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11 November, 2010

Run!!!!!!!!!! by Nilesh Kumar Pandey

08 November, 2010

हाय रे आगनबाड़ी.........

भोजपुरी संगीत के समारोह में देवरिया जिला की नदौली गांव के सोनू शांडिल्य नाम के एगो लइका गवले रहे- “बारह सौ के नौकरी, पहिने पन्द्रह सौ के साड़ी, हाय रे आगनबाड़ी....”। गाने के लाइन व्यग्य भरल रहल। एगो सवाल भी उठावल गइल रहे कि बारह सौ रुपया पगार पाये वाली मेहरारु अगर डेढ़ हजार के साड़ी पहिरी तs घर-परिवार के और खर्चा कइसे चली। कुशीनगर की विशुनपुरा थाना की दुदही ब्लाक में घराइल 128 बोरी पोषाहार येह बात के साबित कs दिहलसि कि आगंनबाड़ी की साड़ी की पीछे इहे राज बा। दरअसल, सरकार गांव-गांव आगंनबाड़ी केन्द्र खोल के नौनिहालन के पोषाहार खियाके पट्ठा बनावला में पावनी अइसन पइसा बहावति बा। लेकिन येह विभाग में भष्टाचार के आलम इ बा कि गरीब लइका-लइकी, आ गर्भवती मेहरारु का हिस्सा वाला पोषाहार खुला बाजार में बेचल जाता। सोमवार य़ानि पहली नवंबर 2010 के एगो पिकप गाड़ी पर लदल 128 बोरा पोषाहार पडरौना- तमकुही मार्ग से बिहार की ओर जात रहे। कुछ जागरुक लोगन के नजर पड़ल। सोचले यूपी की माल से बिहार के लोग मोटाई। अइसन ना होखे दिहल जाई। जागरुक लोगन के पारा गरमाइल, पिकप रोकाइल। विशुनपुरा थाना के सौंप दिहल गईल।
गजब व्यवस्था बा। गांव-गांव आगंनबाड़ी केन्द्र खुलल बा। केन्द्र पर ना लइका लड़केलन ना मेहरारु। लेकिन हर महीना पोषाहार जरुर मिलेला। कागज पर चले वाला अइसन केन्द्र पर लाखौं के न्यारा-बारा होला। लइकन को पुष्ट बनाने वाला पोषाहार 125 से 150 रुपया बोरी बेचि दिहल जाता। एतना सस्ता तs अपने देश में नमक भी ना मिलेला। लइकन-बच्चन-मेहरारु के पोषाहार बाजार में बिकाइला की बाद फिर खगिददारी की माध्यम से गांव में पहुंचेला, जहां जानवार के आहार बनि जाला। भूसी, चोकर, खरी- खुद्दी. दाना-चारा की जगह पर पशुपालक अपनी जानवरन के पोषाहार खियावत। पन्द्रह सौ की साड़ी वाली आगंनबाड़ी की येह कमाई से ब्लाक मुख्यालय से लेके जिला स्तर तक के अधिकारी मलाई काटत हवें। का जरुरत बा? अइसन योजना के। जरुरतमन्दन की अइसन सरकारी योजना के बन्द कs देवे के चाहीं। नाहीं तs गीत के मथेला वाली लाइन गड़बडा के गावल जा- “बेचि के पोषाहार, लिपिस्टिक झारत बाड़ी, हाय रे! आगंनबाड़ी।
                                                                                                    एन .डी. देहाती

07 November, 2010

जयपुर में छठ के धूम

ऐसे त भर दुनिया के हिंदुलो के तरह बिहारो में तमाम तरह के पर्व-त्योहार मनावल जाला बाकि एगो पर्व अइसन बा जेकरा के अगर बिहारी पर्व कहल जाव त गलत न होई... जी हां रउआ ठीक समझनी हम सूर्यषष्ठी यानी कि छठ के ही बात करतानी.
छठ के महातम त सबका खातिर बहुत बा बाकी हमनी जइसन परदेसी लो खातिर एकर महातम तनी ज्यादा ही बा. इहे कारण बा कि हमनी भले गांव घर से दूर बानी स... बाकी छठी मइया अपना अंचरा से कबो हमनी के दूर न कइली.
सन 2000 हजार में हम पहिला साल छठ के मौका पर घर से दूर रही... सच बताई .... भीतर से करेजा रोवत रहे. तब एगो संगी हमरा के गलता किनारे लेकर गइल. जइसे गलता के नजदीक पहुंचे लगनीं... छठ वरतिया और उनकर संगी-साथी लो के भीड़ देखके मन धीरे-धीरे हलुक होखे लागल. गलता बीच पर पहुंच के त एकदम से हम हरान रह गइनी... भीड़ लाखों में. बुझाते न रहे कि हम गावं  से कहीं बाहर बानी. चारों तरफ माहौल एकदम छठमय भइल रहे...
खैर... वोकरा बाद से त जब भी छठ में  जयपुर  में रहेके पड़ेला तब गलता गइला बगैर त कुछ भुलाइल जइसन लागेला.
अबकी छठी मइया के कृपा से छठ में  देवरिया   अपना घरे जाएके मौका मिलतआ... घरे जाएके खुशी त बा... बाकी जयपुर के छठ के भी हम ओतने मिस करतानी...

तअ एक बार जोर से बोलीं छठी मइया की जय!!!


नरियवा जे फरेला घवद से ओ पर सुगा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुगा गिरे मुरझाय
रोवें सुगा के सुगनिया
सुगा काहे मारल जाए
रखियों हम छठ के बरतिया आदित होइहें सहाय
दीनानाथ होइहें सहाय
सूरूज बाबा होइहें सहाय
मधुलेश कुमार पाण्डेय
"निल्को जी"

भ्रष्टाचार-देश की सबसे बड़ी समस्या

आए दिन देश के विभिन्न क्षेत्रों में रिश्वत लेते हुए अधिकारियों के पकड़े जाने की खबरें खूब छपती हैं। सिर्फ नाम, रिश्वत की रकम और जगह का फर्क होता है। जो नहीं पकड़े जाते, उन पर इन खबरों का कोई असर नहीं होता। खबर पढ़ने के बाद वे जायज, नाजायज के चक्रव्यूह में नहीं फंसते। सही-गलत, जायज-नाजायज, आत्मा के उत्थान-पतन, शर्मिंदगी का भाव, इन सबसे वे लोग काफी ऊपर उठ चुके हैं। भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर तक व्याप्त है।
कुछ दिन पहले पंजाब के अठारह आईएएस अधिकारियों की सूची अखबार में छपी, जिनके विरुद्ध गंभीर भ्रष्टाचार के केस चल रहे हैं। देश का प्रशासन चलाने वाले उच्चाधिकारी भी ऐसे गंभीर दोषों के लिए सफाई ढूंढने में प्रयत्नशील हैं। दस आईपीएस अधिकारी, जिनमें तीन पुलिस महानिदेशक हैं, आपराधिक मामलों की पूछताछ को लेकर संशय के घेरे में हैं। आईएएस, आईपीएस अधिकारियों की ऐसी सूची न्यायमूर्ति एचएस भल्ला की अदालत में प्रस्तुत की गई और यह सूची अंतिम नहीं है। 
कार्य और नियमों के सीधे रास्ते के बावजूद पीछे के दरवाजे से कार्य करवाने और करने का एक दलाल साम्राज्य है। लोग भी सोचने लगे हैं कि दप्तर की मेजों के गिर्द चक्कर काटते रहने से यह आसान और सुविधाजनक है, जिसमें आप रोज-रोज की जिल्लत और तनाव से बचे रहते हैं। घर बैठे काम हो जाता है। परंतु यह सुविधा उन तमाम लोगों के रास्ते बंद कर देती है जो ज्यादा धन नहीं खर्च कर सकते। उन पर देश के आम आदमी होने का ठप्पा लगा रहता है जिसके लिए कुछ भी आसान नहीं होता। अब तो पूरे भारत में कहा जाने लगा है कि भ्रष्टाचार इतना ज्यादा बढ़ गया है कि दस प्रतिशत विकास दर को पाना लगभग असंभव हो रहा है। सीएमएस और ट्रंसपेरेंसी इंटरनेशनल के साझे अध्ययन में साल 2005 में ग्यारह विभागों के साथ संबंधों को लेकर लोगों के अनुभव एकत्रित किये गये। बासठ प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें रिश्वत देकर वह खास सर्विस या सुविधा लेनी पड़ी, जिसके वे वैसे भी अधिकारी थे। अध्ययन बताता है कि छोटी-छोटी रकम के तौर पर जो रिश्वत दी जाती है उसकी राशि हर साल 21068 करोड़ हो जाती है। तीन चौथाई लोग महसूस करते हैं कि भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। 
नयी आर्थिक नीति 1992-93 में अपनायी गई थी। 93-94 में बेरोजगारी में 1.85 करोड़ की बढ़ोत्तरी हुई थी। देसी-विदेशी धनाढ्यों की मनमानी लूट और मुनाफाखोरी की वजह से ग्रामीण क्षेत्र के 1990-91 के 35 प्रतिशत गरीब 1993-94 में 42 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 90-91 के तीस प्रतिशत से 93-94 में बढ़ कर 37 प्रतिशत हो गये थे। यहीं से बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को फैलने-बढ़ने के ऐसे अवसर मिले कि आज तक इन पर कहीं कोई लगाम नहीं लगायी जा सकी। 
कभी गांधी जी ने राजनीति को अर्थ देने की कोशिश की थी। उनकी कामना थी कि राजनीति सबसे छोटे और पिछड़े हुए आदमी का हित देखेगी। 
आज राजनीति का चेहरा इतना भयभीत करने वाला है कि संसद और विधानपालिका गुंडों, हत्यारों और भ्रष्ट लोगों की शरणस्थली बनती जा रही है। दप्तरों में बड़े साहब जब आम आदमी की शक्ल देखना पसंद नहीं करते तो भ्रष्टाचार के धन पर एWठते हुए वह एक साधारण व्यक्ति की शिकायत पर ध्यान कैसे दे पायेंगे? जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए उनकी राक्षसी शक्ति न कभी सोचती है न कुछ करने को तैयार है। आत्मान्वेषण से वह कभी गुजरना ही नहीं चाहते। जो काम करवाने के लिए सरकारी भवनों के पिछले दरवाजे से दाखिल नहीं हो सकते उनके लिए आजादी का मतलब क्या है? यह सफर तो इन उम्मीदों और उत्साह से शुरू हुआ था कि अब आम और खास के बीच में कोई फर्क नहीं रहेगा। सभी को बराबर के अधिकार मिलेंगे। परंतु भ्रष्ट तंत्र तो यह सब पूरा करने में असमर्थ है। राजनीतिज्ञों और लालफीताशाही से जुड़े लोगों ने अपने लिए तो आसान और सुविधाजनक रास्ते तलाश कर लिए हैं परंतु साधारण जन के लिए वे रास्ते बंद हैं। गरीब तो गरीब, कई बार बड़े लोगों को भी इन लौह द्वारों से टकरा कर लौट जाना पड़ता है। लक्ष्मी मित्तल ने कहा है कि यदि उन्हें भारत में स्टील प्लांट खरीदना होता तो उनकी आधी जिंदगी नेताओं और बाबुओं के पीछे-पीछे ही गुजर जाती। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि विकास के मार्ग में भ्रष्टाचार कितनी बड़ी रुकावट है। कितने ही लोग व्यवस्था की भ्रष्ट सीढ़ियों से फिसल कर नीचे आ गिरे होंगे, अंदाज लगाना मुश्किल है। 
भ्रष्टाचार के कैंसर ने जीवन का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा है। हाल ही में हॉकी की दिशा बिगाड़ने वाला `आपरेशन' सामने आ चुका है। डॉ. अमित किडनी के कारोबार में करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर चुके हैं। राजनीति की चादर पर कत्ल, अपहरण, सेक्स स्केंडल, नशाखोरी आदि के न जाने कितने धब्बे लग चुके हैं। शिक्षा, व्यापार और न्याय तक का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। एक मान्य न्यायाधीश पहले ही कह चुके हैं कि बीस प्रतिशत न्याय से जुड़े लोग भ्रष्ट हो चुके हैं। यह भी कहा जा रहा है कि न्याय का इतनी देर से मिलना न्याय से इन्कार ही कहा जा सकता है। 
यह जबरदस्त अंधकार की स्थिति है। ऐसी स्थिति में मामूली आदमी का जीना दुश्वार हो जाता है। उपभोक्तावादी बहाव ने व्यक्तिवाद को विकसित किया है, समाज के सांगठनिक चरित्र पर इससे गहरी चोट लगी है। लोग अपनी तकलीफ दूसरों पर ज़ाहिर नहीं करते, सरकारी आतंक से घबरा कर जेब खाली कर घर लौट आते हैं। दूसरी तरफ इसी बहाव में ज़रूरतें दानवीय रूप धारण कर चुकी हैं। बंगला, गाड़ी, वातानुकूलित कमरे, पाँच सितारा होटल संस्कृति, ब्रांडेड कपड़े, जूते, मोटरबाइक और भारीभरकम बैंक बैंलेंस की जरूरतें इन हज़ारों वस्तुगत परिस्थितियों से ध्यान हटा देती हैं। बाज़ार ने मध्य वर्ग की मजबूरी का मज़ाक ही नहीं उड़ाया उसे विवश और पंगु बना दिया है। मूल्यविहीनता इस कदर हावी है कि शादी-विवाह के पहले ही पूछ लिया जाता है कि लड़के की ऊपर की कमाई कितनी है? भ्रष्टाचार के इस कैंसर से लड़ने के लिए समाज को इस वक्त एकजुटता, व्यापकता के नजरिये से सोचना होगा और हके-इंसाफ के लिए लड़ना ही होगा।

  रवि कुमार पाण्डेय

Books

“Come in, Come in!”
Said the library door;
I opened it wide
And saw books galore!

Tall skinny books
Up high on the shelves;
Little fat book
That stood by themselves.

I opened one up
And sat down to look;
The picture told stories!
                  What a wonderful book!               

Abhishek Kumar Tiwari
Mr.Kaku

अभिशाप-----------इन्सेफेलाइटिस

पिछले तीन दशक कई लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए...हर चुनाव में इन्सेफेलाइटिस एक अहम मुद्दा बन के उभरा लेकिन उसके बाद भी इस पर राजनीति का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है...ये अलग बात है कि कोई भी नेता अथवा पार्टी इस अभिशाप को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस पहल कराने में नाकाम रही है...
पूंर्वांचल के हर चुनाव में जाति धर्म प्रमुखता से मुद्दा बन के उभरता है...लेकिन पूर्वांचल के लिए अभिशाप बन चुके इन्सेफेलाइटिस के लिए मिलता है तो बस आश्वासन.....गोरखपुर-बस्ती मण्डल के अस्पतालो में पीड़ा झेल रहे परिवारों को अब तक केवल झुनझुना ही मिला है.....ऐसे हाल में वो अपना दर्द लेके जायें तो जायें कहां.....बस इसको नियति का खेल मानकर अपने कलेजे के टुकड़े को मौत के मुंह में जाते हुए देख, रो गा के सब्र कर लेते हैं....साल १९७८ में भारत में पहली बार इस महामारी ने दस्तक दी थी....पूर्वांचल में भी यह दैत्य इसी साल आया था ....सामाजिक और आर्थिक रुप से पिछड़े इस क्षेत्र में इसे अनूकूल माहौल मिला ...और बाद में सरकारी उदासीनता के चलते यह बढ़ता चला गया....आंकड़ो की बात अगर की जाय तो....१९७८ में जहां इस बीमारी ने कुल २३८६ लोगों को अपना शिकार बनाया था जिसमें कि ७२१ लोगों की मौत हो गयी....बाद में इस बीमारी ने गोरखपुर बस्ती मण्डल को अपना घर बना लिया.....और अभी तक यह राक्षस नौ बार इस इलाके में मौत का भयानक ताण्डव कर चुका है....१९८० में इससे १५१६ लोग पीड़ित हुए थे....जिसमें कि ४९६ लोगों की मौत हो गयी...१९८५ में ११६९ पीड़ितों में ४०४ की मौत हो गयी....१९८८ में ३८९७ पीड़ितों में १२२८ लोगों की मौत हो गयी....१९८९ में १३८३ पीड़ितो में ६५९ लोगों की मौत हो गयी.......नवासी के बाद चौदह साल की चुप्पी और फिर एक बार पलटवार किया साल २००५ में ....जो कि अब तक के इतिहास में सबसे भयानक रहा....और ४७२० पीड़ितो में ११६१ लोग मौत के मुंह में समा गये.....इसके बाद से लगातार इसका कहर जारी है....२००६ में पूर्वांचल के विभिन्न अस्पतालो में २०३० मरीज आये जिसमें ४३५ की मौत हो गयी ....और २००७ में २७९० पीड़ितो में ५४७ की मौत हो गयी.....(आंकड़े उत्तरप्रदेश स्वास्थ्य परिषद के वार्षिक रिपोर्ट से साभार) ...
ये सारे आकंड़े सरकारी हैं.....अगर एनजीओ और अन्य प्राइवेट संगठनों के आकंड़ो को माना जाय तो १९७८ से अब तक पूर्वांचल के पचास हजार से ज्यादे मासूम इन्सेफेलाइटिस के सुरसामुख में समा चुके है.....साथ ही निजी अस्पतालों और घर में दम तोड़ देने वाले बच्चों की संख्या भी इसमें नहीं जोड़ी गयी है.....ऐसे हाल में राजनीतिक का शिकार हो चुकी इस बीमारी के शिकंजे से पूर्वांचल कब तक मुक्त हो पायेगा ...इसका कोई ठिकाना नहीं है.....
यह आईना है स्वाइन फ्लू-और बर्ड फ्लू जैसी आयातित बीमारियों को हौवा बना कर लाखों करोड़ो रुपयों के बजट को डकारने वाली संस्थाओं के लिए.....या फिर सरकारी संस्थानों के लिए.....ठंडे प्रदेश से निकली स्वाइन फ्लू की बीमारी को जिस तरह देश के सभी प्रमुख सम्मानित न्यूज चैनलों और अखबारों ने प्रमुखता से उठाया उससे तो यही लगा कि देश में महामारी आ गयी है....और अब कोई भी नहीं बचने वाला....फटाफट करोड़ो के फंड पास हुए ...दिल्ली के प्रतिष्ठित राममनोहर लोहिया अस्पताल में तो इसके लिए एक विशेष वार्ड तक बना दिया गया....और आपातकालीन चिकित्सा की हर स्तर पर व्यापक व्यवस्था की गयी....लेकिन अफसोस कि तीन दशक से भी ज्यादे समय से अपने लालों को खोने वाले पूर्वांचल के इस दैत्य के सर्वनाश के लिए एक धेला भी नहीं दिया गया.....उलटे २००५ में मेडिकल कौंसिल आफ इण्डिया ने इस इलाके के एकमात्र मेडिकल कालेज की पीजी मान्यता निरस्त करने का सुझाव दिया बजाय इसके कि उसे और भी अधिक अत्याधुनिक बनाया जाय.....सवाल ये नहीं है कि स्वाईन फ्लू का इतना हौव्वा क्यों खड़ा किया गया ...बल्कि सवाल ये हैं कि हजारों मासूम जानों की बलि के बाद भी पूर्वांचल के प्रति सरकार इतनी बेरहम क्यों है.....क्या कांग्रेस क्या भाजपा क्या सपा और अब बसपा....सिवाय आश्वासनों के इस इलाके को कुछ नहीं मिला......देश को चार केन्द्रीय मन्त्री, एकप्रधानमन्त्री, और प्रदेश स्तर पर दर्जनों मन्त्री देने वाले इस इलाके की पीड़ा से अभी भी केन्द्र से लेके राज्य सरकार तक अन्जान है......या फिर यूं कहें कि आँखे मूंद कर उन मांओं की पीड़ा नहीं सुनना चाहती....जिन्होने दिल के टुकड़े की लाश अपने हाथों से ढोयी है.......साथ ही धिक्कार है उन मीडिया वालों पर जो कि दिल्ली या फिर विकसित शहरो या इलाको में होने वाले कुत्ते की मौत पर भी ब्रेकिंग न्यूज चलाते है...मगर रोज-रोज गोरखपुर मेडिकल कालेज के नेहरु अस्पताल से निकलने वालें मासूमों की लाशों के लिए उनके चैनल का स्क्रॉल(टीवी स्क्रीन के नीचे चलने वाली पट्टी)तक नसीब नहीं हुआ........शर्म........शर्म............शर्म...............

डॉ. योगेश पाण्डेय

BSNL Triff Plane by Anuj

 


A.  SHORT MESSAGING SERVICE (SMS)
SlPARTICULARSRate(Rs.)REMARKS
1DOMESTIC SMSAs per tariff card para 7 
  
 
(a) Premium Non-Person to Person SMS    For this SMS based value added service, tariff to is determined by the content providers
  (b) Group messaging Rental 
100/- per month
 
 
SMS charges
as per (a) above
(c) Optionall SMS Package
Plain P2P SMS
Monthly Charges
Rs. 100/-
Rs. 15/- Rs. 20/-Rs. 30/-
Free SMS local (per month)
250 SMS
Nil20002000
Free SMS national (per month)NilNil1000 
Uniform Charge per SMS beyond free SMS
0.40
0.01 APP*APP*
* APP: As per plan.
Service Tax as applicable will be charged extra.
The facility of reduced rate will not be available on five festival occasions “Blackout days” i.e. New Year (31 st Dec & 1 st Jan), Valentine day, Diwali & Christmas Day or as intimated to customers by field units. Normal SMS charges as per plan will be applicable in the above days
 (d) Charges for delivery reports of the SMS (applicable for all above) -  @ Rs.0.10 per SMS
B.  ROAMING (only to STD/ISD subscribers)
SlPARTICULARSRate(Rs.)REMARKS
1
National       
bRental  Nil 
cCall Charges (including Airtime plus IUC)     As per 8(A) of Tariff card

2
International    
 Tariff for post paid customers of BSNL (out-bound roaming):
Fixed Monthly Rental for availing the service
Rs. 99/-
Security DepositSecurity deposit amount will be Rs. 5000, from all post-paid subscribers inclusive of security deposit already made. Where the subscriber has not made any security deposit earlier, full amount of Rs. 5000 is to be received. The Security Deposit may be enhanced based on calling pattern or default in payment, etc as in case of PSTN telephones. (**)
Charges for calls made
Charges for calls made while international roaming will be as levied by the network selected by the BSNL post paid subscriber. BSNL will levy a surcharge of 10% on such amount and bill the customer for the gross amount.
Charges for incoming calls [wef 01.07.2004]
a. In countries where charges are not levied - Rs 40/- per minute plus actual ILD charges applicable in HPLMN
b. In countries where charges are levied - Actual amount charged (including tax) in foreign countries plus 10% thereof plus actual ILD charges applicable in HPLMN.
C. Charges for International SMS (for post paid subscribers)
Outgoing SMS
Rs. 5 per message maximum 160 characters
(w.e.f. 10.08.2004)
Note: Service tax extra for outbound subscribers.
C. GPRS  ( applicable w.e.f. 01.09.2010) GPRS/EDGE Tariff applicable to 2G DataCard & Voice Plan - Click here
 
D. MMS SERVICES   (From Home/visited LSA)
P2P (Calling party or sender to Pay) Local/NationalRs 3 per MMSRs 3 per MMS
M2P (Downloader to Pay)As per rate fixed by content provider
E. MISCELLANEOUS
SlPARTICULARSRate(Rs.)REMARKS
1Voice mail facility  FreeNo upfront charges
  Recording Free 
  Retrieval O/G ChargesAs per plan
2CLIP  Free 
3CLIR  NA 
4Call waiting/call hold  Free 
5Call Forwarding (only within same LSA)  Normal call charges as per planNo fixed charges,
6SIM Replacement Charges  39on each occasion for fault on the part of the subscriber.
7Replacement of defective SIM  nilon BSNL's fault.
1. Mix of subscribers under various plans is allowed for VPN facility. Charges as per respective plans shall be applicable.
2. Subscribers can opt for combined or separate billing.
9Call conference***  Nilper month
10Friend & Family Talk (within LSA)
(Applicable in plan-325 & plan 525 within BSNL LSA only)
 
  Monthly rent per F&F number (in Rs)
Plan 325 -
Rs 49/-
Plan 525 -
Rs 24/-
 
  Call charges from Cell to Cell (in Rs) 50% of the normal call charges in respective plan.[Note: LSA - Licensed Service Area]
  Call Charges from cell to others  (in Rs)
(Others include Fixed, FWT, WLL (LM) services of BSNL with the same LSA)
50% of the normal call charges in respective plan. 
 Pulse rateAs per plan 
        50change of Nos. each occasion.
11Itemized Bill  nilProvided only on request basis
12Detailed Bill  nil 
13Cheque Bounce Charge  100on each occasion
14Number Change  100on each occasion
15Malicious call tracing  NAServices not immediately available
16Safe custody  50Each occasion, plus normal rental/plan
17Reconnection fee  39on each occasion
18Late payment fee  2% per month on overdue amount  subject to minimum Rs.20/-
 
  (*) Reduced rate is not available on these days i.e. New Year (31st Dec & Ist Jan), Valentine day, Diwali, Christmas day
 (**) Security Deposit and Advance Payment for ISD/ International roaming for corporate customers is waivable subject to a minimum of 5 connections are applied and a undertaking/guarantee is supplied by company to pay the dues in case their officers default on visits abroad.
 (***)
1. Normal Call conferencing charges - Normal call rates will be charged.
2. Call conferencing with CUG group - Normal call rates applicable to other than CUG in own network will be charged.
3. Call conferencing under 3G services - Charges same as for 2G services, Video calls during conferencing would be charged as per general video call tariff.
 

 

                                          
    अनुज शुक्ला

छठ पर्व

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय

उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय

उ जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ ना सहाय


रात छठिया मईया गवनै अईली
आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली
बिलम्बली - बिलम्बली कवन राम के अंगना
जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा
उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां
छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।
पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ ( बिहार में इसे खजूर कहते हैं। यह बाजरे के आटे और गुड़ व तिल से बने हुए पुए जैसा होता है), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।
छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।
तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं,  में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल,  पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं
नीशू ओझा
वि एम् डब्लू टीम

05 November, 2010

कंप्यूटर

संगणक के चार भाग
 
एक संगणक (कंप्यूटर) निम्नलिखित चार भागों से मिलकर बनता है :-
  • इन्पुट (निवेश) उपकरण उन उपकरणों को कहते हैं जिसके द्वारा निर्देशो और आंकडों को कंप्यूटर मे भेजा जाता है। जैसे- कुन्जी पटल (की-बोर्ड)
  • केन्द्रीय प्रोसेसिंग (प्रक्रमण) इकाई (नियन्त्रण इकाई + अंकगणित एवं तर्क इकाई)
  • भण्डारण इकाई या संचय इकाई
  • आउटपुट (निर्गत) उपकरण

 कंप्यूटर के प्रकार

कम्प्यूटर का मुख्य कार्य हमारे द्वारा दिये गये डाटा को स्टोर (STORE) कर उसपर कार्य कर के हमें परिणाम देना है। इसी आधार पर उन्हें कार्य क्षमता के आधार पर कुछ श्रेणियों मे बाँटा गया है। वह हैं – सुपर कंप्यूटर, मेनफ्रेम कंप्यूटर, मिनी कंप्यूटर, एव माइक्रो कंप्यूटर आदि। सुपर कंप्यूटर इनमें सबसे बडी श्रेणी होती है, तथा माइक्रो कंप्यूटर सबसे छोटी।
सुपर कंप्यूटर सबसे तेज गति से कार्य करने वाले कंप्यूटर होते हैं। वह बहुत अधिक डाटा को काफी कम समय में इंफार्मेशन में बदलने में सक्षम होते हैं। इनका प्रयोग बडे-2 कार्य करने में होता है, जैसे मौसम की भविष्यवाणी, डाटा माइनिंग, जटिल सिमुलेशन, मिसाइलों के डिजाइन आदि। इनमें अनेक माइक्रोप्रोसेसर (MICROPROCESSOR) [एक विशेष छोटी मशीन जो कम्प्यूटिंग के कार्य को काफी आसानी से तथा बहुत ही कम समय में कर सकने में सक्षम होती है।] लगे होते हैं। किसी जटिल गणना को कम समय में पूरा करने के लिये बहुत से प्रोसेसर एकसाथ (पैरेलेल) काम कराने पडते हैं। इसे पैरेलेल प्रोसेसिंग कहा जाता है। इसके अन्तर्गत जटिल काम को छोटे-छोटे टुकडों में इस प्रकार बाँटा जाता है कि ये छोटे-छोटे कार्य एक साथ अलग-अलग प्रोसेसरों द्वारा स्वतन्त्र रूप से किये जा सकें।
मेनफ्रेम कम्प्यूटर, सुपर कंप्यूटर से कार्यक्षमता में छोटे परंतु फिर भी बहुत शक्तिशाली होते हैं। इन कम्प्यूटरों पर एक समय में 256 से अधिक व्यक्ति एक साथ काम कर सकते हैं। अमरीका की I.B.M. कंपनी (INTERNATIONAL BUSINESS MACHINE CORPORATION ) मेनफ्रेम कंप्युटरों को बनाने वाली सबसे बडी कंपनी है।
मिनी कम्प्यूटर मेनप्रेम कंप्यूटरों से छोटे परंतु माइक्रो कम्प्यूटरों से बडे होते हैं।

 कम्प्यूटर के गुण

कंप्यूटर हमारे द्वारा दिये जाने वाले हर कार्य को बखूबी करने में सक्षम होते हैं। इनके कुछ गुण इस प्रकार हैं :
गति
कम्प्यूटर काफी तेज गति से कार्य करते हैं, जब हम कम्प्यूटर के बारे में बात करते हैं, तो हम मिनी सेकेन्ड, माइक्रो सेकेन्ड में बात नही करते, बल्कि हम 10-12 सेकेन्ड में एक कम्पयूटर कितना कार्य कर लेता है, इस रूप में उसकी गति को आँकते हैं।
न उबना
कंप्यूटर कभी भी उबते (बोर) नहीं हैं, और यही इनका सबसे अच्छा गुण है, क्योंकि यह एक यंत्र हैं, इसलिये ये काफी दिनों तक बिना किसी शिकायत के कार्य करने में सक्षम होते हैं।
स्मरण करने या संग्रह की क्षमता
एक सामान्य कम्प्यूटर भी एक बार दिये गये निर्देश को काफी समय तक स्मरण रखने मे सक्षम होता है, तथा जब भी आवश्यकता पडे़, उसे फिर से लिखा और भरा जा सकता है।

04 November, 2010

सरग में रोवत होइहन मालवीय बाबा


 

 

दोहाई बाबा गोरखनाथ के! आंख खोलीं...

         मालवीय बाबा कहिन तो पंडित मदन मोहन मालवीय। मालवीय बाबा सरग में रोवत होइहन। शेवला के कारण अभाव, महंगाई गिरत कानून व्यवस्था ना, उनकी नाम पर बनल गोरखपुर की इंजीनियरिंग कालेज में 31 अक्टूबर 2010 के भइल एगो प्रतियोगिता। प्रतियोगिता के नाम रहल- ‘लव लीप लिपिस्टिक प्रतियोगिता’। कालेज के वार्षिक समारोह टेक सृजन 2010 में जवन कुल भईल, येह षिक्षा मंदिर के शर्मसार करे खातिर भईल। घरघूमन लाल घर से घूमत निकरलें त मालवीय बाबा की येह षिक्षा मंदिर के येह शिक्षा मंदिर में घुस गइले। लइका-लइकी (जवन इन्जीनियर बनि के आज बाहर निकलिहन) कवन लीला करत रहलें इ देखी के दीमाग चक्करघिन्नी नाचि गइल। जब शिक्षामंदिर के इ हाल बा त अवर जगह का होत होई। आईं, कुछ दृश्य बतावत हई जवन जेहन में अबो हथौड़ा अइसन बजत बा। एगो लइका (भावी इंजीनियर) अपनी दांत में लिपिस्टिक दबा के सामनेवाली लइकी (भावी इंजीनियर) के होंठ रंगत रहे। अइसन सीन खुल्लम खुल्ला, सबकी नजर के सामने, एगो समारोह में। एगो लइकी हाथ में बिन्दी लेके आंख बन्द क सामनेवाला लइका की लीलार पर सटला के प्रयास करत रहे। एगो दूसर लइकी आंख पर पट्टी बन्हले सामने वाला लइका की कपार पर रखल घड़ा में पानी डलला के प्रयास करत रहे। अइसन-अइसन प्रतियोगिता देखि के सोचली मालवीय बाबा जरूर सरग में रोवत होइहन। भारतीय समाज से संस्कार आ संस्कृति के जनाजा उठत जाता। बेशर्मी भरल अइसन प्रतियोगिता में हिस्सा लेबे वाला लइका-लइकी से इ समाज का पाई।
जे कालेज के जिम्मेदार लोग रहे, उ इ प्रतियोगिता रोकला की जगह बइठ के लुफ्त उठावत रहे जइसे कवनो सिनेमाहाल में ‘ए’ टाइप के पिक्चर देखत होंखे। दोहाई बाबा गोरखनाथ के। नाथ संप्रदाय के देवता! रउरी धरती पर इ सब का होता? अइसन पढ़ाई कब तक चलीं जवना में लव, लीप आ लिपिस्टिक के बोलबाला रही। बाबा! तकनीक की शिक्षा मंदिर में सृजनात्मक क्षमता के प्रदर्शन होखल चाहत रहे, लेकिन एइजा त ‘भडु़अई’ होता। आंख खोलीं आ अपनी मूल सूत्र ‘जाग मच्छन्दर गोरख आया’ में तनि सा परिवर्तन क के एक बेर उद्घोश करी- ‘भाग रे भड़ुए! गोरख आया’। रउरी येह उद्घोश से सरग में रोवत मालवीय बाबा के आंसू रुक सकेला। गोरखपुर की संस्कृति आ समाज के बचा लीं बाबा गोरखनाथ।

पइसा मिले त कंडक्टर गोला-बारूद पहुंचा दीहें...

                               सत्ताइस अक्टूबर 2010 क दिन रहल। गोरखपुर बस स्टैंड, देवरिया बस स्टैंड पर कुछ माल उतरल। माल मतलब मिलावट क सामान। माल के मालिक केहु ना। माल कानपुर से गोरखपुर आ देवरिया वइसे ही पहुंचल। रोडवेज की कन्डक्टरन के महिमा अपार ह। पइसा पा जायं त गोला-बारूद पहुंचवा दें। तमकुही राज से दिल्ली तक गांजा पहुंचवला के बाति सुनले रहलीं। कंडक्टर नाम के जीव बहुत रिस्क लेलन। बिना टिकट के यात्रा करावल, यात्री के किराया अपनी जेब में घुसावल बहुत सुनले रहलीं। लेकिन सत्ताइस अक्टूबर के गोरखपुर की बस स्टैंड पर जवन नजारा लउकल उ कबो ना भुलाई। फूड इंसपेक्टरन के टीम बस स्टैंड पर छापा मरलसि। कानपुर से आइल चार बस की तलाशी में 20 कुंतल नकली खोवा, 15 कुंतल नकली बुनिया आ आठ कुंतल फफूंदी लागल मशरूम मिलल। एतना सामान मिलल लेकिन सामान के मालिक नदारद रहलन। खाद्य विभाग के लोग सामान नष्ट करा दिहलन। उ लोग अपनी कर्त्तव्य के इतिश्री क दीहलन। देवरिया बस स्टैंड पर भी कानपुर से आइल नकली खोवा आ हलुआ धराइल। माल धरात बा। माल मंगावेवाला मिलावटखोर ना धरात हवें। दरअसल येह तस्करी के पीछे रोडवेज के ड्राइवर आ कंडक्टर के हाथ बा। जब कानपुर से माल लोड होला त गत्ता (बंडल) के हिसाब से कंडक्टर के पइसा पहिलही पेमेंट हो जाला। बड़का मिलावटखोर मोबाइल से बस नंबर आ कंडक्टर के नाम छोटका मिलावटखोरन के बता दे लें। माल के उतारी एकरा खातिर बहुत साधारण तकनीक अपनावल जा ला। कंडक्टर के पहिले ही माल की मालिक के मोबाइल नंबर बतावल जा ला। जब कानपुर से बस गोरखपुर-देवरिया पहुंचेला त छोटका तस्कर बस के इर्द-गिर्द मेरड़ाए लागेलन। दहिने बायें-झांक-ताक के कन्डक्टर के मोबाइल पर घंटी मारेलन। कंडक्टर नंबर के मिलान क के माल सुपुर्द क देलें। येह पूरा खेल में तस्करी के काम कंडक्टर ही करेलन। प्रति खेप पांच सौ रुपया उपरवार कमाई की फेर में अइसन कंडक्टर मीठा जहर ही ना गोला-बारूद, गांजा-भांग भी पहुंचा दीहें। सवाल इ बा कि जब माल धराइल आ माल के मालिक ना मिलल त ड्राइवर-कंडक्टर पर मुकदमा काहें ना लिखाइल... सबका पीछे पइसा बा। इ पइसा ह। परिवहन विभाग का भी मीठ लागेला आ खाद्य विभाग त इही खातिर बनले बा।

एन डी देहाती

शर्महीन शहर क संवेदनहीन घटना

             शर्महीन शहर येह मामला में कि सड़क पर झपट्टा मारन के संख्या बढ़ गइल बा। कानून के ठेंगा देखावत झपट्टामार माई-बहिन की गले से चेन, मंगलसूत्र कान के बाली, झाला, झुमका आये दिन नोचत हवें। सड़क से गुजरत दूसर राहगीर घटना देखत , लेकिन लफड़ा में नइखे पड़त। उचक्का लूट के आराम से चलि जात हवें।संवेदनहीनघटना! येह मामला में कि आज कवनोप्रिंसबोरवेल में गिरल रहित पूरा देश के संवेदना जागि गइल रहत। लेकिन येह छीनाझपटी में एगो गरीब महतारी के कोख उजड़ गइल। उचक्का की धक्का से गोद की बच्ची नाला में बहि गइल। लेकिन मामूली तलाशी की बाद प्रशासन हाथ खड़ा दिहलसि, उजड़ल कोखवाली एगो महतारी के दिलासा देके अपनी कर्तव्य के इतिश्री दिहलसि। लूट के येह घटना में एगो बच्ची के जान चलि गइल। लेकिन वाह रे वर्दी! हमदर्दी में खाली लूट के घटना दर्ज भइल। बच्ची के मौत हजम।
पूरा वाकया सुनीं देवरिया जिला की तरकुलवा के संतोष अपनी परिवार के साथ गोरखपुर के तिवारीपुर थाना क्षेत्र के अधियारी बाग में रहेलन। संतोष गाड़ी चलावेलन। ओनकर मेहरारू सरोज अपने नौ महीना के लइकी पलक के गोद में ले के पीसीओ से फोन जात रहलीं। पति कहां हवें, कब अइहें? अइसन चिंता मेहरारुन के फर्ज ही ह। रेलवे लाइन के लगेवाला नाला की बगल में एगो बदमाशबाइकवाला नासाइकिल से जात रहे। सरोज की कान के बाली नोचे लागल। येह छीना झपटी में गोद में नौ माह के बच्ची पलक, पलक झपकते नाला में गिर गइल बह गइल। मामला पुलिस तक पहुंचल, कोरम पूरा कइल गइल, नाला छानल गइल लेकिन पलक के जिंदा चाहे मुर्दा ना पावल गइल। सरोज अइसन अभागी महतारी हो गइली। जवन जनम देहनी, जीवन देहनी, ममताभरल दुलार देहली लेकिन अपना पलक के ना बचा पवलीं। पलक प्रिंस के यथार्थ आंखी के सामने नाचै लागल। प्रिंस के खातिर पूरा देश के संवेदना जागि गइल रहे। सेना, अफसर, मीडिया सब जागल रहे। पल-पल जानकारी मिलत रहे, लोग आंख फाड़ के देखत रहे, लेकिन पलक के कहानी पलक झपकते समाप्त हो गइल। गरीब के बेटी रहल, नाला में बहि गइल। सरोज नाम की बदनसीब महतारी का अपनी मरल बेटी के लाश भी नसीब ना भइल।सबकी संतति प्यारी होती, सबकी उतनी ही धड़कन। आंसू का मोल बराबर है, धनवान हो चाहे निर्धन।
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