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26 May, 2011

लोभ का परिणाम हमेशा बुरा होता है।

वीरभद्र मणि पाठक
प्राचीन काल की बात है, एक राजा थे। उनके मात्र एक पुत्री थी। वे एक   पुत्र प्राप्ति के लिये ऋषि-मुनियों की तन मन धन से सेवा किया करते थे। उन की सेवा से खुश होकर एक बार ऋषि ने पूछा - "राजन ! कैसे पुत्र की कामना है तुम्हें ?"  राजा अपार खुशी में डूब कर बोला - भगवन !  मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जिसके सब सोने के हो । ऋषि ने आशीर्वाद दिया - तथास्तु!
             जब राजा के यहां पुत्र  पैदा हुआ तो उसका नाम स्वर्णष्ठीवी रखा गया क्यों कि ऋषि आशीर्वाद के प्रताप से राजकुमार  जो कुछ भी विसर्जन करता था वह सोने का हो जाता था। राजा की खुशी का कोई ठिकाना न था। राजमहल की हर वस्तु स्वर्ण की हो गई और राजकोष में सोने का अम्बार लग गया। राजकुमार की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।  सभी राजकुमार  को देखने आते थे। डाकुओं  के  एक  दल ने  सोचा, यदि राजकुमार  को हम  उठा लायें  तब  हमारे  पास  भी  बहुत सारा सोना  हो जायेगा। डाकू  किसी तरह  राजकुमार  को  राजमहल  से   चुरा  कर  ले आये और  स्वर्ण  एकत्र  करने  लगे। अधिक दिन   तक   राजकुमार   को    छिपा  कर रखना  संभव  नहीं  था  क्योंकि  राजा  के  गुप्तचर  राज्य   में   सभी  ओर  फैले  हुए  थे। अत: यह  निर्णय लिया गया कि  राजकुमार  को  मार  कर  एक  बार  में  ही  स्वर्ण  भंडार  हासिल  कर  लिया   जाए। राजकुमार  की  हत्या  कर  दी  गई।   राजकुमार  के   मृत  शरीर  से  डाकुओं  को  जरा सा भी  सोना नहीं  मिला। राजा  फिर  से  पुत्रहीन हो  गया। राजा  ने  लोभवश  ऐसा  पुत्र  मांगा जिससे उसे  धन  की  प्राप्ति तो  हुई  लेकिन  उसे  राजकुमार  से  हाथ  धोना  पडा। 
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V.B.Pathak
Lar, Deoria
VMW Team (India's New Invention)
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