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26 February, 2011

25 February, 2011

रेल बज़ट- दरियादिली नही दीदी की,यह दीदी की माया है

डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
  आज ममता बनर्जी  अपना रेलवे बजट पेश कर रही है, सुबह से ही मीडिया का फोकस रेलवे बजट पर था, न्यूज़ एंकर ग्राफिक्स की बनीं ट्रेनों में बैठकर एंकरिंग कर अपना मज़ाक उडवा रहे और संवाददाता रेलवे स्टेशनों में जा-जाकर लोगों से उनकी बजट पर राय ले रहे थे। न्यूज़ चैनलों में ममता उनकी दीदी बनकर छायीं रहीं रेल बज़ट पर VMW Team  के डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी जी की एक रिपोर्ट...

    25 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। घर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े भाई देवरिया  में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा, एक अदद रेलमंत्री हिमाचल से होगा तो वहां भी रेल चलेगी वरना यूं लगता है कि रेलों की ज़रूरत केवल बिहार ओर बंगाल में ही पड़ती है...
ममता बनर्जी अपने हर भाषण में खुद को गरीबों का मसिहा बताते हुए कहती है  कि 'उन्होंने अपने पुरे कार्यकाल में न ही रेल किराया बढाकर आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाला है और न ही घाटे का रेल बज़ट पेश किया़'.पर क्या रेलमंत्री लोगों को इस हद तक बेवकूफ समझते हैं कि आम जनता उनकी बातों का सही आकलन भी नहीं कर सकती?
उन्होंने लाभ का बज़ट पेश ज़रुर किया है पर भाड़े को पिछले दरबाजे से बढाकर.आज स्थिति यह है कि ट्रेनों की संख्या बढाने के बजाए, जनरल कोटे के सीट घटाकर तत्काल कोटे की सीट संख्या बढा दी गई है.ट्रेनों को सुपरफास्ट कर भाड़ा तो अधिक वसूला जा रहा है पर आज भी वे ट्रेनें सफ़र तय करने में उतना ही समय ले रही है जितना पहले लेती थी|


रेलवे की तरह नेता और बाबु का भी बज़ट भारी-भरकम होता है
तभी तो रेल मंत्रालय के लिए,मारा – मारी होता है।

 
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डॉ. आर. वी. चतुर्वेदी
VMW Team (India's New Invention)
+91-9044412246,45,27,23

24 February, 2011

कश्मीर.. धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट

 
 एम.के.पाण्डेय "निल्को जी"
कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट कहा जाता था आज भारत के लिए एक नासूर बन चूका है। कारण सिर्फ मुस्लिम जेहाद के तहत कश्मीर को इस्लामिक राज्य बना कर पाकिस्तान के साथ मिलाने की योजना ही है, और आज रास्त्रद्रोही अलगाववादियों ने अपनी आवाज इतनी बुलंद कर ली है की कश्मीर अब भारत के लिए कुछ दिनों का मेहमान ही साबित होने वाला है और यह सब सिर्फ कश्मीर में धारा ३७० लागु कर केंद्र की भूमिका को कमजोर करने और इसके साथ साथ केंद्र सरकार का मुस्लिम प्रेम वोट बैंक की राजनीति और सरकार की नपुंसकता को साबित करने के लिए काफी है VMW Team के एम.के.पाण्डेय "निल्को जी" की पेशकश....
                    भारत एक महान देश है और यहाँ के लोग और भी ज्यादा महान हैं । ख़ुद को क्रिकेट खेलना नहीं आता होगा लेकिन क्रिकेट खिलाड़ियों पर कमेन्ट जरुर करेंगे, ख़ुद राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगे लेकिन राजनीति को भला बुरा जरुर कहेंगे। यह बात कश्मीर के इतिहास से साबित हो जाता है जब सरदार बल्लव भाई के नेतृतव में भारतीय सेना ने कश्मीर को अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु नेहरु ने जनमत संग्रह का फालतू प्रस्ताव लाकर विजयी भारतीय सेना के कदम को रोक दिया जिसका नतीजा पाकिस्तान ने कबाइली और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और क़ाफ़ी हिस्सा हथिया लिया। और कश्मीर भारत के लिए एक सदा रहने वाली समस्या बन कर रह गयी, जब जम्मू-कश्मीर के वंधामा में दस साल पहले हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बारे में गृह मंत्रालय को जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने कहा है कि विभाग को ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है, जिसमें बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया था। यह घटना जग विदित है मगर सरकार को इसके बारे में मालूम नहीं, सरकार के इसी निक्कम्मा पन  के वजह से आज इन राष्ट्दोर्ही अलगाववादियों का हिम्मत इतना बढ़ गया है की अब ये कश्मीर को पूर्ण इस्लामिक राज्य मानकर कश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाने के लिए अब कश्मीर में बाहरी  राज्यों से आये हिन्दू मजदूरों को बहार निकल रहे हैं स्वतंत्रता दिवस के पवन अवसर पर हिंदुस्तान के राष्ट घ्व्ज को जलाया गया हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाया जा रहा है और सरकार मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए चुप बैठी है कश्मीर में आर्मी के कैंप पर हमला करके उनको जलाया जा रहा है फिर हम कैसे कह सकते हैं की कश्मीर हमारे अन्दर में है अगर कश्मीर का मुस्लिम हमारे साथ है तो क्यों वह देशद्रोही अलगाववादियों का साथ दे रही है? अगर केंद्र सरकार कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो क्यों नहीं वह वहां के अलगाववादी आतंकवादियों को के खिलाफ एक्शन ले रही है? क्यों नहीं सरकार विस्थापित कश्मीरी पंडितों को फिर से उनके जमीन को वापस दिला रही है क्यों कश्मीरी पंडितो के हक़ का दमन कर रही है ? क्यों नहीं आज तक हुए कश्मीर में कश्मीरी पंडितो के हत्याकांडो की जाँच करवा रही है ? कश्मीरी भाइयो का साथ देने वाले साम्प्रदायिक और अलगाववादी देशद्रोही सरकार के नज़र में क्यों आज़ादी का नेता बना हुआ है ? अगर इस सवाल का जवाब सरकार के पास नहीं है तो सरकार देश की जनता को धोखा देना छोर दे की कश्मीर हमारा है और अगर सरकार सच में कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो कश्मीरी पंडितो को इंसाफ दिलाये और अलगाववादी आतंकवादियों को सजा देकर कश्मीर को इन देशद्रोहियों से मुक्त कराये, अंत में एक सवाल सरकार और आपलोगों से क्या हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले अपने राष्ट घ्व्ज तिरंगे को सीने से लगाये मरने वाले साम्प्रदायिक हैं ? क्या हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगा कर अपने राष्ट घ्व्ज तिरंगे को जलाने वाला देशद्रोही नहीं और अगर देश द्रोही है तो इसके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं ?

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 एम.के.पाण्डेय  "निल्को जी"
VMW Team(India's New Invention)

भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ना शुरू कर दिया..

रुपेश तिवारी
भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान भूलवश पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ना शुरू कर दिया. बहरहाल, एक भारतीय अधिकारी द्वारा ध्यान दिलाये जाने के बाद कृष्णा ने इस भूल को सुधार लिया. अगर वहा भारतीय अधिकारी न होता तो भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा की क्या इज्जत होती हम सबको पता है VMW Team के रुपेश तिवारी की बेहतरीन पेशकश आप के लिए.....  

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुरक्षा और विकास पर आयोजित बहस में भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा करीब तीन मिनट तक पुर्तगाल के विदेश मंत्री का बयान पढ़ते रहे लेकिन संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत हरदीप सिंह पुरी ने उनका ध्यान इस तरफ दिलाया जिसके बाद उन्होंने अपनी गलती सुधार ली. मेरे ख्याल से तो भारत के दूत हरदीप सिंह पुरी को इनाम देना चाहिए उन्होंने भारत के विदेश मंत्री की नाक बचा ली. विदेश मंत्री एस एम कृष्णा तीन मिनट तक लगातार पुर्तगाल के विदेश मंत्री लुइस अमाडो का बयान पढ़ते रहे और उन्हें अपनी गलती का एहसास भी नहीं हुआ क्योंकि बयान का शुरूआती भाग संयुक्त राष्ट्र, विकास और सुरक्षा से संबंधित सामान्य मुद्दों पर केंद्रित था लेकिन कुछ पंक्तियां अलग भी थीं. इनमें से एक पंक्ति थी जो कृष्णा ने पढ़ी ‘पुर्तगाली भाषा बोलने वाले दो देशों, ब्राजील और पुर्तगाल के यहां एक साथ होने के सुखद संयोग को देखते हुए मुझे गहरा संतोष जाहिर करने की इजाजत दीजिए’ कृष्णा को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगा होगा क्योंकि हाल ही में ब्राजील ने सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता की थी. पुरी के टोकने से पहले उन्होंने पढ़ा ‘ यूरोपीय संघ भी संयुक्त राष्ट्र के साथ इसी तरीके से जवाब दे रहा हैं’ पुरी ने कृष्णा से, उनकी भूल की ओर ध्यान दिलाने के बाद कहा कि आप इसे फिर से शुरू कर सकते हैं. पुर्तगाल के विदेश मंत्री भारत के विदेश मंत्री के बोलने के पहले अपनी बात रख चुके थे. किन्तु अगर ध्यान से सुने भी होते तो शायद यह गलती नहीं करते .  
कोई बात नहीं जब चिड़िया खेत......
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रुपेश तिवारी
VMW Team (India's New Invention)

22 February, 2011

नजर लगना सिर्फ मन की भ्रांति नहीं..


रवि गुप्ता

नीरज मिश्रा

नजर लगना.. हम यह शब्द बचपन से सुनते आ रहे हैं। नजर लगना सिर्फ मन की भ्रांति नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक क्रिया है। VMW Team के रवि गुप्ता और नीरज मिश्रा की एक रिपोर्ट..
 विज्ञान के अनुसार शरीर में विद्युत तरंगें होती है। इन विद्युत तरंगों से किसी प्रकार से बाधित होने पर शरीर लकवे का शिकार हो जाता है अत: शरीर की विद्युतीय तरंगता से नजर लगने का सीधा संबंध है। बड़ों की तुलना में बच्चों को अधिक नजर लगती है क्योंकि बच्चों का शरीर कोमल होता है तथा उनके शरीर में विद्युतीय क्षमता बड़ों की तुलना में कम होती है। यदि कोई बच्चों को एकटक देखता रहता है तो उसकी नजरों की ऊर्जा बच्चे की ऊर्जा को प्रभावित करती है जिसके कारण बच्चा अनमना या बीमार हो जाता है। कई बार देखा गया है की नज़र के कारण अच्छा बाला व्यवसाय अचानक रुक जाता है नहीं तो अनेक प्रकार की परेशानिया आती रहती है जेसे बच्चे या बड़े दोनों को ही नज़र लग सकती है जिससे वह बीमार पड़ जाते है भारतीय समाज में नजर लगना और लगाना एक बहु प्रचलित शब्द है। लगभग प्रत्येक परिवार में नजर दोष निवारण के उपाय किये जाते हैं। घरेलु महिलाओं का मानना है कि बच्चों को नजर अधिक लगती है। बच्चा यदि दूध पीना बंद कर दे तो भी यही कहा जाता है कि भला चंगा था, अचानक नजर लग गई। लेकिन क्या नजर सिर्फ बच्चों को ही लगती है? नहीं। यदि ऐसा ही हो तो फिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि मेरे काम धंधे को नजर लग गई। नया कपड़ा, जेवर आदि कट-फट जाएँ, तो भी यही कहा जाता है कि किसी की नजर लग गई। हम सबकी कभी न कभी मुट्ठी भर नमक, तेल की बत्ती या डंडी वाली सूखी लाल मिर्च से नानी-दादी या माँ ने नजर जरूर उतारी होगी। ट्रकों के पीछे "बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला" पढ़ने को मिल ही जाता है। नजर की कोई स्पष्ट परिभाषा तो नहीं है परंतु अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि बुरी भावना या ईष्र्या की भावना से यदि कोई हमें या हमारी किसी सुन्दर वस्तु को देखता है तो स्वास्थ्य या उस वस्तु से संबंधित कष्ट होता है इसे ही नजर लगना कहते हैं। नजर सम्मोहन का नकारात्मक स्वरूप है।
प्राय नजर से बचने के लिए काला धागा पहनाने या काला टीका या काजल लगाने की परंपरा रही है। स्पष्ट है कि काला रंग नजर लगाने वाले की एकाग्रता को भंग कर देता है। तिलक लगाने और मंगल-सूत्र पहनने स्फटिक बनाने के पीछे यही भावना है। इसका भी वैज्ञानिक कारण है। विज्ञान भी यह मानता है कि काला रंग ऊष्मा का अवशोषक है। अत जब बच्चे को काला टीका या काला धागा बांधा जाता है तो वह किसी भी प्रकार की ऊष्मा बुरी नजर को बच्चों में प्रवेश नहीं करने देता तथा स्वयं ही अवशोषित कर लेता है। इसी वजह से बच्चों को नजर नहीं लगती। 
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 नीरज मिश्रा और रवि गुप्ता 
VMW Team (India's New Invention)


20 February, 2011

आम आदमी

आम आदमी पर लोगो का नजरिया पेश कर रहे है VMW Team के राजेश  गिरी "राज गोस्वामी"

राजेश गिरी "राज गोस्वामी"

सजीव सारथी कहते है की -

लफ्ज़ रूखे, स्वर अधूरे उसके,
सहमी सी है आवाज़ भी,
सिक्कों की झंकारें सुनता है,
सूना है दिल का साज़ भी,
तनहाइयों की भीड़ में गुम ,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता - आम आदमी ।
मौन दर्शी हर बात का ,
धूप का बरसात का,
आ जाता बहकाओं में ,
खो जाता अफवाहों में,
मिलावटी हवाओं में,
सडकों में फुटपाथों में,
मिल जाता है अक्सर कतारों में,
राशन की दुकानों में,
दिख जाता है अक्सर,
अपनी बारी का इंतज़ार करता -
दफ्तरों -अस्पतालों के बरामदों में ,
क्यों है अखिर ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी -
आम आदमी ।


 
वही सुरेश चन्द्र गुप्ता लिखते है की -
बेशर्म आम आदमी,
हर समय शिकायत करता है,
सरकार ने यह नहीं किया,
सरकार ने वह नहीं किया,
बेबकूफ यह भी नहीं जानता,
सरकार आम आदमी से बनती है,
आम आदमी से चलती नहीं,
सरकार बनाने की कीमत दी थी तुझे,
दारू, मुर्गा, कम्बल और ढेर आश्वासन,
साला सब भूल गया,
एहसान फरामोश कहीं का,
कितनी दरियादिल है सरकार,
हर पांच साल बाद आती है,
और बांटती है दारू, मुर्गा, कम्बल,
पुराने और नए-नए आश्वासन,
पर बेशर्म आम आदमी,
करता रहता है हर समय शिकायत.
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राजेश गिरी "राज गोस्वामी"
भटनी, देवरिया

सूचना के अधिकार

रवि कुमार पाण्डेय

त्रिपुरेन्द्र कुमार ओझा "नीशू"

सरकारी कार्यालयों में अक्सर लोगों का काम अटकाने का मामला सामने आता रहता है आम आदमी को इस समस्या से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से भारत सरकार नें वर्ष २००५ में राइट्स टू इन्फार्मेशन एक्ट ( आर. टी. आई ) कानून बनाया । जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर यह कानून देश के सभी हिस्सों में लागू है । देश का कोई भी नागरिक इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है । VMW Team के  रवि कुमार पाण्डेय और टी.के.ओझा "नीशू" की बेहतरीन खोज केवल  आप के लिए.....

वैसे तो सूचना  का अधिकार कानून इस देश के हर नागरिक को सशक्त बनाता है. और इसे कमजोर करने की कोई भी कोशिश अंतत: देश के हर आदमी को कमजोर करेगी. लेकिन हममें से बहुत से लोग जो अपने भ्रष्टाचार, जान पहचान, छल-कपट के गुण, पैसे, दिखावे आदि के दमपर इस तरह की कमजोरी से पार पाने के भ्रम में जी रहे हैं, उन्हें शायद सूचना के अधिकार कानून के कमजोर होने से फर्क नहीं पड़ेगा.  इसलिए उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि सूचना के अधिकार कानून को कमजोर किए जाने की किसी कोशिश के खिलाफ वे बोल सकेंगे.
इस कानून का मकसद सार्वजनिक विभागों के कामों की जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता लाना ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके । इसके लिए सरकार नें केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों का गठन भी किया है ।
आरटीआई कानून के दायरे में आने वाले विभाग :- सरकारी दफ्तर, पीएसयू, अदालतें, संसद व विधानमंडल, स्थानीय संस्थाए, सरकारी बैंक, सरकारी अस्पताल, बीमा कम्पनियाँ, चुनाव आयोग, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति कार्यालय आदि आरटीआई कानून के दायरे में आते है । इनके आलावा वैसे एनजीओ जो सरकार से फंडिंग प्राप्त करते हों, पुलिस, सीबीआई व सेना के तीनों अंगों की सामान्य जानकारी भी इस कानून के तहत ली जा सकती है ।
किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां जिनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा व अखंडता को खतरा हो, को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन होने व इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मामलों की जानकारी ली जा सकती है । अन्य देशों के साथ भारत के सम्बन्ध से जुड़े मामलों की जानकारी को भी इस कानून से अलग रखा गया है साथ ही साथ निजी संस्थाओं को भी इस दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन इन संस्थाओं की सरकार के पास उपलब्ध जानकारी को सम्बंधित विभाग के माध्यम से हासिल किया जा सकता है ।
यह कानून तमाम समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है. "हम अकेले क्या कर सकते हैं?" का जवाब है. सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल कर रहा हर आदमी देश को बेहतर बनाने में अपनी तरफ से आहूति दे रहा है. ..
-
रवि पाण्डेय और त्रिपुरेन्द्र ओझा
 

18 February, 2011

आखिर कैसी है यह ट्रॉफी

आइए, जानते हैं, आखिर कैसी है यह ट्रॉफी और क्या है इसका इतिहास...

वर्ष 1999 के विश्व कप में इस ट्रॉफी को एक आधिकारिक नाम दिया गया, आईसीसी विश्वकप ट्रॉफी... इससे पहले उसे प्रूडेंशियल कप, बेंसन एंड हेजेज़ कप, विल्स ट्रॉफी और रिलायंस कप के नाम से जाना गया... यह वह दौर था, जब विश्वकप के साथ प्रायोजकों का नाम जोड़ने का चलन था, लेकिन 1999 के बाद आईसीसी ने इसके साथ हमेशा के लिए अपना नाम जोड़ दिया... वर्ष 1975 में जब पहली बार विश्वकप खेला गया था, इंग्लैंड की जीवन बीमा कम्पनी प्रूडेंशियल कॉर्प ने इसे प्रायोजित करने का फैसला किया था, और उसकी शर्त थी कि कप के साथ उसका नाम जोड़ा जाए, सो, आईसीसी ने वही किया...
इसके बाद वर्ष 1979 और 1983 के विश्वकप के दौरान भी ट्रॉफी को प्रूडेंशियल कप के नाम से जाना गया... इसी कारण शुरुआती तीनों विश्वकप इंग्लैंड में ही खेले गए... 1983 में भारत ने विश्वकप जीता और इस तरह यह कप पहली बार भारत आया... वर्ष 1987 में विश्वकप पहली बार इंग्लैंड से बाहर खेला गया, और इसका आयोजन तत्कालीन चैम्पियनों की धरती भारत में किया गया, पाकिस्तान सह-आयोजक था। इस विश्वकप का मुख्य प्रायोजक थी, रिलायंस इंड्रस्ट्रीज, सो, विश्वकप ट्रॉफी या विश्वकप को रिलायंस कप के नाम से जाना गया...
रिलायंस आज भी विश्वकप का आधिकारिक प्रायोजक है, लेकिन अब ट्रॉफी के साथ उसका नाम नहीं जुड़ा है... इसके बाद विश्वकप 1992 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड की मेज़बानी में खेला गया, जिसे प्रायोजित किया सिगरेट बनाने वाली बड़ी कम्पनी बेन्सन एंड हेजेज़ ने, और यही कारण था कि इस विश्वकप को बेंसन एंड हेजेज़ कप के नाम से जाना गया...
ऑस्ट्रेलिया की सैर करने और नए नाम से जाने जाने के बाद विश्वकप ट्रॉफी एक बार फिर नए नाम से मशहूर होने के लिए तैयार थी... 1996 में विश्वकप का आयोजन फिर भारत में हुआ और इस बार इसे प्रायोजित किया सिगरेट बनाने वाली कम्पनी आईटीसी के सबसे बड़े ब्रांड विल्स ने, सो, इस ट्रॉफी को विल्स कप के नाम से जाना गया...
स्थान और नाम बदलते-बदलते ट्रॉफी मानो थक गई थी, सो, उसने नाम में स्थायित्व की गुहार लगाई, जिसे आईसीसी ने सुना और 1999 में इंग्लैण्ड, वेल्स, आयरलैण्ड, नीदरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड की संयुक्त मेज़बानी में खेले गए विश्वकप के आठवें संस्करण से इस ट्रॉफी को आईसीसी विश्वकप ट्रॉफी नाम दे दिया गया...
अब दिलचस्प तथ्य यह था कि आईसीसी ने ट्रॉफी को एक नया नाम तो दे दिया था, लेकिन उसके पास विजेता टीम को देने के लिए असल में कोई ट्रॉफी थी ही नहीं... प्रूडेंशियल कप (1975, 1979 और 1983) के बाद जितने भी विश्वकप खेले गए, ट्रॉफियां हमेशा के लिए विजेता टीमों को दे दी गईं, लेकिन आईसीसी आने वाले समय में ऐसा नहीं करने वाला था...
इसी को ध्यान में रखकर उसने एक आकर्षक ट्रॉफी तैयार करने का फैसला किया, जो सोने और चांदी से बनी होनी चाहिए थी और इसी कारण आईसीसी ने इस महत्वपूर्ण काम का जिम्मा लंदन के मशहूर ज्वेलर गेरार्ड एंड कम्पनी को सौंपा, जिसे दुनिया क्राउन ज्वेलर्स के नाम से जानती थी...
ज्वेलर ने दो महीने में 60 सेंटीमीटर और 11 किलोग्राम वजनी एक खास तरह की ट्रॉफी तैयार की, जिसमें सोने और चांदी का प्रयोग किया गया। इसमें सोने की परत चढ़ा एक ग्लोब बना है, जिसे तीन ओर से स्टम्प्स और बेल्स (विकेट और गिल्लियां) ने घेर रखा है... ग्लोब गेंद का परिचायक है और स्टम्प्स और बेल्स क्रिकेट के तीन विभागों - गेंदबाजी, बल्लेबाजी और क्षेत्ररक्षण - के परिचायक हैं...
ट्रॉफी पर पूर्व विजेताओं के नाम उकेरे जाते हैं और सबसे खास बात यह है कि मूल ट्रॉफी संयुक्त अरब अमीरात के शहर दुबई में स्थित आईसीसी के मुख्यालय में रखी रहती है... विश्वकप जीतने वाली टीमों को आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफी की प्रतिकृति दी जाती है...
क्रिकेट के बहुतेरे प्रशंसक भले ही न जानते हों कि विश्वकप जीतने वाली टीमों को मूल ट्रॉफी नहीं, बल्कि प्रतिकृति दी जाती है, लेकिन इसके बावजूद ट्रॉफी को लेकर खिलाड़ियों के रोमांच में किसी प्रकार की कमी नहीं आती... अब सच्चाई यह है कि क्रिकेट विश्वकप का यह महाकुम्भ फीफा फुटबॉल विश्वकप के बाद विश्व में सर्वाधिक देखा जाने वाला खेल आयोजन बना हुआ है और जिस ट्रॉफी के लिए यह महाकुम्भ होता है, उसकी हैसियत किसी सुपरस्टार से कम नहीं...

जय हो ! विजय हो !

17 February, 2011

विश्व कप - 2011

 गुरुवार से शुरू होने जा रहे 'क्रिकेट महाकुम्भ' आईसीसी विश्व कप - 2011 के दौरान क्रिकेट प्रेमियों की नजरें जहां अपने-अपने पसंदीदा स्टार क्रिकेटरों पर रहेगी, वहीं तमाम स्टार जिस ट्रॉफी के लिए आपस में भिड़ेंगे, उसकी हैसियत भी किसी सुपरस्टार से कम नहीं VMW Team का एक विश्लेषण ...

नीरज मिश्रा के अनुसार विश्‍व कप की प्रबल दावेदार मानी जा रही टीम इंडिया के हौसले बुलंद हैं। पिछले दो अभ्‍यास मैचों में मिली जबरदस्‍त जीत, टीम की मजबूती, ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणी और सट्टा बाजार का रुख भी टीम इंडिया के पक्ष में है। इस तरह सारी परिस्थितियां भारतीय टीम के पक्ष में हैं और इस पर यदि टीम मैदान में सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन करती है तो टीम इंडिया को 28 साल बाद एक बार फिर विश्‍व विजयी बनने से कोई नहीं रोक सकता।
रवि गुप्ता कहते है की गुरुवार से शुरू होने जा रहे 'क्रिकेट महाकुम्भ' आईसीसी विश्व कप - 2011 के दौरान क्रिकेट प्रेमियों की नजरें जहां अपने-अपने पसंदीदा स्टार क्रिकेटरों पर रहेगी, वहीं तमाम स्टार जिस ट्रॉफी के लिए आपस में भिड़ेंगे, उसकी हैसियत भी किसी सुपरस्टार से कम नहीं...विश्‍व कप की प्रबल दावेदार मानी जा रही टीम इंडिया के हौसले बुलंद हैं। पिछले दो अभ्‍यास मैचों में मिली जबरदस्‍त जीत, टीम की मजबूती, ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणी और सट्टा बाजार का रुख भी टीम इंडिया के पक्ष में है। इस तरह सारी परिस्थितियां भारतीय टीम के पक्ष में हैं और इस पर यदि टीम मैदान में सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन करती है तो टीम इंडिया को 28 साल बाद एक बार फिर विश्‍व विजयी बनने से कोई नहीं रोक सकता।
टी. के.ओझा "नीशू" कहते है की स्टार बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का मानना है कि कपिल देव की अगुवाई वाली टीम की 1983 की जीत ने भारत में हमेशा के लिए क्रिकेट का स्वरूप बदल दिया और यह देश की क्रिकेट इतिहास में अब तक सबसे बड़ी उपलब्धि है। उस समय महज 10साल के तेंदुलकर ने भारत के विश्व विजेता बनने का जश्न रातभर मनाया था।
प्रशांत यादव कहते है की आज बांग्‍लादेश में क्रिकेट विश्‍व कप का रंगारंग आगाज होने जा रहा है और 19 फरवरी को भारत-बांग्‍लादेश मैच के साथ ही कप के लिए जंग शुरू हो जाएगी। वर्ल्ड कप में इस बार इंडिया पर सबसे बड़ा दांव खेलने की तैयारी की जा रही है। क्रिकेट के इस महाकुंभ में करोड़ों रुपए का सट्टा लगाने की तैयारी है। सट्टा बाजार में इस बार टीम इंडिया पर 3/1 का दांव लगाया है और वह सबसे ऊपर बना हुआ है। इसका मतलब हुआ कि टीम इंडिया पर एक रुपए लगाने पर तीन रुपए मिलेंगे। दूसरे नंबर पर श्रीलंका ( 9/2)और तीसरे पर साऊथ अफ्रीका पर दांव लगा है। सट्टा बाजार ने वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले ही केन्या, कनाडा व नीदरलैंड को मैदान से बाहर मान लिया है, इन तीनों टीमों पर 1000/1 का दांव है। 19 फरवरी को उद्घाटन मैच में भारत व बांग्लादेश में भारत पर 1/10 और बांग्लादेश पर 6/1 का दांव है यानि भारत की जीत सट्टा बाजार में तय मानी जा रही है।
वही रुपेश तिवारी कहते है की विजेता चाहे जो भी रहे, लेकिन अंतिम पलों में फोटोग्राफर सबसे अधिक तस्वीरें इसी ट्रॉफी की लेने वाले हैं... यही नहीं, 2 अप्रैल को देर रात तक और 3 अप्रैल की सुबह देश और दुनिया के तमाम टेलीविजन चैनल, समाचारपत्र और वेब पोर्टलों पर विजेता टीम के साथ-साथ जिस चीज़ का बोलबाला रहेगा, वह यही ट्रॉफी होगी... 11 किलोग्राम वजनी और 60 सेंटीमीटर ऊंची इस ट्रॉफी के लिए गुरुवार से 14 टीमों के बीच 43 दिनों तक अब लगातार जंग चलेगी... इसे हासिल करने वाला अगले चार वर्ष तक विश्व क्रिकेट का बादशाह कहलाएगा और विजेता कप्तान इसे देख-देखकर इतराया करेगा...
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने 19 फरवरी से दो अप्रैल तक भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश में चलने वाले क्रिकेट महाकुंभ के लिए पिछले विश्वकप की तुलना में लगभग दोगुनी पुरस्कार राशि रखी है। इस टूर्नामेंट में चैंपियन बनने वाली टीम को 30 लाख डॉलर (लगभग 18 लाख 74 हजार पौंड या 13 करोड़ 67 लाख रुपए) की इनामी राशि मिलेगी।
आलम यह है कि इस बार पहले दौर में जीत दर्ज करने वाली टीम को भी 60 हजार डॉलर (लगभग 27 लाख रुपए) मिल जाएँगे जो 1987 में पहली बार चैंपियन बनी ऑस्ट्रेलियाई टीम को मिली पुरस्कार राशि से 30 हजार पौंड से अधिक है। इस बार जो भी टीम क्वार्टर फाइनल में पहुँचेगी, उसको तीन लाख 70 हजार डॉलर (लगभग एक करोड़ 68 लाख रुपए) मिलने तय हैं।
इसी तरह से सेमीफाइनल में हारने वाली टीम को 750,000 डॉलर यानी तीन करोड़ 41 लाख रुपए तथा फाइनल में पराजित होने वाली टीम को एक करोड़ 50 हजार डॉलर यानी छह करोड़ 83 लाख रुपए मिलेंगे जो कि पिछले सभी विश्वकप की तुलना में सबसे बड़ी पुरस्कार राशि है।
भारतीय टीम 1983 में जब चैंपियन बनी थी तो क्रिकेट बोर्ड के पास भी खिलाड़ियों को देने के लिए पैसा नहीं था। आखिर में पैसा इकट्ठा करने के लिए लता मंगेशकर का कन्सर्ट करवाया गया था जिससे चैंपियन टीम के प्रत्येक खिलाड़ी को एक-एक लाख रुपए मिले थे। अब यदि धोनी की टीम चैंपियन बनती है तो उसके प्रत्येक सदस्य को करोड़ों रुपए मिलना तय हैं।

जय हो ! विजय हो !
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