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29 May, 2011

काश ऐसा होता.. बेरोजगार कोई न होता

गजेन्द्र कुमार ओझा
काश ऐसा होता तो प्रत्‍येक गरीब एवं भूखे के घर में चूल्‍हा अवश्‍य जल सकता था सरकारी ऑकडों में कभी किसी को भूख से मरते हुए नहीं दिखाया जाता क्‍योंकि इससे कई बडे अफसरों की फजीहत हो जाने का खतरा रहता है आर्थिक तंगी से आत्‍महत्‍या करते लोगों के बारे में समाचार सुनने पढने को मिलते रहते है बेरोजगारी से तंग आकर से पूरे पूरे परिवार यह दुनिया छोड देते है और समाचार पत्र के एक कोने में स्‍थान बनाकर हमेशा के लिए विदा होना हो जाते हैं। उसी समाचार पत्र के मुखप्रष्‍ठ पर किसी नेता को देश में मंदी के बाबजूद रोजगार अवसरों में वढोत्‍तरी बताते हुये देख सकते हैं। आख‍िर देश की ऐसी तरक्‍की से किसी बेरोजगार को क्‍या फायदा। सरकार द्धारा चलाया जा रहा रोजगार विभाग सफेद हाथी बन गया है। कह सकते हैं कि रोजगार विभाग स्‍वंय बेरोजगार है एवं कुव्‍यवस्‍थाओं का शिकार है। है आश्‍चर्य कि जिस देश में बेरोजगारी अपने चरम पर हो एवं जहॉं सरकार का प्रत्‍येक कदम रोजगार के लिये उठाया जा रहा हो,वहॉं रोजगार विभाग के पास कोइ काम नहीं है। बेराजगारी का एक पक्ष यह भी है कि इस देश में जब तक किसी को सरकारी नौकरी नहीं मिलती तब तक वह स्‍वंय को बेरोजगार ही समझता है,हालांकि कुछ समय से इस धारणा में परिवर्तन गया है।इसलिये बेरोजगारी के सही आंकडे उपलब्‍ध नहीं है, अडंर इम्‍पलायड लोग भी स्‍वंय को बेरोजगार मानते हैं। लेकिन सरकारी नौकरी का रूतबा अभी भी इतना ज्‍यादा है कि इसके प्राप्‍त करने के लिये जमीन बेचने, मॉं-बहन के जेवर गिरबी रखने या सूद पर कर्ज लेने का कर्त्‍वय बहुत छोटी चीज है। इस सच को नकारना बहुत कठिन है। नीति नियंता जरूर सत्‍ता की हनक में इससे शुतुरमुर्गी अदांज में मुंह मोड सकते हैं। अभी भी ऐसा लग रहा है कि बेरोजगारी के अनेक आयाम मेरे सोच के दायरे से छूट रहे हैं। इस रोग की इतनी गजब दास्‍तां है कि सुनते सुनाते आप नींद के आगोश में जा सकते हैं। 

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GAJENDRA KUMAR OJHA
VMW TEAM
INDIA'S NEW INVENTION 

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