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16 March, 2011

जलजलों का देश जापान // जल गया,बह गया !


योगेश पाण्डेय 

निल्को जी
जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। सुनामी के कारण कई रिफ़ायनरीज़ में आग लग गयी। कई सौ अरब रुपये की परिसंपत्तियां नष्ट हो गयीं। जनजीवन ध्वस्त हो गया। निश्चित रूप से यही कहा जायेगा "जलजलों का देश जापान जल गया,बह गया"  VMW Team के योगेश पाण्डेय जी और निल्को  जी की एक रिपोर्ट....

जापान में आज क़ुदरत के क़हर का ख़ौफ़नाक नज़ारा पेश आया जिसने पूरी दुनिया को दहला कर रख दिया। टोक्यो से करीब 400 किलोमीटर दूर समुद्र में अचानक लहरों उठकर अपने उफ़ान पर आईं और देखते ही देखते 7 मीटर ऊंची लहरों ने टोक्यो का रूख़ कर लिया। लहरें इतनी तेज़ थीं कि पानी के जहाज़ लहरों के साथ बहकर शहर के अंदर गए। कई छोटे-बड़े पानी के जहाज़ अनियंत्रित होकर शहर में घुसे और इमारतों, फ्लाईओवर, ओवर ब्रिज से जा टकराये।  यूं तो जापान को सुनामी और भूकंप का देश माना ही जाता है क्यूंकि हर चार या पांच साल में एक ना एक बार जापान को प्राकृतिक आपदा का सामना करना ही पड़ता है. जापान अपनी तकनीक और कार्यकुशलता के लिए हमेशा से ही दुनिया में अव्वल रहा है लेकिन जब बात प्रकृति से लड़ने की आती है तो वह बहुत लाचार दिखता है, लेकिन हमें यहां जापान की आपदा प्रबंधन की तारीफ भी करनी होगी जो उसने इस प्रलय के पल भर में ही अपने आप को संभालना शुरु कर दिया और दुनिया के सामने एक उदाहरण रखा कि कैसे आग लगने से पहले ही कुंआ खोदना बेहतर होता है.
हम चाहे तकनीक के सहारे कितना भी आगे निकल जाए पर हम प्रकृति के सामने बौने ही रहेंगे यह हमें मानना ही पड़ेगा. जापान में तकनीक के सहारे आगे बढ़ने की चाहत में वहां की प्राकृतिक संरचना के साथ बहुत खिलवाड़ हुआ था. आज जापान का हाल ऐसा है कि वहां हर तरफ बड़ी बड़ी इमारते और ऊंची ऊंची बिल्डिंगें ही दिखाई देती हैं जो कहीं कहीं भूकंप जैसे आपदाओं को निमंत्रण देती नजर आती है.
इस भारी आपदा ने हमारे सामने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे सुनामी जैसी गंभीर विपदा का हम पूर्वानुमान लगा सकें. या हमें हमेशा की तरह प्रकृति के आगे यूं ही घुटने टेकते रहना पड़ेगा.
जापान अकेला ऐसा अभागा देश है, जिसने दूसरे महायुद्ध के दौरान परमाणु हमले की विभीषिका झेली थी। इस आपदा को अमेरिका ने इंतकाम की भावना से वहां के निरीह लोगों पर थोप दिया था। बाद में बरसों तक लोग रेडियशन जनित बीमारियों से दम तोड़ते रहे लेकिन वहां के लोगों ने अपनी जेहनियत को बदला और बजाय प्रतिशोध के, नवनिर्माण का बीड़ा उठाया। कहने की जरूरत नहीं कि वे इसमें सफल रहे और जल्दी ही दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बन गए। जापान तीन दशक के अंदर पूरी दुनिया के सामने मानवता की नजीर बन गया। तमाम पश्चिमीकरण के बावजूद वहां के लोगों ने अपनी संस्कृति और सकारात्मकता को जिंदा रखा।
अब अपने देश पर आते हैं। 26 जनवरी, 2001 को जब गुजरात में धरती डोल उठी थी, तब समूचे हिन्दुस्तान ने खुद को बेबस पाया था। दस बरस बाद हम अफसोस के साथ स्वीकार कर सकते हैं कि भूकंप या प्राकृतिक आपदाओं से जूझने के लिए हमने जापान जैसी कोई तकनीक विकसित नहीं की है। भारत में तो केंद्र और सूबाई सरकारें इन्हें लेकर गंभीर हैं और ही सामाजिक जागरूकता को बढ़ाने की कोई कोशिश की जा रही है। एक समय था, जब रेडक्रॉस और सिविल डिफेंस के लोग स्कूलों में जाते थे और बच्चों को जंग से लेकर प्राकृतिक आपदा तक से जूझने का प्रशिक्षण दिया करते थे। पब्लिक स्कूलों की बाढ़ ने केवल शिक्षा के स्तर का कबाड़ा किया है, बल्कि तमाम अच्छी रवायतों को भी धो डाला है। हमारे सहयोगी टी.के.ओझा "नीशू" कहते है --
ना तो कुछ बताकर आती है ,जब आती है दबे पाँव आती है ,
वो नाच है खौफनाक मौतकी जब वो धरती फाड़कर आती है .
जलके तरंगो पर सवार होकर हर लहर तबाही को लेकर किनारे आया ,
ये ताकतवर इंसान को सिर्फ बेबस और लाचार बनाकर जाती है .

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VMW Team (Indai's New Invention)
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