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13 February, 2012

बढती हुई मंहगाई का जिम्मेदार कौन है ?

अनुज
देश में मँहगाई बढ रही है , लोगों का जीना मुश्किल हो गया है , इस तरह की उक्ति हम आये दिन सुनते रहते है | संसद के हर सत्र में इस मुद्दे पर गतिरोध बना रहता है | राजनैतिक पार्टियाँ पक्ष – विपक्ष की भुमिका में अपनी जोर-आजमाईश करती नजर आती हैं पर ले-दे के मुद्दा ही गौण रह जाता है | फिर अगले सत्र की आस लग जाती है पर सवाल उठता है कि बढती हुई मंहगाई का जिम्मेदार कौन है ? बता  रहे है अनुज जी ....
इस सवाल के जबाव में हमारे प्रधानमन्त्री कहते हैं कि महंगाई भारतीय लोगों की समृद्धि का प्रतीक है | अर्थशास्त्री मनमोहन जी को लगता है कि उनके द्वारा बनायी गयी हरेक नीति अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है | इसीलिये तो मौका मिला ना कि हाजिर हो जाते हैं एक नये बिल के साथ पर सरकार को कोई तो बताये कि नया बिल बनाने से बेहतर है कि पुरानों को सही कार्य दिशा मिले । हाल ही में एफडीआई जैसे बिल इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । अब बात जब मंहगाई पर चल रही है तो चर्चा इसके प्रत्यक्ष प्रभाव पर भी हो जाये , भारत में रहने वाले अधिकतर लोग मंहगाई से त्रस्त तो हैं लेकिन मँहगाई से जो समाप्ति की कगार पर हैं वो वर्ग ६०फीसदी से अधिक है , गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले इन लोगों के लिये दो वक्त की रोटी के लिये भी मशक्कत करनी पड रही है , भोजन जो कि मानव की प्राथमिक जरुरत है , के अभाव में दम तोडने वालों की संख्याँ दिन – प्रतिदिन बढती जा रही है ।
वहीं एक दूसरा वर्ग भी है जिसे मंहगाई की परवाह तो है पर दूसरे रुप में । इन्हें आज तक भले – बुरे , ऊँच – नीच की सही परख नहीं है , इनकी बातें बाज़ारों में खरीदारी की होती हैं , बाज़ार में रोज कारों की कीमत में इजाफा हो रहा है , कम्पनियाँ रोज नये माडल बनाकर कीमत टाइट कर रही हैं पर वाहन निर्माताओं के संगठन सियाम के अनुसार नवंबर २०‍१‍१ में कारों की बिक्री भारत में ७ फीसदी बढकर ‍१७‍१,‍१३‍१ इकाई हो गयी जबकि मोटरसाइकिलों की बिक्री २३ फीसदी बढकर ८,६९,०७० इकाई हो गयी । सियाम के अनुसार बाज़ार में घरेलु कार बिक्री में तेजी आयी है । ये आँकडें इस भारतीय मानसिकता को दर्शाने के लिये काफी हैं , अगर ये कार खरीदने जाते है तो भले ही उसका दाम प्रतिदिन आसमान को छूता जाये इनकी नाक – भौं नहीं सिकुडेगी पर अगर किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की कीमतों में जरा सी वृद्दि की भनक लग गयी कि लगे हाय – तौवा मचाने , बाज़ार में यदि ५० पैसे का कोला ‍१० रुपये में बिक रहा है तो ये चाव से पीयेंगे ही मित्रों को भी इनवाइट करेंगे , कोई मोल -भाव नही प्रिंट की कीमत अदा करने में लेकिन सब्जी की खरीदारी में सब्जी – वाले से मोल भाव करेंगे आखिर ऐसा क्यों ? ये लोग ५ स्टार की पार्टियों में एक-एक प्लेट खाने की कीमत पाँच सौ से हज़ार में देते हैं लेकिन घर के लिये खरीदे गये चावल में मंहगाई की बू आती है इन्हें ।
खाद्य पदार्थों की बढती कीमतों के लिये वर्तमान अर्थव्यवस्था को जिम्मेदार ठहराएं या सरकारी नीतियों को और प्रबंधन की खामियों को ? जिम्मेदार कोई भी हो पर सबसे ज्यादा घाटा तो किसानों को ही उठाना पड़ता है यह दबा-कुचला तबका ऊपज तो अपनी मेहनत – मशक्कत और सामर्थ्य के बल पर करता तो है पर उसकी उपज की कीमत बाजार तय करती है । एक छोटा किसान जो कि प्रतिदिन थैले में अनाज लेकर मंडी जाता है तो राशन – पानी का जुगाड होता है , भला उसे अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति जैसे कठिन शब्दों से क्या वास्ता, उसे तो गृहस्थी का सामान कैसे जुटाना है इसके लिए भी सोचना पड़ता है। आज चावल बाज़ार में ३० रुपये किलो मिल जाता है पर किसान के यहाँ से ‍महज १०-‍१२ रुपये प्रति किलो खरीदा जाता है | इस अंतर के बाबजूद किसान तो अपनी ऊपज के बाद बाज़ार पर ही निर्भर रहते हैं , बाज़ार जहाँ कि बिचौलियों और कालाबाज़ारियों की चलती है वहाँ से इनको लुटे – पिटे ही घर लौटना पड़ता है | जहां तक बात सरकारी नीतियों की है तो भारत में नीतियों के क्रियान्वयन में घोर अनियमितता व्याप्त है और इसी के कारण आज तक कृषकों को उनका सही स्थान नहीं मिल सका है | बाज़ार में व्याप्त कालाबाजारी और जमाखोरी ने किसानों की हालत खस्ती कर दी है | ज्यादातर किसान या तो खेती करना नही चाहते या फिर करते हैं तो उन्हें उचित लाभांश नहीं मिल पाता है | किसानों के हित में उचित समर्थन मूल्य की कमी ने इन बिचौलियों को पैर पसारने की खुली अनुमति दे रखी है |
भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है , ऐसे में ना केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार की गुंजाईश कृषि क्षेत्र पर निर्भर है बल्कि एक बडे वर्ग को खाद्य की उपलब्धता को कृषि क्षेत्र ही सुनिश्चित कर सकता है | खाद्य पदार्थो का उचित वितरण ही इस समस्या को निर्मूल करने में सहायक होगा ।जन वितरण प्रणाली में न सिर्फ मिटटी के तेल बल्कि बहुत सारे खाद्य सामग्रियां भी उपलब्ध कराई जाती रही है पर या तो ये योजना बंद कर दी गयी या भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा बन चुकी हैं | यह अभी के समय में निचले स्तर की भ्रष्ट प्रणाली का एक बड़ा पर्याय है इसको दुरुस्त करना सरकार की अहम जिम्मेदारी होनी चाहिए ताकि गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे लोगों के लिए उचित मूल्य पर भोजन की उपलब्धता हो |
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