साल हो गई। यानी चार-पाँच साल पहले की फीस के मुकाबले पाँच से छह गुना ज्यादा। तो क्या वाकई पिछले पाँच सालों में हमारी कमाई में पाँच से छह गुना इजाफा हुआ है। और मान भी लेते हैं कि हुआ है तो ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं जो इस स्तर की कमाई कर रहे हैं। इंदौर में रहते हुए मैं आज भी ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ जो तीन हजार रुपए में अपने परिवार का महीना भर पेट पालते हैं, तो क्या वे ऐसे स्कूलों के बारे में सोच भी सकते हैं जो उनके बच्चे को महीने भर पढ़ाने के बदले हजार रुपए मांग रहा है......???

अभी इस सेशन में मैं अपने दोस्त के  बच्ची को गढ़मुक्तेश्वर के एक स्कूल में ले गया। वो स्कूल यहाँ का जाना-माना है। उन्होंने  दो साल की छोटी बच्ची को एडमिशन देने के लिए 10 हजार रुपए माँगे। मैं भौंचक्का रह गया क्योंकि ये उनकी फीस थी कोई डोनेशन नहीं। अरे भाई एक साल में आप ऐसा क्या निहाल कर देंगे, 2 साल के एक बच्चे के साथ कि आपको 10 हजार रुपए दे दिए जाएँ। इतने रुपए जितने में हमारी तो पूरी पढ़ाई ही हो गई। क्या इसी वजह से लोग एक बच्चे के बाद दूसरे बच्चे के बारे में सोच नहीं रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इतनी महंगी परवरिश वे कहाँ से दे पाएँगे......??? ........... लोग अपना पेट काटकर ऐसे फाइव स्टार स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं बिना ये सोचे कि क्या ये स्कूल वाकई ऐसा कुछ उनके बच्चों को दे रहे हैं कि वो १२ साल में कई लाख रुपए उन स्कूलों को दे दें। हालांकि मैंने ये 10 हजार रुपए कम ही बताए हैं।
दोस्तों , कालांतर में इस व्यवसाय बनती शिक्षा का क्या होगा, मैं नहीं कह सकता लेकिन इतना तय है कि सरकारी स्कूल अपनी सिकुड़ती भूमिका में हैं और जिस देश के सरकारी स्कूलों में १८ करोड़ से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हों, उस देश में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चों को नाकारा और ठुस्स करार दे दिया जाता है, ये निहायत ही दुख वाली बात है। हम मानते हैं कि हमारी सरकार शिक्षा को राज्य स्तर में बाँटने के कारण स्कूली शिक्षा का स्तर बनाए रखने में पिछड़ गई लेकिन केन्द्रीय विद्यालयों की सफलता बताती है कि स्कूली लेवल पर शिक्षा का अच्छा स्तर बनाकर रखा जा सकता है बशर्ते केन्द्र इसमें दिलचस्पी ले। केन्द्र को यह भी सोचना चाहिए कि वो आम जनता को क्यों इस प्रकार लुटने दे रही है। इन व्यवसायिक निजी स्कूलों के स्तर की ही शिक्षा मिशनरी स्कूल (मसलन सेंट पॉल, कॉन्वेन्ट, सेंट जेवियर, सेंट रैफल, सेंट नारबर्ट आदि) भी दे रहे हैं और अपेक्षाकृत काफी कम फीस में, तो कुछ स्कूलों को ऐसा अधिकार क्यों कि वो बच्चों के भोले-भाले अभिभावकों से एक साल की पढ़ाई का आधा लाख रुपया वसूल ले। मुझे लगता है कि मैंने आज कई लोगों की दुखती रग पर हाथ रखा होगा, ये मेरी भी दुखती रग है लेकिन क्या करें फिलहाल इसका कोई इलाज नहीं दिख रहा है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने केंद्र की यूपीए सरकार पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का आरोप लगाया है। परिषद का कहना है कि सरकार शिक्षा के व्यवसायीकरण पर अंकुश लगाने, शिक्षा की

 स्वायत्तता को बढ़ावा देने एवं  छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सरंक्षण करने में नाकाम रही है।

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