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30 January, 2012

भगवद्ग गीता

पंडित नगनारायण पाठक
रूस में किसी संगठन ने भगवद्ग गीता  को प्रतिबंधित करने के लिए मुकदमा दायर किया, तो अपने देश में भी कई हलकों से विरोध के स्वर सुनाई पड़े। पर अजीब बात है कि जब भारत में ही अदालत जाकर गीता पढ़ाना बंद करने की मांग होती है, तो ऐसा प्रतिवाद नहीं दिखता! जब रूस में मुकदमा हुआ, लगभग उसी समय कर्नाटक के स्कूलों में गीता पढ़ाने को ‘असांविधानिक’ कहकर न्यायालय में चुनौती दी गई थी। कर्नाटक में गीता पढ़ाने का कार्यक्रम सरकारी नहीं था, न उसमें सरकारी धन लगने वाला था। वह एक प्रतिष्ठित मठ का प्रयास था, ताकि छात्रों को नैतिक शिक्षा मिले। सरकार ने केवल स्कूलों को इसके लिए सप्ताह में एक घंटा समय देने भर का निर्देश दिया था। इसी को न्यायालय से रोकने का आग्रह हुआ।

गीता के विरुद्ध न्यायालय जाने वाले संगठनों के अध्यक्ष की दलील थी, ‘तब तो कल कोई कुरान और बाइबिल भी पढ़ाना चाहेगा। यदि स्कूलों में मजहबी किताबें पढ़ाई जाने लगेंगी, तो विद्यार्थियों का क्या होगा?’ इस तर्क में दोहरी गलती थी। पहला यह कि गीता मजहबी पुस्तक नहीं है। और दूसरा यह कि जिनके प्रतिनिधि न्यायालय गए, उन्हीं अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में कुरान, हदीस पढ़ाए जा रहे हैं। उन संस्थाओं को न केवल अनुदान मिलता है, बल्कि उनके प्रमाणपत्रों को सामान्य शिक्षा संस्थानों के समकक्ष भी मान्यता दी जा रही है। फिर, विभिन्न ईसाई मिशनरी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में बाइबिल भी पढ़नी जरूरी होती है। कई जगहों पर छात्रों को उसकी परीक्षा भी देनी होती है।
रूस वाले प्रसंग पर आपत्ति करने वालों को कभी अपने देश के इस दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य पर भी मुंह खोलना चाहिए। यहां गीता को शिक्षा से बाहर रखना एक सचेत जबर्दस्ती है। गैर-हिंदू मजहबी शिक्षण को प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों रूपों में आधिकारिक सहयोग और प्रोत्साहन तक दिया जाता रहा है, जबकि भारतीय ज्ञान-परंपरा की हर चीज से हिंदुओं समेत सबको वंचित रखने की जिद ठानी गई है। यह निर्विवाद है कि गीता कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रबंधन संस्थानों में इसका अध्ययन पाठ सामग्री में शामिल है, ताकि काम को ठीक ढंग से करने की प्रेरणा, चरित्र और बुद्धि मिल सके। अल्बर्ट श्वाइतजर, अल्डस हक्सलेस, हेनरी थोरो, टॉल्सटॉय जैसे विश्व की अनेकानेक महान शख्सियतों ने इस पुस्तक को दुनिया का यथार्थ समझने के लिए अनमोल रचना माना है। लिहाजा इसका विरोध ही एक घातक सांप्रदायिक दृष्टि है।
विडंबना है कि स्वतंत्र भारत में वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि कालजयी ग्रंथों को न ज्ञान-भंडार का सम्मान मिला, न धर्म-पुस्तक का। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में रामायण को जिस कुत्सित रूप में पढ़ाने की चेष्टा हो रही है, वह इसका लाक्षणिक उदाहरण है। केवल भर्त्सना करने, खिल्ली उड़ाने के लिए ही ‘मेनी रामायन्स’ और ‘३०० रामायण’ जैसे पाठ विषय वस्तु में डाले जाते हैं। किंतु जब गीता या रामायण को सहजता से पढ़ने-पढ़ाने का प्रस्ताव हो, तब उन्हें ‘रिलीजियस’ कहकर विद्यार्थियों को दूर रखने का प्रयत्न होता है। इस दोहरेपन को क्या कहें?
अपने देश में हो रहे इस दोहरे अन्याय को ईसाइयत के उदाहरण से भी समझा जा सकता है, जैसा द विंची कोड, एंजेल्स ऐंड डीमंस आदि पुस्तकों, फिल्मों से भी स्पष्ट है। पश्चिमी समाज बाइबिल और चर्च की कथाओं, भूमिकाओं की आलोचनात्मक व्याख्या करता है और सहता है। किंतु साथ ही ईसाइयत का पूरा चिंतन, चर्च और वेटिकन के विचार, भाषण, प्रस्ताव, आदि यूरोप की शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग हैं। वहां ईसाइयत संबंधी शिक्षा-विषय उसी तरह स्थापित हैं, जैसे भौतिकी, रसायन, अर्थशास्त्र आदि विषय। अतः यदि यूरोपीय जगत ईसा और ईसाइयत की कथाओं, ग्रंथों की आलोचनात्मक व्याख्या करता है, तो उससे पहले उसके संपूर्ण अध्ययन को एक सहज विषय के रूप में मुख्य शिक्षा-प्रणाली में सम्मानित आसन भी देता है, लेकिन अपने देश में ऐसा नहीं है। आलम यह है कि हिंदू ग्रंथों को उपेक्षित करने के लिए ही इसे जब चाहे धर्म-पुस्तक मानकर बहिष्कृत किया जाता है, अथवा सामान्य साहित्य मानकर जैसे-तैसे चीरा-फाड़ा जाता है। यह दोहरापन हर हाल में बंद होना चाहिए।

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पंडित नगनारायण पाठक
संजाव, देवरिया
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