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24 December, 2010

इस आरक्षण ने..

 रविन्द्र नाथ यादव 
देश की किसी भी राजनीतक पार्टी के किसी भी नेता को आरक्षण के बारे बोलने पर उसकी जुबान को लकवा मर जाता है  उसे सिर्फ अपने राजनीतक भविष की चिंता है  पर देश की चिता नहीं  इस के लिए इन पर कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए  ६० सालों में देश का सत्य नाश के के रख दिया
है इस आरक्षण ने..

सबसे ज्‍यादा चर्चित एवं विवादास्‍पद विषय आरक्षण पर समग्रता से नजर डालने की जररत हें मेरी नजर में यह ऐसी दवा बन गयी हे जिसकी इजाद इसलिए की गयी थी ताकि समाज में वचितं एवं दलित पिछडो को विकास की मुख्‍य धारा से जोडकर उनकी स्थिति में सुधार लाया जा सके ।इसे आप सामाजिक क्रांत‍ि एंव सामाजिक बदलाव का माध्‍यम कर सकते है। लेकिन इस समय आरक्षण राजनैतिक रेवडी हो गयी है,ज‍िसे हर नेता अपने वोट बैंक के खाते में डालना चाहता है।
स्वतंत्र भारत में आरक्षण की शुरुआत दलित समाज को अन्य समाज के बराबर खडा करने के उद्देश्य से की गई थी। समय गुजरने के साथ-साथ दलित, आरक्षण तथा आरक्षण की आवश्यकताओं आदि की परिभाषा भी बदलती गई। यदि कुछ लोगों ने विशेषकर आरक्षित वर्ग के सम्पन्न लोगों ने इस आरक्षण नीति के लाभ उठाए हैं तो इसी आरक्षण के विद्वेष स्वरूप हमारा यह शांतिप्रिय देश कई बार आग की लपटों में भी घिर चुका है। मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने को लेकर पूरे देश में छात्रों द्वारा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होकर जो आक्रोश व्यक्त किया गया था तथा उस दौरान जिस प्रकार की दर्दनाक घटनाएं सुनने में आई थीं, उन्हें याद कर आज भी दिल दहल जाता है। परन्तु आम जनता सिवाए मूकदर्शक बनी रहने के और कर भी क्या सकती है।
मेरे स्कूल  S.N.Public School, Beharadabar, Bhatani, Doeria के एक बच्चे (बारूद यादव) ने कहा - समाजवाद से जो रह गया, वह रहा सहा बंटाधार आरक्षण पूरा कर देगा.
सेना और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सोच कर ही रूह काँप जाती हैं.
हे भगवान! इस देश ने तुम्हारा क्या बिगाङा हैं, इन नेताओं को अपने पास बुला ले....

प्रिंसिपल आशा ओझा जी ने कहा - भारत में रहना अब और भी चैलेंचिंग होने वाला है ।
सरकार अब शिक्षण संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण करने वाली है । तो अब हमारे बच्चे जो जी तोड मेहनत कर रहे हैं, मूर्ख हैं । क्योंकि कोई उससे कम योग्य होते हुए भी जाति के आधार पर प्रवेश पा लेगा । क्या ये करने से देश व समाज का भला होगा ? या जातिवाद, घूसघोरी को बढावा मिलेगा।
यह कदम सिस्टम को मजबूत करेगा या उसे और कमजोर करेगा ?
मेरा मानना है कि जिनके पास साधन नहीं है पर प्रतिभा है, उन्हें साधन प्रदान किए जाने चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति के हों । पर परीक्षा में चयन सिर्फ योग्यता पर होना चाहिए ।
मतलब सरकार व समाज पढाई के लिए जो हो सकता है करे, ट्यूशन फीस माफ करे, किताबों का इन्तजाम करे, कोचिंग की व्यवस्था करे और एक ऐसा सहयोग दे कि साधनाभाव का एहसास न हो।
        के.के. ओझा जी कहते है की - निजीकरण ने मंडल के प्रभाव को बहुत कम कर दिया है। लेकिन आर्श्‍चय यह है कि इतने बडे एवं प्रभ‍ावित करने वाले विषय से मीडिया, एवं विधायिका ने अपना मुंह मोड लिया। इस पर तार्किकता की कोइ गुजांइस बाकी नहीं छोडी। इसी कारण आरक्षण अब बैमनस्‍य का जहर बन गया है

समाज सेवक श्री जनार्दन जी कहते है की - आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये। चाहे किसी भी जाति का हो परंतु निर्धन को आरक्षण मिलना चाहिये।
पूर्व ग्राम प्रधान श्री नेबुलाल  यादव कहते है की आरक्षण का लाभ अभी तक कुछ जातियों तक ही क्‍यों सीमित है। O.B.C. में यादव,कुर्मी जाट,गुर्जरों ने ही फायदा लिया है। इसी प्रकार S.C.S.T. का फायदा जाटव व मीणाओं को ही ज्‍यादा मिला है। क्‍यों यह सामाजिक बदलाव की हवा अन्‍यों तक नहीं पहुचीं है।
 रविन्द्र नाथ यादव 
वशिष्ट   अध्यापक
S.N.Public School,
Beharadabar, Bhatani


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