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31 October, 2010

भोजपुरी गजल

गजल


आज दीपावली ह. चारू ओर मेला के धूम-धाम के बीच मां  के होड बचपन में बहुत रहे .लेकिन आज गोरखपुर में रहला के बावजूद हम इ आनंद से अछूत बानी काहे कि इहां दीपावली के नाम पर राम लीला तक ही लोग अपने के सीमित राखे ला.मकान के सारा लोग ए गहमागहमी के हिस्सा बने चल गईल बा .हम घर में बैठ के ब्लॉग लिखतानी. हमर रूचि भीड-भाड वाला जगह पर जाए से बचे में ही ज्यादा ह .
 
अभी तक ब्लॉग पर बहुत कुछ लिखल गईल लेकिन हम अबकी दाव भोजपुरी के एगो काफ़ी समर्थ गीतकार, कवि, गजललेखक, साहित्य के सब विधा पर समान रूप से लेखनी चलावेवाला श्री दिनेश भ्रमर के कुछ भोजपुरी रचना दे तानी.भोजपुरी आ हिन्दी साहित्य पर बराबर अधिकार रखे वाला श्री दिनेश जी के कई गो रचना देश के विश्वविधालय के पाठ्यक्रम में भी लागल बा आउर बहुत किताब भी इहां के लिखले बानी.ज्योतिष पर भी इनकर काफ़ी अच्छा पकड बा. महाविधालय में कुछ दिन व्याख्याता पद पर काम कइला के बाद उहां के वर्तमान में खेती-बाडी के काम अपन आवास स्थान बगहा में रह के  देखतानी.
  भोजपुरी साहित्य में गजल आउर रूबाई के जगह दिवावे में इनकर महत्वपूर्ण नाम लेवल जाला. इनकर रचित कुछ निमन-निमन रचना अपना हिसाब से दे तानी अपनहूं लोगन के ई स्वच्छ-सुंदर आ शिष्ट रचना जरूर पसंद आई.

      गजल
आंख में आके बस गइल केहू,
प्रान हमरो परस गइल केहू.
हमरे लीपल पोतल अंगनवां में,
बन के बदरा बरस गइल केहू.
गोर चनवा पै सांवर अंधेरा,
देखि के बा तरस गइल केहू.
फूल त कांट से ना कहलस कुछु,
झूठे ओकरा पे हंस गइल केहू.
कठ के जब बजल पिपिहरी तब,
बीन के तार कस गइल केहू.


       रूबाई
मन के बछरू छ्टक गइल कइसे,
नयन गगरी ढरक गइल कइसे.
हम ना कहनी कुछु बयरिया से,
उनके अंचरा सरक गइल कइसे.

           गजल
नजरिया के बतिया नजरिया से कहि द,
ना चमके सोनहुला किरनिया से कहि द.
          नयन में सपनवां बनल बाटे पाहुन,
          सनेसवा जमुनियां बदरिया से कहि द.
लिलारे चनरमा के टिकुली बा टहटह,
लुका जाय कतहूं अन्हरिया से कहि द.
          न आवेले सब दिन सुहागिन ई रतिया,
          तनी कोहनाइल उमिरिया से कहि द.
नयन के पोखरिया भइल बाटे लबलब,
ना झलके भरलकी गगरिया से कहि द.

       दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

नर्वदेश्वर पाण्डेय  देहाती 

30 October, 2010

छठ

सूर्य आराधना का पर्व छठ..........!!!!!!!!!!!!!!
ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इस कारण हिन्दू शास्त्रों में सूर्य को भगवान मानते हैं। सूर्य के बिना कुछ दिन रहने की जरा कल्पना कीजिए। संभव है क्या...? जीवन के लिए इनका रोज उदित होना जरूरी है। कुछ इसी तरह की परिकल्पना के साथ पूर्वोत्तर भारत के लोग छठ महोत्सव के रूप में इनकी आराधना करते हैं।

माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती रही है। छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। महाभारत में सूर्य पूजा का एक और वर्णन मिलता है।

यह भी कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। इसका सबसे प्रमुख गीत
'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मे़ड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए' है।
दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है। इन चारों दिन श्रद्धालु भगवान सूर्य की आराधना करके वर्षभर सुखी, स्वस्थ और निरोगी होने की कामना करते हैं। चार दिनों के इस पर्व के पहले दिन घर की साफ-सफाई की जाती है।

वैसे तो छठ महोत्सव को लेकर तरह-तरह की मान्यताएँ प्रचलित हैं, लेकिन इन सबमें प्रमुख है साक्षात भगवान का स्वरूप। सूर्य से आँखें मिलाने की कोशिश भी कोई नहीं कर सकता। ऐसे में इनके कोप से बचने के लिए छठ के दौरान काफी सावधानी बरती जाती है। इस त्योहार में पवित्रता का सर्वाधिक ध्यान रखा जाता है।
इस अवसर पर छठी माता का पूजन होता है। मान्यता है कि पूजा के दौरान कोई भी मन्नत माँगी जाए, पूरी होती। जिनकी मन्नत पूरी होती है, वे अपने वादे अनुसार पूजा करते हैं। पूजा स्थलों पर लोट लगाकर आते लोगों को देखा जा सकता है। 

28 October, 2010

खूब काटती चांदी यह तो हाथीवाली रानी है..........

खूब काटती चांदी यह तो हाथीवाली   रानी है..........


मोटी चमड़ी , मोटी दमड़ी मोट नोट के माला !
उनकर  लोगवा  उन्हें पेन्हावल , दूसरा के काहे दुखला !!
नोट पर टिकेट , नोट पर सत्ता ! नोट नहीं कट जाई पत्ता !!
नोट पर कुर्सी नोट पर बत्ती ! नोट नहीं त लत्ता-मुक्की !!
नोट के खोट न समझ बाबु ! नोट खातिर जन मराला !!
उनकर  लोगवा  उन्हें पेन्हावल , दूसरा के काहे दुखला !!
नोट के चंदा, नोट के धंधा ! नोट करावे कम भी गन्दा !!
नोट पर साधू, नोट पर संत ! नोट पर चोर-उचक्का लंठ !!
नोट  लक्ष्मी  के स्वरूप ह ! नोट के चहुओर  बा बोलबाला !! 
उनकर  लोगवा  उन्हें पेन्हावल , दूसरा के काहे दुखला !!

नर्वदेश्वर पाण्डेय 'देहाती'

एक दिन कS चांद

एक दिन कS चांद.............
बतकही। सत्ताइस अक्टूबर दो हजार दस की रात के बात। इन्टरनेट  पर खबरन से खेलत माउस पर हाथ। तबले बजल मोबाइल के घंटी। अरे, इ का? अबहीन त S आठ बजत बा। घर से फोन काहें आ गइल। मानसिक रूप से तैयार होत रहलीं कि डांट-फटकार सुने के परी। लगता बा फिर हमसे गलती भइल बा। किचेन के बर्तन ना धोके अइलीं का? लेकिन सर्वदा कर्कश गर्जना की जगह सुनाइल मिसिरी घोरल आवाज। ए जी! सुनत हईं? राउर आरती उतारे के बा। हमरा व्रत तोड़े के बा। दिनभर निर्जल व्रत रहलीं ह। हम लगलीं सोचे- मैडम कहिया से एकादशी भुखे लगली। माई-दादी-दादा त भुखेंले। उहो एकादशी में हमार आरती काहें उतरी।
भगवान की तरफ से भाग्य बना के आइल बानीं। घर के मलिकई कपार पर बा, त मार-मुकदमा, फौजदारी घटल-बढ़ल, हीन-नात, नेवता-हंकारी पर-पट्टीदारी, खेती-बारी, खाद-बीया, कटिया-पिटिया सब निभावे के बा। कवनो चीज में कमी भइल त हमरे कपार नोंचाई। इ आज आरती कवना बात के? बड़ा हिम्मत क के पूछि बइठलीं- श्रीमती जी! आज कवन व्रत ह, काहें हमार आरती उतारब? उ बतवलीं- करवा चौथ। हमरा मुंह से हंसी निकर गइल। उ कहली-हंसी जनि जल्दी आईं। चांद उगेवाला हवें। उनके चलनी से निहारे के बा, आ रउरा के भर नजर देखे के बा। रउरे हमार चांद हईं। हमरा फिर हंसी छूटि गइल। हमेशा हमार नामकरण गोबरगनेश, घोंचू, बकलोल, करिझींग्गन, बतबहक, घरघूमन, चौपट, अड़भंगी, कंजूस अइसन शब्दन से होत रहे। आज जमाना पलट गइल। हम चांद हो गइलिन। एक दिन क चांद।
धन्य हो करवा चौथ। ना कवनों पुराण में येकर व्याख्या बा ना कवनो धर्मशास्त्र में। फिल्मी दुनिया वाला अस देखवले कि घर-घर में छा गइल करवा चौथ। खैर, मैडम चलनी से चांद निहरली, हमके चांद बनवलीं, हमहूं उनकर चेहरा निहरलीं, त आज सुरसा, ताड़का, त्रिजटा, सूर्पणखा, चुड़ैल सा दिखे वाली छाया समाप्त हो गइल रहे। उ सावित्री अइसन सुघ्घर, सुकांत, सती, सौंदर्य के मूरति बनि गइल रहली
। 

थाली सजा के हमार आरती उतारत रहली, आ हम गुनगुनाये लगलीं- जनम-जनम का साथ है हमारा तुम्हारा...।
                              एन. डी. देहाती  

25 October, 2010

Madhulesh's !mage.......................










24 October, 2010

रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी................

तोहरा येह सिद्धान्त पर, हमरो आवे हसीं

रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी...

रउरी सिद्धान्त पर हमरा हसी आवत बा । रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी हईं (पता ना मनई से प्रेम ह.. कि ना) रउआ हाईकोर्ट से मुकदमा दर्ज करावत हई । नगर निगम के महापौर अन्जु चौधरी, नगर आयुक्त राजमंगल, पूर्वनगर आयुक्त वीके दुबे सहित तीस लोग पर मुकदमा दर्ज करे के आदेस दिहलसि। आरोप बा कि 2007 की पहिले से लेके अबतक दस हजार गोवंशीय पशुधन के क्रुरता पूर्वक पकड़ के काजी हाऊस में बन्द क... दीहल बा। रउरी पशु प्रेम के बंदगी बा। हकीकत ई बा कि महानगर के सड़कन पर अबहीनों दस हजार से ऊपर की संख्या में छुट्टा जानवर घुमत हवें। हार्न के पों पों बाजत रहे, लेकीन ऊ नन्दी महाराज लोग पगुरी कइला में लागल रहेला। जाम के झाम में भी येह लोग के बहुत योगदान बा। सड़क पर जगह-जगह मुफ्त में कइल गोबर पर जब कौनो चरपहिया के चक्का चढ़े ला त बगल से गुजरत बाइक सवार चाहे पैदलिहा मनई के कपड़ा पोतनहर अइसन हो जाला। सब्जी मार्केटन से आसमान की भाव चढ़ल तरकारी खरीद के बहरियात कवनो माई-बहिन पर के झपट्टा मार के चौपाया गुण्डा चबा जालन त ओह घर में 'रोटी प्याज' के ही आसरा रहि जा ला। शहर के पॉस इलाका में घूमत टहलत कउनो बड़मनई के पिछवाड़ा में सींग लगा के उलाटत शायद रउरा ना देखले हईं। यूनिवर्सिटी परिसर में बिगड़ैल सांड़ जब कउनो छात्रा के चहेंट ले ला अ बेचारी के हाथ से कापी किताब छितरा जा ला। जान बचावल मुश्किल हो जाला ओह दृश्य के रउरा ना देखले होखब। कबो कबो सड़क पर सांड़न के जंग अ खुरचारी दौड़ में राहगीर भी गंतव्य तक ना पहुंच के अस्पताल पहुंच जा ला। अइसन बहुत उदाहरण बा जवना से पशु के प्रति प्रेम ना जागि सकेला। शहर के चर्चित चितकबरा, कनटूटा, लंगड़ा, भुंवरा, काना, कैरा, गोला, घवरा में कवनो से रउरा प्रेम ना देख सकेलिन। इ कवनो आतंकवादिन से कम ना हवें। रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी होइब, हम ना जानत हईं। लेकिन अपना आहाता में केतना बीमार, अचलस्त गोवंशी के दवा-दारू, खरी भूंसा के इंतजाम कइले हईं एहुके खुलासा क के समाज के सामने रख दीं। पशु, पशु होलें। मनई के प्रति प्रेम भाव देखाईं। जवन पशु खूंटा से बन्हि के ना रहेलन उ अवारा कहल जालन। उनकर असली जगह जंगल ह। जहां जंगलराज चलेला। गोरखपुर शहर ह, महानगर ह। एइजा नगर निगम के भी कुछ नियम बा। नागरिकन की सुरक्षा खातिर यदि अवारा पशुन पर डंडा चलता त कवनो बाउर नेइखे होत। अबे बहुत ढीलाई बा। अगर सही में अवारा पशु काजी हाउस में बंद रहितन त सड़क पर ना दिखतन। आंख खोलीं, सड़क पर जानवरन के 'डाराज' देखीं, ओकरा बाद कवनो मनई पर मुकदमा ठोंकीं। हमरा त रउरी येह सिद्धांत पर आवता हंसी, रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी।।  
एन. डी. देहाती 

‘अलादीन’ के ‘जिन्न’ तूं जिअS सौ साल...............





‘अलादीन’ के ‘जिन्न’ तूं जिअS सौ साल...............
युग-युग जीअS। आगे इ ना कहि सकेलिन ‘बेटा-पतोहु के लुगरी सीअS’। ‘अलादीन’ के ‘जिन्न’ तूं जिअS सौ साल। हर साल करS एगो नया कमाल, नया धमाल। फिल्मी बोतल से निकाल के जिन्न। नया इतिहास रच दS फिन। हमरी पूर्वांचल में कहल जाला- ‘साठा त पाठा’। तूं आठ साल और खींच के जवान लागेलS। तोहरी अड़सठवां जन्म दिन पर हजारन, लाखन, करोड़न बधाई। बड़ा लोग के करोड़पति बनवलS, तनीं हमरो ओर ध्यान दीतS। तूं वाकई में बालीवुड के ‘शाहंशाह’ हवS। हम तोहरी स्टाइल के फैन लरिकइएं से हईं। जब-तब कवनो सिनेमाहाल में तोहार फिल्म लगेला हमके कवनो ‘दीवार’ चाहे ‘जंजीर’ ना रोंक पावल। ‘आंखे’ त फाड़-फाड़ तोहार फिल्म देखलीं। ए छोरा गंगा किनारे वाला तू अड़सठ में भी छोरा बनल रहS। छरकत रहS। हमार बात मानS। हम्मन के ‘कभी अलविदा ना कहना’। ए ‘डॉन’! जब तूं ‘खई के पान बनारस वाला’ हमरी बन्द बुद्धि के बक्शा खोलवा दिहलS हमहूं बहुत दिन ले दोहरवली तोहार उ लाइन- ‘मेरे अंगने में तुम्हार क्या काम है।‘ ‘चीनी कम’ में बड़ा लोग चासनी चाटल। जीभ अब्बो चटर-पटर करत बा। ‘बागवान’ में तS घर-घर के पुरनिया माई-बाप लोग के आंख खुल गइल। का जमाना आ गइल। बाग के मालिक जवन सींचलस, सोहलस, पललस तवने अपनी फूलन के सुगंध से वंचित हो गइलन। ‘पा’ के आरो तोहके का कहीं? अपना बेटा कS बेटा बनि के फिल्म जगत में एगो नया मानदंड स्थापित कS दीहलS। जीवन में बहुत कुछ मिलल। ‘कभी खुशी कभी गम’ मिलल लेकिन निगम होके ईश्वर से तोहरी लंबी उम्र के प्रार्थना करत हईं। जब ‘कुली’ का चोट लगल रहे तब भी हजार हाथ दुआ खातिर उठल रहे। दूनिया में नायक-खलनायक के अभाव ना बा। अभाव बा तS नेक दिल इन्सान के। अइसने अभाव में तू अलादीन के जिन्न अइसन सबकी कामे आवेलS। तोहरी लंबी आयु, सुघ्घर स्वास्थ्य खातिर ईश्वर से प्रार्थना बा।
एन. डी  देहाती 


















23 October, 2010

तोहरा येह सिद्धान्त पर, हमरो आवे हसीं



तोहरा येह सिद्धान्त पर, हमरो आवे हसीं

रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी...

रउरी सिद्धान्त पर हमरा हसी आवत बा । रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी हईं (पता ना मनई से प्रेम ह.. कि ना) रउआ हाईकोर्ट से मुकदमा दर्ज करावत हई । नगर निगम के महापौर अन्जु चौधरी, नगर आयुक्त राजमंगल, पूर्वनगर आयुक्त वीके दुबे सहित तीस लोग पर मुकदमा दर्ज करे के आदेस दिहलसि। आरोप बा कि 2007 की पहिले से लेके अबतक दस हजार गोवंशीय पशुधन के क्रुरता पूर्वक पकड़ के काजी हाऊस में बन्द क... दीहल बा। रउरी पशु प्रेम के बंदगी बा। हकीकत ई बा कि महानगर के सड़कन पर अबहीनों दस हजार से ऊपर की संख्या में छुट्टा जानवर घुमत हवें। हार्न के पों पों बाजत रहे, लेकीन ऊ नन्दी महाराज लोग पगुरी कइला में लागल रहेला। जाम के झाम में भी येह लोग के बहुत योगदान बा। सड़क पर जगह-जगह मुफ्त में कइल गोबर पर जब कौनो चरपहिया के चक्का चढ़े ला त बगल से गुजरत बाइक सवार चाहे पैदलिहा मनई के कपड़ा पोतनहर अइसन हो जाला। सब्जी मार्केटन से आसमान की भाव चढ़ल तरकारी खरीद के बहरियात कवनो माई-बहिन पर के झपट्टा मार के चौपाया गुण्डा चबा जालन त ओह घर में 'रोटी प्याज' के ही आसरा रहि जा ला। शहर के पॉस इलाका में घूमत टहलत कउनो बड़मनई के पिछवाड़ा में सींग लगा के उलाटत शायद रउरा ना देखले हईं। यूनिवर्सिटी परिसर में बिगड़ैल सांड़ जब कउनो छात्रा के चहेंट ले ला अ बेचारी के हाथ से कापी किताब छितरा जा ला। जान बचावल मुश्किल हो जाला ओह दृश्य के रउरा ना देखले होखब। कबो कबो सड़क पर सांड़न के जंग अ खुरचारी दौड़ में राहगीर भी गंतव्य तक ना पहुंच के अस्पताल पहुंच जा ला। अइसन बहुत उदाहरण बा जवना से पशु के प्रति प्रेम ना जागि सकेला। शहर के चर्चित चितकबरा, कनटूटा, लंगड़ा, भुंवरा, काना, कैरा, गोला, घवरा में कवनो से रउरा प्रेम ना देख सकेलिन। इ कवनो आतंकवादिन से कम ना हवें। रउरा बहुत बड़वर पशु प्रेमी होइब, हम ना जानत हईं। लेकिन अपना आहाता में केतना बीमार, अचलस्त गोवंशी के दवा-दारू, खरी भूंसा के इंतजाम कइले हईं एहुके खुलासा क के समाज के सामने रख दीं। पशु, पशु होलें। मनई के प्रति प्रेम भाव देखाईं। जवन पशु खूंटा से बन्हि के ना रहेलन उ अवारा कहल जालन। उनकर असली जगह जंगल ह। जहां जंगलराज चलेला। गोरखपुर शहर ह, महानगर ह। एइजा नगर निगम के भी कुछ नियम बा। नागरिकन की सुरक्षा खातिर यदि अवारा पशुन पर डंडा चलता त कवनो बाउर नेइखे होत। अबे बहुत ढीलाई बा। अगर सही में अवारा पशु काजी हाउस में बंद रहितन त सड़क पर ना दिखतन। आंख खोलीं, सड़क पर जानवरन के 'डाराज' देखीं, ओकरा बाद कवनो मनई पर मुकदमा ठोंकीं। हमरा त रउरी येह सिद्धांत पर आवता हंसी, रउरो में कवनो के सींग कबो धंसी।।                          
N.डी. देहाती 

22 October, 2010

संत-संत में भेद है, कुछ मुंड़ा कुछ झोंटा....


संत-संत में भेद है, कुछ मुंड़ा कुछ झोंटा....
भारत देश विभिन्नता में एकता के दर्शन करावे ला। कृषि प्रधान देश की बावजूद किसान से कम महान एइजा के संत, महात्मा, भगवान ना हवन। ढ़ाई अक्षर के शब्द संत के भी अंत पावल बड़ा कठिन काम हs। अयोध्या मामला के बातचीत चलत रहे। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष मंहत ज्ञानदास, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि जी महाराज  हाशिम चाचा की साथे रोज-रोज फोटो खिचवावत रहलें। बातचीत की जरिये ममिला सुलझावत रहलें। एही बीच में राममंदिर से जुड़ल संत उच्चाधिकार समिति के भी बैठक में अयोध्या आन्दोलन के अगुआई करे वाला ढेर संत-महात्मा बिटुरइले। कुछ नेतागिरी करे वाला संगठन के लोग भी गइलें। तय कs दिहलें कि जमीन के विभाजन स्वीकार ना बा। मतलब हाईकोर्ट के निणर्य से संतुष्ट ना हवें इ संत। अब संत-संत में भेद हो गइल। अखाड़ा तs अलगा-अलगा चलके रहे। हिन्दू धर्म के राहि देखावे वाला संत के राह भी जुदा-जुदा हो गइल। निरमोही अखाड़ा तs एकदम से मोह त्याग के सिंहल(विहिप) की टिप्पणी पर उखड़ गइल। निर्मोही अखाड़ा के संत रामदास एतना ले कहलन कि रामजन्म भूमि न्यास अवैध बा। एकर गठन दिल्ली में भइल रहे। संत उच्चाधिकार समिति गोवा में बनल  रहे। जब दूनो के गठन अयोध्या में भइबे ना कइल तs अयोध्या की बारे में का बतिअइहन।
अब तरह-तरह के संत आ तरह-तरह की बात पर इ कहल जा सकेला कि जब हिन्दू समाज के अगुआ लोग में खुद फुटमत बा तs अयोध्या के हाल श्रीराम जी की ही हाथे रही। संत में कुछ....खुल्ला बाड़न, तs कुछ दाढ़ी-झोटा बाल हवें। संत के रंग, रुप, स्वभाव पर इ कहल जा सकेला-

                             
संत-संत में भेद है, कुछ मुड़ा कुछ झोटा।
  कुछ नीचे से खुल्लम खुला, कुछ बान्हे मिले लंगोट।।



N.डी.Dehati

हेलमेट लगाई, तब प्रेसवार्ता मे जाई.....


हेलमेट लगाई, तब प्रेसवार्ता मे जाई.....
बुखारी का ‘बुखार’ हो गइल बा। ज्वर जब ज्यादा चढ़ि जाला तs मनई असमान्य हो जाला। ज्वर से पीडित कई लोग बउरा जालें। अइसन लोग के ‘दवाई’ के जरुरत पड़ेला। अब सवाल इ बा कि बुखारी साहब कs बुखार के उतारी? हजरतगंज कोतवाली में दर्ज एनसीआर(323,506) से उनकर कवन ‘रोआं’ टेढ़ हो जाई। गनीमत बा, बुखारी साहब आपन आपा खो के अपनी ही बिरादरी के पत्रकार मोहम्मद वहीद  चिश्तीसे मारपीट कइलन। बात लखनऊ की गोमती होटल के हs। दिल्ली के जाम मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सय्यद अहमद बुखारी के प्रेस कांन्फेस चलत रहल। ‘दास्तान-ए-अवध’ के सम्पादक मोहम्मद वहीद चिश्ती सवाल दागि दीहलें- ‘जब 1528 की खतौनीमें अयोध्या के विवादित भूमि राजा दशरथ के नाम से बा, तs आप दशरथ की बेटा राम की नाम पर जमीन काहें ना दे देत हई।‘ सवाल तीर अइसन बुखारी कि करेजा में धंसि गइल। उ संपादक के कांग्रेश कs एजेन्ट बना दिहलें। गर्दन नापे के घोषणा क s दीहलें। एकरा बाद भी करेजा ना ठंढाइल तs संपादक के दौडा-दौडा पीटलन।
N.D.Dehati

19 October, 2010

हमारी टीम की यादे 1














18 October, 2010

By VMW Team (India's New Invention)



By VMW Team (India's New Invention)

VMW Team
India’s New Invention

हमारी टीम की यादे




















हमारी टीम की यादे 
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